पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत और तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद शुरू हुआ आंतरिक घमासान अब एक कानूनी लड़ाई में बदल चुका है. तृणमूल कांग्रेस के दो विरोधी गुटों ने खुद को 'असली टीएमसी' बताते हुए चुनाव आयोग के सामने पदाधिकारियों की अलग-अलग सूची सौंप दी है. इसके साथ ही पार्टी के नाम, सिंबल और संपत्तियों पर अधिकार को लेकर दिल्ली में जंग शुरू हो गई है.
पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खेमे को उस समय बड़ा झटका लगा जब बागी गुट ने विधानसभा के 80 में से 62 विधायकों को अपने पाले में कर लिया. इसके बाद सोमवार को ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी चेयरपर्सन पद से हटाकर विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित कर दिया. दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के खेमे ने चुनाव आयोग को अपनी सूची सौंपी है. अब इस पूरे विवाद का फैसला चुनाव आयोग के 'टू-विंग टेस्ट' के जरिए होगा.
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क्या है चुनाव आयोग का 'टू-विंग टेस्ट'?
'इलेक्शन सिम्बल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968' के पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव आयोग को यह शक्ति प्राप्त है कि जब किसी मान्यता प्राप्त दल में दोफाड़ हो जाए, तो वह तय करे कि असली पार्टी कौन सी है. 'टू-विंग टेस्ट' के तहत आयोग दो मोर्चों पर दोनों गुटों के बहुमत की जांच करता है. पहला देखता है कि संसद और विधानसभाओं में किस गुट के पास निर्वाचित सांसदों और विधायकों का बहुमत है. दूसरे यह देखता हैकि पार्टी के मूल संगठन, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और पदाधिकारियों के बीच किसे ज्यादा समर्थन हासिल है.
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SC का वो ऐतिहासिक फैसला, जिससे बना यह नियम
इस टेस्ट की शुरुआत साल 1969 में कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन से जुड़ी है. उस समय राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को लेकर कांग्रेस दो धड़ों - जगजीवन राम की अगुवाई वाली 'कांग्रेस J' और एस. निजालिंगप्पा की अगुवाई वाली 'कांग्रेस O' में बंट गई थी. दोनों ने पार्टी के चुनाव चिह्न 'बैलों की जोड़ी' पर दावा ठोका था.
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चुनाव आयोग ने तब 'संख्या बल' के आधार पर 'कांग्रेस J' को असली कांग्रेस माना था. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. 11 नवंबर 1971 को जस्टिस एचआर खन्ना की बेंच ने 'सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग' मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि 'बहुमत और संख्या बल का परीक्षण पूरी तरह से प्रासंगिक और मूल्यवान टेस्ट है.' तब से यह फैसला हर पार्टी के विभाजन के समय नजीर बना हुआ है.
शिवसेना और NCP विवाद में भी हुआ था इस्तेमाल
हाल के वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति में भी चुनाव आयोग इसी टेस्ट के आधार पर फैसले ले चुका है. एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद चुनाव आयोग ने संगठनात्मक ढांचे के टेस्ट को अनिर्णायक पाते हुए विधायी बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को असली 'शिवसेना' माना और 'तीर-कमान' का सिंबल उन्हें सौंप दिया. उद्धव ठाकरे गुट को नया नाम और सिंबल मिला.
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वहीं, अजित पवार के पास अधिकांश विधायकों का समर्थन होने के कारण चुनाव आयोग ने शरद पवार की जगह अजित पवार के गुट को असली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और 'घड़ी' का सिंबल आवंटित किया था.
TMC के लिए इसके क्या मायने हैं?
चूंकि, ऋतब्रत बनर्जी के बागी गुट के पास विधायकों का भारी बहुमत है, इसलिए विधायी विंग के टेस्ट में उनका पलड़ा बेहद मजबूत नजर आ रहा है. बागी गुट ने तर्क दिया है कि टीएमसी की राष्ट्रीय कार्यसमिति का तीन साल का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, इसलिए पुराना संगठन अब अमान्य है. जब तक चुनाव आयोग इस पर अंतिम फैसला नहीं लेता, तब तक कई चीजें अधर में लटकी रहेंगी.
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टीएमसी के मुख्य बैंक खातों में जमा करीब ₹676 करोड़ का फंड तब तक फ्रीज रहेगा, जब तक आयोग अपना फैसला नहीं सुना देता या दीवानी मुकदमा शुरू नहीं हो जाता. इसी साल कोलकाता नगर निगम के चुनाव होने हैं. यदि चुनाव आयोग का फैसला आने में देरी होती है, तो दोनों गुटों को अंतरिम नाम और सिंबल के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है.