केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ताजा बयान के बाद समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर बहस फिर तेज हो गई है. सरकार की योजना 2029 से पहले एनडीए के शासन वाले 21 राज्य सरकारों में इसे अलग-अलग चरणों में लागू करने की है. उत्तराखंड के अलावा गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में भी UCC से जुड़े कानून पहले ही लागू हो चुके हैं. इस स्थिति के बीच यह सवाल चर्चा में है कि संविधान में समान नागरिक संहिता का प्रावधान होने के बावजूद केंद्र सरकार पूरे देश के लिए एक समान कानून क्यों नहीं ला रही है? इसके बजाय UCC को राज्य स्तर पर लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के पीछे संवैधानिक व्यवस्था और राज्यों के विधायी अधिकारों की क्या भूमिका है?

राज्य अपने स्तर पर कानून क्यों बना रहे हैं?

समान नागरिक संहिता को राज्यवार लागू करने के पीछे संवैधानिक व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक रणनीति भी जुड़ी हुई है. संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) की एंट्री 5 में विवाह, तलाक, गोद लेने, वसीयत, उत्तराधिकार और संयुक्त परिवार जैसे विषय शामिल हैं. इसका मतलब है कि इन मामलों में केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी कानून बनाने का अधिकार है. इसी वजह से UCC को केवल संसद के जरिए लागू करने के बजाय राज्य विधानसभाओं के माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है.

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हालांकि, इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता मानी जाती है. देश के अलग-अलग हिस्सों में पर्सनल लॉ के साथ स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों में काफी अंतर है. खासकर आदिवासी इलाकों और पूर्वोत्तर राज्यों में विवाह, परिवार और उत्तराधिकार से जुड़े कई पारंपरिक नियम अलग तरीके से चलते हैं. 2023 में UCC पर चर्चा के दौरान बीजेपी और RSS से जुड़े लोगों ने भी इस विविधता को लेकर चिंता जाहिर की थी.

बीजेपी से जुड़े एक पदाधिकारी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि UCC को आपराधिक कानून की तरह पूरे देश के लिए एक ही तरीके से तैयार करना आसान नहीं होगा. अलग-अलग राज्यों और समुदायों की सामाजिक व्यवस्थाएं एक जैसी नहीं हैं. उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश के आदिवासी समाज की परंपराएं छत्तीसगढ़ या पूर्वोत्तर के समुदायों से काफी अलग हो सकती हैं. ऐसे में राज्य स्तर पर UCC लागू करने से सरकारों को स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक नियम तैयार करने होते हैं और अलग-अलग पहलुओं को भी ध्यान में रखना होता है.

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किन-किन राज्यों में पास हुआ UCC?

बीजेपी शासित चार राज्यों- उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभाएं समान नागरिक संहिता (UCC) से जुड़े कानून पारित कर चुकी हैं. उत्तराखंड अकेला ऐसा राज्य है जहां यह कोड अभी लागू है.

उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में अपना UCC लागू किया था. इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और विरासत से जुड़े मामलों के लिए समान नियम बनाए गए हैं. कानून बहुविवाह पर रोक लगाता है और विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करता है. उत्तराखंड के UCC की सबसे खास बात लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बनाए गए प्रावधान हैं. इसके तहत लिव-इन में रहने वाले कपल को अपने रिश्ते का पंजीकरण कराना होता है और रिश्ता खत्म होने की स्थिति में उसकी जानकारी भी दर्ज करानी होती है. ऐसे संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा दिया गया है.

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गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया था. ये काफी हद तक उत्तराखंड के मॉडल पर आधारित है. इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधान हैं. कानून में एक से अधिक विवाह यानी बहुविवाह पर रोक का प्रावधान भी है.

असम ने मई 2026 में अपना UCC विधेयक पारित किया. इसमें विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के साथ लिव-इन संबंधों को भी कानून के दायरे में रखा गया है. असम के कानून में भी बहुविवाह पर रोक है और लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य है.

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वहीं, मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में UCC विधेयक पारित किया. इसके दायरे में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के अलावा गोद लेने से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं. कानून में तीन तलाक और निकाह हलाला से संबंधित प्रावधान भी रखे गए हैं. मध्य प्रदेश में भी लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण जरूरी है और बहुविवाह पर रोक लगाई गई है.

इन चारों राज्यों के कानूनों में एक समानता यह है कि अनुसूचित जनजातियों (ST) को UCC के दायरे से बाहर रखा गया है. उत्तराखंड में संविधान के तहत विशेष रूप से संरक्षित कुछ समुदायों और उनकी प्रचलित परंपरागत व्यवस्थाओं को भी छूट दी गई है.

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क्या केंद्र सरकार पूरे देश के लिए UCC बना सकती है?

हां, चूंकि UCC से जुड़े प्रमुख विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) में हैं, इसलिए संसद को भी इन पर कानून बनाने का अधिकार है. यानी केंद्र सरकार चाहे तो देशभर के लिए केंद्रीय कानून ला सकती है. हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कानून बनाने में अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों, स्थानीय परंपराओं और संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को ध्यान में रखना होगा.

संविधान में UCC का जिक्र है, फिर विवाद क्यों?

समान नागरिक संहिता यानी UCC का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में किया गया है. इसमें कहा गया है कि राज्य को पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए. हालांकि, अनुच्छेद 44 को मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं बनाया गया है. यह संविधान के राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) में शामिल है. अनुच्छेद 37 के मुताबिक ये सिद्धांत शासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन्हें लागू कराने के लिए किसी अदालत में सीधे दावा नहीं किया जा सकता.

यही वजह है कि UCC पर बहस सिर्फ इस बात की नहीं है कि संविधान में इसका उल्लेख है या नहीं. असली सवाल यह है कि किन कानूनों को एक जैसा बनाया जाए और ऐसा करते समय धार्मिक स्वतंत्रता, पारंपरिक रीति-रिवाजों और आदिवासी समुदायों को मिले संवैधानिक संरक्षण का किस तरह ध्यान रखा जाए. संविधान सभा के दौर में भी UCC के स्वरूप को लेकर पूरी सहमति नहीं बन पाई थी. इसी कारण इसे मौलिक अधिकारों के बजाय नीति-निर्देशक तत्वों में जगह दी गई.

विधि आयोग ने क्या कहा?

21वें विधि आयोग (Law Commission) ने 2018 में परिवार से जुड़े कानूनों में सुधार पर जारी अपने कंसल्टेशन पेपर में कहा था कि उस समय समान नागरिक संहिता लागू करना न तो जरूरी था और न ही उचित. आयोग का जोर सभी पर्सनल लॉ में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों में सुधार करने पर था, ताकि देश की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता भी बनी रहे.

आयोग ने खास तौर पर समुदायों के बीच समानता के बजाय एक ही समुदाय में महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता पर ज्यादा जोर दिया. उसका मानना था कि सभी कानूनों को एकदम एक जैसा बनाने की जगह इसमें जरूरत के मुताबिक अलग-अलग प्रावधानों में धीरे-धीरे सुधार किया जा सकता है. आयोग ने आदिवासी और पूर्वोत्तर के कई समुदायों को मिले संवैधानिक संरक्षण को भी UCC लागू करने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चुनौती बताया था.

क्या हैं संवैधानिक प्रावधान?

संविधान में प्रावधान: समान नागरिक संहिता का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में किया गया है.
राज्यों की भूमिका: संविधान राज्यों को समान नागरिक कानून की दिशा में आगे बढ़ाता है.
नीति-निर्देशक सिद्धांत: अनुच्छेद 44 को नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया है.
लागू करने की बाध्यता नहीं: यह प्रावधान सरकारों के लिए मार्गदर्शक है, लेकिन इसे लागू करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है.
संविधान सभा में चर्चा: संविधान बनाते समय समान नागरिक संहिता को लेकर अलग-अलग मत सामने आए थे.
विधि आयोग की राय: 2018 में विधि आयोग ने UCC को लेकर अपनी रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं.
पूरे देश में एक जैसा कानून जरूरी नहीं: UCC लागू करने का तरीका और दायरा राज्यों की परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है.
व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव: UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों में समान नियमों की दिशा में काम करना है.
लैंगिक समानता पर जोर: व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं और पुरुषों के बीच समान अधिकार सुनिश्चित करने की बात भी इससे जुड़ी है.