पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से एक लीक से हटकर अपील की है - 'एक साल तक सोना न खरीदें, विदेश यात्रा टाल दें और जहां संभव हो वर्क फ्रॉम होम करें.' पहली नजर में यह एक सामान्य सलाह लग सकती है, लेकिन इसके पीछे अरबों डॉलर का वो गणित छिपा है, जो भारत की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचा सकता है. हम बताएंगे कि आखिर ईरान युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच सोने का क्या कनेक्शन है?

फॉरेक्स का गणित- डॉलर की आवक कम, जावक ज्यादा

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिलहाल लगभग 691 बिलियन डॉलर है. सुनने में यह रकम बड़ी लगती है, लेकिन संकट गहरा है. आईएमएफ के मुताबिक, 2026 में भारत का चालू खाता घाटा 84.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. यानी हम जितना डॉलर कमा रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा खर्च कर रहे हैं.

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सोने का बोझ

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड खरीदार है. वित्त वर्ष 2026 में हमने 72 बिलियन डॉलर (करीब 6 लाख करोड़ रुपये) का सोना आयात किया. सारा भुगतान डॉलर में हुआ, जिससे खजाना खाली हो रहा है.

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ईरान युद्ध और 100 डॉलर का तेल

अमेरिका-ईरान तनाव के कारण कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. भारत अपनी जरूरत का 88% तेल आयात करता है. युद्ध के समय लोग सुरक्षित निवेश के लिए सोना खरीदते हैं. इससे सोने के दाम बढ़ते हैं और आयात बिल भी.

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रुपये पर दबाव

जब गोल्ड इम्पोर्टर मार्केट से डॉलर खरीदते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है. पीएम मोदी चाहते हैं कि हम सोना न खरीदकर वो डॉलर बचाएं, ताकि महंगा कच्चा तेल खरीदा जा सके.

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अगर देश ने बात मान ली… तो क्या होगा?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर भारतीय एक साल के लिए अपनी सोने की भूख कम कर दें, तो चमत्कार हो सकता है. 30-40% तक कम खरीदारी होने पर 20-25 बिलियन डॉलर की बचत हो सकती है. वहीं, 50% कम खरीदारी करने पर 36 बिलियन डॉलर की बचत हो सकती है. यह बचत हमारे कुल घाटे का आधा हिस्सा अकेले कवर कर सकती है. इससे रुपया मजबूत होगा और महंगाई पर लगाम लगेगी.