हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का तीन दिवसीय सिंगापुर दौरा पूरा कर बुधवार को भारत वापस लैटे. इस दौरान हरियाणा में करीब 5,500 करोड़ रुपये के निवेश से जुड़े समझौते सामने आए. हरियाणा सरकार के मुताबिक, इन निवेश प्रस्तावों से उद्योग, स्वास्थ्य, जल प्रबंधन, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कोई किसी राज्य के मुख्यमंत्री जब विदेश यात्रा पर जाते हैं तो क्या उन्हें भी किसी से अनुमति लेनी होती है? क्या मुख्यमंत्री अपनी इच्छा से विदेश जा सकते हैं या इसके लिए केंद्र सरकार की मंजूरी जरूरी होती है?
विदेश यात्रा के लिए क्या लेनी पड़ती है मंजूरी?
आपको बता दें कि मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकार के मंत्रियों के लिए विदेश यात्रा के संबंध में केंद्र सरकार ने स्पष्ट प्रक्रिया तय कर रखी है. किसी मुख्यमंत्री या राज्य मंत्री को आधिकारिक ही नहीं, बल्कि निजी विदेशी यात्रा की जानकारी भी कैबिनेट सचिवालय और विदेश मंत्रालय को देनी होती है. 6 मई 2015 के कैबिनेट सचिवालय के सर्कुलर के अनुसार, ऐसी यात्राओं के लिए विदेश मंत्रालय से राजनीतिक मंजूरी लेना जरूरी है. इसके अलावा संबंधित मामलों में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के तहत मंजूरी भी आवश्यक हो सकती है.
राजनीतिक मंजूरी क्यों जरूरी है?
विदेश मंत्रालय की राजनीतिक मंजूरी का मकसद यह देखना होता है कि किसी भारतीय जनप्रतिनिधि की विदेश यात्रा का देश की विदेश नीति या दूसरे देश के साथ राजनयिक संबंधों पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े. मंत्रालय यात्रा का कार्यक्रम, मेजबान देश, निमंत्रण की प्रकृति, विदेशी प्रतिनिधियों की भागीदारी और भारत के संबंधित देश के साथ संबंधों जैसे पहलुओं को ध्यान में रखता है. 2016 से राजनीतिक मंजूरी के लिए ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था भी शुरू की गई है.
आर्थिक मामलों के विभाग की भी मंजूरी
मुख्यमंत्री, राज्य मंत्री और अन्य राज्य अधिकारियों के विदेशी दौरों के लिए आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) की मंजूरी भी आवश्यक होती है. मंत्रालय इस तरह के आवेदन पर तभी विचार करता है, जब उसके साथ विदेश मंत्रालय की राजनीतिक मंजूरी जुड़ी हो. मतलब यह साफ है कि विदेश मंत्रालय की अनुमति के बिना राज्य सरकार का कोई अधिकारी आधिकारिक विदेशी दौरे पर नहीं जा सकता.
पहले भी कई बार नहीं मिली मंजूरी
विदेश यात्रा की राजनीतिक मंजूरी नहीं मिलना कोई नई बात नहीं है. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 2022 में सिंगापुर जाने की अनुमति नहीं मिली थी, जिसके बाद उन्हें अपना दौरा रद्द करना पड़ा था. उनके अलावा यूपीए सरकार के दौरान भी असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के कुछ विदेशी दौरों को मंजूरी नहीं मिली थी.
केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों के लिए भी अलग नियम
आपको जानकर हैरानी होगी कि केंद्रीय मंत्रियों को विदेश मंत्रालय की राजनीतिक मंजूरी के बाद प्रधानमंत्री से भी अनुमति लेनी होती है. वहीं लोकसभा सांसदों को विदेश यात्रा के लिए लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्यों को सभापति से मंजूरी की आवश्यकता हो सकती है. सरकारी अधिकारियों के लिए भी विदेश यात्रा से जुड़े अलग-अलग नियम हैं. यात्रा का खर्च, अवधि, प्रतिनिधिमंडल का आकार और मेजबान संस्था जैसे पहलू भी मंजूरी की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं.