भारत में सबसे ऊंचे पहाड़, सबसे ऊंचे रोड ब्रिज, सबसे ऊंचे रेलवे पुल, सबसे ऊंची सड़कें, सबसे ऊंचे डैम हैं जो पूरी दुनिया में चर्चित हैं. अब भारत एक और असंभव काम को संभव बनाएगा. दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील बनाई जाएगी, जिसके अंदर 7800 लाख क्यूबिक मीटर पानी रिजर्व किया जाएगा और इसके लिए 64 किलोमीटर लंबा बांध बनाया जाएगा. जी हां, भारत सरकार गुजरात सरकार के साथ मिलकर गुजरात खंभात की खाड़ी में कल्पसर प्रोजेक्ट लगा रही है, जिसके जरिए नदियों के पानी को समुद्र में जाने से रोककर इस्तेमाल किया जाएगा.

खंभात की खाड़ी में कल्पसर प्रोजेक्ट लगेगा

नदियों के पानी को समुद्र में जाने से रोकना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है, लेकिन भारत सरकार इस असंभव काम को संभव करेगी. कल्पसर प्रोजेक्ट लगाकर नदियों के पानी को रिजर्व करके इकोनॉमिक फायदे उठाए जाएंगे. पानी का इस्तेमाल सिंचाई, ऊर्जा उत्पादन, बिजली उत्पादन और परिवहन के क्षेत्र में किया जाएगा. खंभात की खाड़ी में समुद्र के ऊपर दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील बनाने का मकसद समुद्र के एक हिस्से को बांधकर 7800 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी को समुद्र में बहकर व्यर्थ होने से रोकना और गुजरात के सौराष्ट्र का सूखा खत्म करना है.

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कितनी होगी कल्पसर प्रोजेक्ट की निर्माण लागत?

कल्पसर प्रोजेक्ट के लिए गुजरात सरकार को केंद्र सरकार और नीदरलैंड्स टेक्निकल सपोर्ट देंगी. प्रोजेक्ट के फ्रेमवर्क और टेक्निकल सपोर्ट में नीदरलैंड की कंसल्टेंसी कंपनी NEDECO (Netherlands Engineering Consultants) मदद करेगी. प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 1.25 लाख करोड़ से 1.33 लाख करोड़ के बीच हो सकती है. प्रोजेक्ट के सचिव केबी राबड़िया हैं, जिन्हें 64 किलोमीटर लंबा बांध बनाने और साबरमती, माही, धाधर, नर्मदा नदियों के मीठे पानी को इकट्ठा करके 1600 से 2000 वर्ग किलोमीटर में फैली दुनिया की सबसे बड़ी आर्टिफिशियल मीठे पानी की झीलों बनाने की जिम्मेदारी मिली है.

कल्पसर प्रोजेक्ट से कौन-कौन से फायदे होंगे?

बता दें कि कल्पसर प्रोजेक्ट से गुजरात के सौराष्ट्र के 9 जिलों के 42 तालुकों में 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होगी और सूखा खत्म होगा. पानी की कमी से फसलों को होने वाला नुकसान कम होगा और कृषि उत्पादन बढ़ेगा. खंभात की खाड़ी पर बांध बनने के बाद उसके ऊपर सड़क और रेल कॉरिडोर बनाया जाएगा, जिससे भावनगर और सूरत के बीच की दूरी कम होगी. इससे परिवहन और ईंधन का खर्च बढ़ेगा, व्यापार और उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा. 2470 मेगावाट सौर और पवन ऊर्जा पैदा. पीने का पानी और इंडस्ट्री-फैक्ट्रियों के लिए जरूरी पानी की सप्लाई संभव होगी.

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