बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का एक वीडियो आजकल खूब वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने ‘क्राइम’ और ‘अपराध’ को लेकर एक विवादित टिप्पणी की है, जिसने राजनीतिक भूचाल खड़ा कर दिया है. सम्राट चौधरी ने अपने संबोधन में कहा कि बिहार में कोई अपराध नहीं होता, बल्कि क्राइम होते हैं. उनके इस अजीबोगरीब बयान ने सोशल मीडिया पर मीम्स की भरमार ला दी है. उनके बयान वाले वायरल वीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी लोग दे रहे हैं और उनसे क्राइम-अपराध में अंतर पूछ रहे हैं. विपक्ष ने भी बिहार में कानून व्यवस्था के हालातों पर सवाल उठाते हुए उनकी सरकार को आड़े हाथों ले लिया है. इस बीच आइए जानते हैं कि क्या क्राइम और अपराध अलग-अलग हैं? क्या दोनों के बीच कानूनी या वैधानिक अंतर है? क्या दोनों के बीच अपराध की प्रवृत्ति को लेकर अंतर है?
दोनों में सिर्फ एक संदर्भ और दायरे का अंतर
बता दें कि क्राइम और अपराध में कोई कानूनी, वैधानिक या बुनियादी अंतर नहीं है. बल्कि दोनों एक ही सिक्के के 2 पहलू हैं. क्राइम अंग्रेजी का शब्द है और अपराध इसका हिंदी अनुवाद है. दोनों शब्दों का अर्थ कानून के खिलाफ किए गए ऐसे कृत्य से लिया जाता है, जिसके लिए भारतीय कानून के तहत सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है. लेकिर अगर संदर्भ की बात की जाए तो अपराध और क्राइम में एक अंतर हो सकता है. अपराध के दायरे में कानून के खिलाफ गैर-कानूनी कृत्यों के अलावा सामाजिक या नैतिक नियमों का उल्लंघन भी शामिल हो सकता है. वहीं आम बोलचाल की भाषा में एवं मीडिया और पुलिस की शब्दावली में हत्या, चोरी, दुष्कर्म, डकैती को ‘क्राइम’ कहते हैं. लेकिन भारतीय अदालतों और कानून में ‘अपराध’ और ‘क्राइम’ दोनों को एक समान और एक ही अर्थ में देखा जाता है.
क्राइम-अपराध के लिए जेल जुर्माने का प्रावधान
भारतीय संविधान और भारतीय कानून में क्राइम और अपराध में कोई अंतर नहीं है. समाज की शांति भंग करने वाला, किसी कानून का उल्लंघन, हत्या, डकैती, चोरी, फिरौती और धोखाधड़ी जैसे गंभीर कृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं. अगर कोई जानबूझकर संविधान के तहत निर्धारित कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तो वह भी अपराध के दायरे में आता है. भारत में क्राइम या अपराध के लिए जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है. अपराध एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज और राज्य के खिलाफ किया गया कृत्य माना जाता है. इसलिए भारत में किसी अपराध के लिए सिर्फ पीड़ित को ही अकेले कोर्ट के चक्कर नहीं काटने पड़ते, बल्कि सरकार और पुलिस भी आरोपी के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसती है. आपसी विवादों या सिविल मामलों में पीड़ित को खुद ही इंसाफ के लिए पहल करनी पड़ती है.