भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को पद से हटाने के लिए संसद में औपचारिक प्रस्ताव लाने की तैयारी पूरी हो चुकी है. विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन के सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए नोटिस पर हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया बुधवार को पूरी कर ली है. सूत्रों के मुताबिक लोकसभा के करीब 120 और राज्यसभा के 60 सांसदों ने इस नोटिस पर अपनी सहमति दी है. गुरुवार 12 मार्च को यह प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में सौंपा जा सकता है. विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से सत्ताधारी दल को फायदा पहुंच रहा है और एसआईआर जैसे मुद्दों पर आयोग का रुख निष्पक्ष नहीं रहा है.

नोटिस लाने के कड़े नियम और शर्तें

संसद के नियमों के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए सदस्यों की एक निश्चित संख्या जरूरी होती है. लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस देना अनिवार्य है. विपक्ष ने इस आंकड़े को पार कर लिया है जिससे अब यह मामला बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है. विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना जरूरी हो गया था. एसआईआर के उद्देश्य को लेकर भी विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं और इसे बीजेपी की मदद करने वाला कदम बताया है जिससे चुनावी शुचिता पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है.

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हटाने की जटिल कानूनी प्रक्रिया

मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाना कोई आसान काम नहीं है क्योंकि इनके लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जो सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए होती है. जज (जांच) अधिनियम 1968 के तहत प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति तीन सदस्यों की एक जांच समिति का गठन करते हैं. इस समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के कोई जज, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक मशहूर कानूनविद शामिल होते हैं. यह समिति उन सभी आरोपों की बारीकी से जांच करती है जिनके आधार पर पद से हटाने की मांग की गई है. जांच के दौरान सीईसी को भी अपना पक्ष रखने और अपना बचाव करने का पूरा मौका दिया जाता है.

संसद में चर्चा और आगे की राह

जांच समिति की कार्यवाही बिल्कुल किसी अदालत की तरह होती है जिसमें गवाहों से पूछताछ और सबूतों का विश्लेषण किया जाता है. जब समिति अपनी रिपोर्ट संसद को सौंप देती है तब उस पर सदन में विस्तार से चर्चा और बहस शुरू होती है. यदि सदन में प्रस्ताव पारित हो जाता है तभी सीईसी को पद छोड़ना पड़ता है. हालांकि इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है और इसमें बहुमत साबित करना भी बड़ी चुनौती होती है. फिलहाल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस नोटिस ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है क्योंकि आजादी के बाद आज तक किसी सीईसी को इस तरह हटाने की नौबत नहीं आई थी. अब सबकी नजरें कल संसद में होने वाली कार्यवाही पर टिकी हैं.