संघ प्रमुख मोहन भागवत का मणिपुर दौरा आज खत्म हो गया. तीन दिनों तक उन्होंने समुदायों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक प्रतिनिधियों से बातचीत की. उद्देश्य साफ था—राज्य में शांति प्रक्रिया को गति देना और राजनीतिक स्थिति को स्थिर करने की दिशा में माहौल बनाना. केंद्र और बीजेपी नेतृत्व की इच्छा भी यही है कि मणिपुर में जल्द एक स्थायी गठित सरकार खड़ी हो. लेकिन जिस वास्तविकता का सामना सभी कर रहे हैं, वह कहीं अधिक जटिल है.
मणिपुर की राजनीति कुकी और मैतेई समुदायों के बीच बनी गहरी जातीय खाई में फंस चुकी है. कुकी समुदाय अलग प्रशासन की मांग पर अडिग है, जबकि मैतेई इसे राज्य की अखंडता के खिलाफ सीधी चुनौती मान रहे हैं. दोनों पक्षों की राजनीतिक मांगें बिलकुल विपरीत दिशा में हैं, और यही विरोधाभास किसी भी साझा राजनीतिक समाधान की राह रोक देता है. कुकी विधायकों के लगातार विधानसभा बहिष्कार ने संवाद की प्रक्रिया को और कमजोर कर दिया है, जिससे राजनीतिक समझौता लगभग असंभव हो गया है.
बीजेपी के भीतर नेतृत्व को लेकर स्थिति भी उलझी हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद पार्टी अब तक किसी एक नाम पर सहमत नहीं हो पाई है. मैतेई समुदाय के विधायक दो खेमों में बंट चुके हैं—एक गुट बीरेन सिंह की वापसी चाहता है, जबकि दूसरा थोकचोम सत्यब्रत सिंह, युमनाम खेमचंद सिंह और थोकचोम राधेश्याम सिंह जैसे नामों को आगे बढ़ा रहा है. इन नामों पर सहमति न बन पाना ही सरकार गठन की सबसे बड़ी बाधा बन गया है.
विधानसभा का गणित बहुमत का संकेत तो देता है, लेकिन सहमति का नहीं. 60 सदस्यीय सदन में बीजेपी के 37 विधायक हैं—27 मैतेई, 6 कुकी, 3 नगा और 1 मुस्लिम. एनडीए की कुल संख्या 42 तक पहुंचती है. बावजूद इसके नेतृत्व पर मतैक्य न बन पाने से सरकार बनाने का रास्ता आगे नहीं बढ़ रहा. बीजेपी ऐसा चेहरा चाहती है जिसे दोनों समुदायों का न्यूनतम समर्थन मिल सके, लेकिन ऐसी स्वीकार्यता वाला नेता ढूंढ पाना मुश्किल साबित हो रहा है.
राष्ट्रपति शासन के बाद संवैधानिक सीमाएं भी सत्ता गठन की प्रक्रिया को जटिल बना रही हैं. सत्र बुलाने की समयसीमा और प्रशासनिक निर्णयों की सीमाओं को लेकर राजनीतिक और कानूनी पेच बढ़ गए हैं. यह अस्थायी स्थिति किसी भी दीर्घकालिक राजनीतिक निर्णय को आगे बढ़ाने में रुकावट डालती है.
राज्य की मौजूदा स्थिति सिर्फ नेतृत्व चयन या राजनीतिक जोड़तोड़ का मामला नहीं है. मई 2023 से चली आ रही हिंसा, मैतेई समुदाय की एसटी दर्जे की मांग, पहाड़ी क्षेत्रों के भूमि अधिकारों पर तनाव और दशकों पुरानी शिकायतों ने दोनों समुदायों के बीच भरोसे को लगभग खत्म कर दिया है. ऐसे माहौल में नई सरकार का गठन राजनीतिक प्रक्रिया से ज्यादा शांति प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है. इस वजह से राजनीतिक नेतृत्व के सामने वही मूल समस्या खड़ी होती है—ऐसा मुख्यमंत्री कौन होगा जो दोनों समुदायों में कम से कम स्वीकार्य हो?
मोहन भागवत का दौरा खत्म हो चुका है, लेकिन उनकी बैठकों का संदेश यही है कि संघ और बीजेपी दोनों चाहते हैं कि मणिपुर राजनीतिक स्थिरता की ओर लौटे. हाल में ही बीजेपी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने मैतेई, कुकी और नगा विधायकों के साथ बैठक कर सरकार बनाने की संभावना को टटोला था. लेकिन चुनौती यह है कि जिस सहमति और संवाद की आवश्यकता सरकार गठन के लिए है, वह जमीन अभी तैयार नहीं दिखती. ऐसे में मणिपुर में स्थायी सरकार का रास्ता फिलहाल लंबा और कठिन ही नजर आता है.
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