Jairam Ramesh: तमिलनाडु समेत कई गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का जबरदस्त विरोध हो रहा है। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने हाल ही में हिंदी को लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने से मना कर दिया था। इसके बाद लगातार केंद्र और तमिलनाडु सरकार के नेता एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। स्टालिन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर चुके हैं। अब मामले में कांग्रेस सांसद जयराम रमेश की प्रतिक्रिया सामने आई है। ANI से बातचीत में रमेश ने कहा कि कई राज्य ऐसे हैं, जिन्होंने परिवार नियोजन को लेकर गंभीरता से काम नहीं किया है।
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परिवार नियोजन में सफलता के लिए किसी भी राज्य को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। केरल और तमिलनाडु दक्षिण भारत में परिवार नियोजन में सफलता पाने वाले पहले राज्य थे। पहली सफलता केरल में मिली थी। यह 1988 में प्रजनन क्षमता के प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level of Fertility) पर पहुंच गया था। तमिलनाडु 1993 में इस स्तर पर पहुंच गया था। उसके बाद अविभाजित आंध्र प्रदेश (तेलंगाना अलग नहीं) और कर्नाटक ने यह उपलब्धि हासिल की थी। इसके बाद दूसरे राज्यों ने इसका इसका अनुसरण किया था।
जबरन नहीं थोप सकते भाषा
जयराम रमेश ने कहा कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन को गंभीरता से नहीं लिया, उन्हें सीटों में वृद्धि के मामले में अनुपातहीन रूप से सम्मानित नहीं किया जाना चाहिए। भाषाई साम्राज्यवाद को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हर किसी को अधिकार है कि वह अपनी मातृभाषा को सीख सकता है। किसी के ऊपर कोई भाषा जबरन नहीं थोपी जा सकती। हर राज्य में भाषाई अल्पसंख्यक पाए जाते हैं। हमें सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए। जयराम के अनुसार संविधान की अनुसूची 8 में 22 ही आधिकारिक भाषाओं का उल्लेख है, लेकिन भाषाओं की संख्या काफी अधिक है। भारत बहुभाषी देश है और हमारी एकता विविधता से ही आती है।
क्या है विवाद?
नेशनल एजुकेशन पॉलिसी केंद्र ने जारी की है, जिसके तहत हर राज्य में छात्रों को 3 भाषाएं सीखनी अनिवार्य हैं। इनमें एक हिंदी भी शामिल है। हालांकि छात्र कौन सी भाषाएं सीखेंगे, यह तय करने का अधिकार शिक्षण संस्थान के पास होगा? पॉलिसी में ये भी सिफारिश की गई है कि कक्षा 1 से 5 तक पढ़ाई मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में कराई जाए। आगे 10वीं तक की पढ़ाई 3 भाषाओं में जरूरी होगी। सेकेंडरी में स्कूल विदेशी भाषा भी पढ़ा सकते हैं। हिंदी भाषी राज्यों में दूसरी भाषा के तौर पर बांग्ला, तमिल और तेलुगु का ऑप्शन दिया गया है।
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