साल 1997 में ममता बनर्जी कांग्रेस से अलग हुई थीं. अपनी नई पार्टी ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ बनाई. पार्टी का इलेक्शन सिंबल रखा गया, ‘दो फूल और घास’. इस सिंबल को खुद ममता बनर्जी ने अपने हाथों से स्कैच किया था. जब वह अपनी पार्टी का इलेक्शन सिंबल स्कैच कर रही थीं, तो उन्होंने नहीं सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि वह उस पर अपना हक ही खो देंगी. लेकिन 28 साल ममता बनर्जी अब अपनी पार्टी के इलेक्शन सिंबल का इस्तेमाल नहीं कर सकती.
फ्रीज हुआ सिंबल और नाम
चुनाव आयोग ने उनकी पार्टी ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और उसके इलेक्शन सिंबल ‘दो फूल और घास’ को फ्रीज कर दिया है. इसके बाद चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी और बागी गुट से पार्टी के नाम और सिंबल की पसंद पूछी थी. जिसके बाद दोनों गुटों ने चुनाव आयोग को अपनी-अपनी पसंद भेज दी. फिर ममता बनर्जी वाले गुट को ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ और अरूप रॉय – ऋतब्रत बनर्जी को ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न मिला. इसके अलावा ममता बनर्जी वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और बागी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया गया.
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चुनाव आयोग का कहना है कि यह तय करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था कि कौन सा गुट असली पार्टी है. ऐसे में पार्टी नाम और इलेक्शन सिंबल पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को होने वाले दो सीटों पर उपचुनाव के लिए दिए गए हैं.
इस तरह के विवादों को सुलझाने के लिए चुनाव आयोग साल 1969 के उस तरीके को अपनाती है, जब कांग्रेस का बंटवारा हुआ था.
जब कांग्रेस में हुई थी फूट
जिस दौर से आज ममता बनर्जी गुजर रही हैं, ऐसी ही स्थिति उनकी पुरानी पार्टी कांग्रेस में भी सामने आई थी. कांग्रेस के साथ यह साल 1969 में हुआ था. उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पार्टी के पुराने नेताओं से तंग आ चुकी थीं. उनके गुट ने जगजीवन राम को अपना अध्यक्ष चुन लिया. दूसरे गुट का कहना था कि उन्होंने एस निजलिंगप्पा का अध्यक्ष के तौर पर कार्यकाल पहले ही एक साल के लिए बढ़ा दिया था.
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EC ने ऐसे सुलझाया विवाद
फिर यह मामला पहुंचा चुनाव आयोग. चुनाव आयोग ने तीन पैमानों पर इस मामले को देखा. चुनाव आयोग देखता है कि इसके पीछे पार्टी का मकसद क्या है, फिर पार्टी का संविधान और तीसरा देखता है कि बहुमत किसके पास है. कांग्रेस वाले मामले को बहुमत वाले पैमाने से सुलझाया गया. पार्टी के ज्यादातर सांसद और राज्यों में विधायक इंदिरा गांधी गुट के साथ थे. इनके अलावा ‘ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी’ और उसके डेलीगेट्स का समर्थन भी इंदिरा गांधी के साथ था.
जनवरी 1971 में जगजीवन राम के नेतृत्व वाले इंदिरा गांधी गुट को असली कांग्रेस घोषित किया गया. चुनाव आयोग ने इस गुट को ‘दो बैलों’ वाला इलेक्शन सिंबल यूज करने का अधिकार दे दिया. इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस ने इस सिंबल की बजाय उस ‘गाय और बछड़े’ वाले चिह्न लेना पसंद किया, जो उन्हें बीच के समय में मिला था. इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की पार्टी सत्ता से बाहर हो गई. 1978 में पार्टी में एक और बंटवारा हुआ. उसके बाद नई कांग्रेस (I) को ‘गाय और बछड़े’ वाला चिह्न भी छोड़ना पड़ा.
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इंदिरा गांधी ने ‘बैलों की जोड़ी’ वाला सिंबल मांगा लेकिन चुनाव आयोग ने उसे फ्रीज कर दिया था. कांग्रेस को तीन विकल्प हाथी, साइकिल और खुले हाथ या हथेली का ऑप्शन दिया गया था. इसके बाद इंदिरा गांधी ने ‘हाथ’ को अपनी पार्टी का इलेक्शन सिंबल बना लिया और तब से यह ही सिंबल कांग्रेस का बना हुआ है.
शिवसेना और NCP में क्या हुआ था?
कांग्रेस के बाद शिवसेना और एनसीपी के मामले में भी चुनाव आयोग ने बंटवारे का विवाद सांसद और विधायकों की संख्या के आधार पर ही सुलझाया था. एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद शिवसेना दो गुटों में बंट गई थी. इसके बाद शिवसेना पर हक का मामला चुनाव आयोग पहुंचा. चुनाव आयोग ने पाया कि पार्टी के सांसद और विधायकों का समर्थन एकनाथ शिंदे के पास है. ऐसे में पार्टी का नाम और इलेक्शन सिंबल ‘धनुष-बाण’ एकनाथ शिंदे को मिल गया. शिवसेना के फाउंडर बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे को पार्टी के नए नाम और नए सिंबल के साथ सब्र करना पड़ा.
ऐसा ही मामला एनसीपी के साथ हुआ था. शरद पवार भी ममता बनर्जी की तरह पहले कांग्रेस में थे. 1990 के दशक में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी. इस मामले में भी चुनाव आयोग ने वैसे ही फैसला किया. चुनाव आयोग ने अजित के गुट को ही असली NCP घोषित कर दिया गया.
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जब टूट गई TMC
जून 2026 में टीएमसी में 58 विधायकों ने बगावत कर दी. इन बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार सोवनदेब चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी से निकाले गए नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता हासिल की. पांच दिन बाद, यह बगावत संसद तक पहुंच गई. वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 लोकसभा सदस्यों ने नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) पार्टी का दामन थाम लिया.
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