बच्चों का स्क्रीन टाइम बना माता-पिता के लिए टेंशन! पैरेंट्स को रोजाना झेलना पड़ रहा मानसिक तनाव, स्टाडी में आया सामने
Parents Mental Health: बच्चों को किस उम्र में स्क्रीन का इस्तेमाल शुरू करना चाहिए? उन्हें कितनी देर तक स्क्रीन देखने देना चाहिए, क्या सोने से पहले स्क्रीन से दूरी जरूरी है? जैसे कई सवाल माता-पिता के बीच रहते हैं, ऐसे में अलग-अलग सलह उनको भी तनाव का शिकार बना रही है. आइए जानते हैं इस मामले में शौध में क्या बातें सामने आई?
बच्चों का फोन चलाना क्यों बन रहा माता-पिता के लिए सिर दर्द की वजह? (Image: AI/Pexels)
खबर की मुख्य बातें:
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डीकिन यूनिवर्सिटी के केट मेनेल ने बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल पर एक नया शोध किया है.
शोध में जन्म से 8 वर्ष तक के बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल पर सार्वजनिक चर्चाओं और 34 माता-पिता के अनुभवों का विश्लेषण किया गया.
पहले की सलाह सिर्फ उम्र और अवधि पर केंद्रित थी, लेकिन अब ‘कब और कैसे’ स्क्रीन का इस्तेमाल करें, इस पर जोर दिया जा रहा है.
नई सलाह में भोजन और सोने से पहले स्क्रीन से बचने, धीमी गति वाली सामग्री दिखाने और बच्चों के साथ बैठकर कार्यक्रम देखने को कहा गया है, जिससे माता-पिता पर दबाव बढ़ सकता है.
बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल को लेकर दी जाने वाली अलग-अलग और कई बार विरोधाभासी सलाह माता-पिता के लिए तनाव और असमंजस का कारण बन सकती हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केट मेनेल, डीकिन यूनिवर्सिटी द्वारा की गई एक नए शोध में दावा किया गया है कि छोटे बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल को लेकर सलाह अब सिर्फ उनकी उम्र और स्क्रीन देखने की अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है कि बच्चे स्क्रीन का इस्तेमाल कब और कैसे करें. ऐसे में ये बातें और इसका जवाब जिन चीजों पर निर्भर करता है, उसके बारे में सोचकर पैरेंट्स तनाव में रहने लगे हैं.
कई सालों तक माता-पिता को सलाह दी जाती थी कि वे दो साल की उम्र तक बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें और इसके बाद स्क्रीन देखने का समय प्रतिदिन दो घंटे तक ही रखें. हालांकि, इस सलाह की खूब आलोचना होने लगी, क्योंकि इसमें सभी बच्चों और स्क्रीन के इस्तेमाल के अलग-अलग तरीकों को एक जैसा माना जाता है. हालांकि, शोध में जन्म से आठ वर्ष तक के बच्चों और स्क्रीन के इस्तेमाल को लेकर सार्वजनिक चर्चाओं का विश्लेषण किया गया. इसके लिए आधिकारिक दिशानिर्देशों, सोशल मीडिया सामग्री, ऑस्ट्रेलियाई समाचारों, ऑनलाइन लेखों और बच्चों से जुड़ी चीजों- सेवाओं के प्रचार का अध्ययन किया गया. इसके अलावा, 34 माता-पिता से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की गई कि उन्हें किस तरह की सलाह मिलती है और उसका उन पर क्या असर पड़ता है.
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शोध में क्या आया सामने?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शोध में पाया गया कि पहले के मुकाबले अब माता-पिता को भोजन के समय और सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं करने देने, अन्य गतिविधियों के दौरान स्क्रीन को बैकग्राउंड में चालू नहीं रखने और बच्चों को धीमी स्पीड वाली सामग्री दिखाने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा, माता-पिता से कहा जाता है कि वे बच्चों को अकेले स्क्रीन देखने देने के बजाय उनके साथ बैठकर कार्यक्रम देखें, उन्हें चीजें समझाएं, गाने के साथ गाएं और बीच-बीच में सवाल पूछें, ताकि उन्हें मालूम चले कि वह क्या देख रहे हैं और वह उससे सीखें, जिससे उनके विकास में मदद मिले.
सलाह बढ़ा सकती है माता-पिता पर दबाव
शोध के अनुसार, इन सलाहों का उद्देश्य तो अच्छा है, लेकिन इनसे माता-पिता पर भी दबाव बढ़ सकता है. एक ओर उन्हें बताया जाता है कि स्क्रीन का सीमित इस्तेमाल ठीक है, वहीं दूसरी ओर चेतावनी दी जाती है कि इससे दिमाग के विकास और शारीरिक गतिविधियों पर बुरा असर पड़ सकता है. इतना ही नहीं, बच्चों के लिए सही सामग्री चुनना भी चुनौती बन गया है. उदाहरण के लिए, माता-पिता को ज्यादा एक्साइटमेंट पैदा करने वाले कार्यक्रमों के बजाय कम उत्तेजना (एक्साइटमेंट) वाले कार्यक्रम दिखाने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कौन-सा कार्यक्रम किस श्रेणी में आता है. माता-पिता को अब सिर्फ स्क्रीन देखने के समय पर नजर नहीं रखनी होती, बल्कि बच्चों के लिए बेहतर सामग्री चुनने और उनके साथ बैठकर कार्यक्रम देखने का समय भी निकालना पड़ता है. इससे वे थकान महसूस करने लगते हैं और बाकी काम भी प्रभावित होने लगता है.
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हर बच्चे और परिवार की परिस्थितियां अलग
शोध के अनुसार, बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर सभी परिवारों पर एक जैसी सलाह लागू नहीं की जा सकती. हर बच्चे की पसंद, व्यवहार और जरूरतें अलग होती हैं, वहीं परिवारों की जीवनशैली और परिस्थितियां भी अलग-अलग होती हैं. उदाहरण के लिए, कुछ माता-पिता के लिए बच्चों को थोड़ी देर अकेले टीवी देखने देना राहत देने वाला हो सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि स्क्रीन इस्तेमाल करने का कोई एक सही तरीका नहीं है. उन्होंने लगभग एक ही उम्र के छोटे बच्चों वाले दो परिवारों का उदाहरण दिया, जिनमें एक परिवार सुबह टीवी देखने की अनुमति नहीं देता था, जबकि दूसरे परिवार में टीवी सिर्फ सुबह ही देखा जाता था.
नियमों से ज्यादा जरूरी है बच्चे पर असर समझना
शोध के मुताबिक, माता-पिता को सिर्फ स्क्रीन टाइम के तय नियमों का पालन करने के बजाय यह समझने पर ध्यान देना चाहिए कि स्क्रीन देखने से बच्चे के व्यवहार पर क्या असर पड़ता है. साथ ही, यह भी देखना जरूरी है कि स्क्रीन इस्तेमाल करने के बावजूद बच्चे को खेलकूद, पढ़ाई और दूसरी जरूरी गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय मिल रहा है या नहीं. शोधकर्ताओं के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चा स्क्रीन के साथ और उसके बिना भी ठीक से खेल पा रहा है, नई चीजें सीख रहा है और खुश है या नहीं. इसलिए माता-पिता को दूसरे परिवारों के नियमों की नकल करने के बजाय अपने बच्चे की जरूरतों और परिवार की परिस्थितियों के अनुसार स्क्रीन टाइम तय करना चाहिए.
अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें. न्यूज 24 किसी तरह का दावा नहीं करता है.