Centre Defends CEC Selection Process In SC: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) और इलेक्शन कमिश्नरों की नियुक्ति की मौजूदा प्रॉसेस को डिफेंड किया. सरकार ने कहा कि सिलेक्शन पैनल में प्रधानमंत्री के रोल पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं है. सरकार ने तर्क दिया कि संवैधानिक संस्थाओं को इस धारणा के आधार पर काम नहीं करना चाहिए कि कार्यपालिका लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ काम करेगी.

'पीएम ऑफिस पर भरोसा'

केंद्र का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पीएम ऑफिस की संवैधानिक गरिमा और उस पर जनता का भरोसा है. उन्होंने कहा कि अपॉइंटमेंट प्रॉसेस में प्रधानमंत्री की भागीदारी पर संदेह करना अनुचित होगा. मेहता ने सिलेक्शन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जैसे एक्सटर्नल अथॉरिटी को शामिल करने के तर्क पर भी सवाल उठाया और कहा कि यही तर्क कैबिनेट नियुक्तियों पर भी लागू हो सकता है.

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अदालत ने आदेश को रखा सुरक्षित

इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने की. बेंच ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया.

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कानून के खिलाफ तर्क

इस कानून के तहत 3 सदस्यीय चयन समिति में CJI की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता भी शामिल होते हैं. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस कदम से नियुक्तियों पर सरकार का प्रभाव बढ़ जाता है और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता कमजोर होती है.

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संविधान पीठ में भेजने की गुजारिश

केंद्र ने मामले को संविधान पीठ को भेजने का अनुरोध किया. सरकार का तर्क था कि इससे संविधान के अनुच्छेद 324 और संसद की विधायी शक्ति से जुड़े अहम सवाल उठते हैं. अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि इन संवैधानिक मुद्दों पर बड़ी बेंच की इंटरप्रेटेशन की जरूरत है.

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कोर्ट का ऑब्जर्वेशन

सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने साफ या कि कोर्ट की चिंता प्रधानमंत्री पर अविश्वास नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जनता का भरोसा सुनिश्चित करना है. बेंच ने दोनों पक्षों को लिखित दलीलें दाखिल करने की भी इजाजत दी, ताकि यह तय किया जा सके कि मामले को संविधान पीठ को भेजा जाए या नहीं.

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