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महाभियोग प्रस्ताव क्या होता है, जिसे CEC के खिलाफ विपक्ष लाने की कर रहा तैयारी?

महाभियोग प्रस्ताव क्या होता है (Photo-AI Generated)
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मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर विपक्ष एक बार फिर संसद में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है. 24 सितंबर 2026 को कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि विपक्षी दल कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं और जल्द ही लोकसभा तथा राज्यसभा में नोटिस देने की तैयारी है. ऐसे में सवाल है कि महाभियोग प्रस्ताव क्या होता है, CEC को कैसे हटाया जा सकता है और राष्ट्रपति व जजों के मामले में इसकी प्रक्रिया क्या है?

महाभियोग क्या होता है?

महाभियोग यानी Impeachment किसी बड़े संवैधानिक पदाधिकारी को तय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत पद से हटाने की कार्रवाई है. भारत में तकनीकी तौर पर महाभियोग शब्द राष्ट्रपति के लिए इस्तेमाल होता है. वहीं सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों तथा CEC के लिए अलग संवैधानिक हटाने की प्रक्रिया है.

किन लोगों के खिलाफ लागू होती है प्रक्रिया?

राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के आधार पर महाभियोग के जरिए हटाया जा सकता है. वहीं सुप्रीम कोर्ट के सभी जज, यानी CJI समेत, और हाई कोर्ट के सभी जज, यानी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस समेत, दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर हटाए जा सकते हैं. CEC को भी विशेष संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है. संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है. यानी CEC को हटाने के लिए संसद की विशेष प्रक्रिया जरूरी होती है. इसके अलावा प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, सांसद या विधायक को महाभियोग के जरिए नहीं हटाया जाता. इनके पद से हटने या हटाने के अलग संवैधानिक और कानूनी प्रावधान हैं.

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राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग कैसे चलता है?

राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 61 में है. आरोप केवल संविधान के उल्लंघन से जुड़ा हो सकता है. प्रक्रिया संसद के किसी भी सदन से शुरू हो सकती है. प्रस्ताव लाने के लिए सदन के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस देना होता है. इसके बाद प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान होता है. जिस सदन में प्रस्ताव लाया गया है, वहां इसे कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पास होना जरूरी है. इसके बाद दूसरा सदन आरोपों की जांच करता है. राष्ट्रपति को अपना पक्ष रखने और अपना बचाव करने का अधिकार होता है. अगर दूसरा सदन भी आवश्यक विशेष बहुमत से आरोपों को सही मानने वाला प्रस्ताव पास कर देता है, तो राष्ट्रपति पद से हट जाते हैं.

CJI और जजों को कैसे हटाया जाता है?

सुप्रीम कोर्ट के जज को अनुच्छेद 124(4) के तहत और हाई कोर्ट के जज को अनुच्छेद 217 के तहत हटाया जा सकता है. आधार होता है दुर्व्यवहार या अक्षमता. इस प्रक्रिया की शुरुआत लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिस से हो सकती है. नोटिस स्वीकार होने के बाद तीन सदस्यों की जांच समिति बनाई जाती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज, हाई कोर्ट का एक चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ शामिल होता है.

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समिति आरोपों की जांच करती है. अगर आरोप साबित नहीं होते, तो प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती. अगर समिति कदाचार या अक्षमता को साबित मानती है, तो रिपोर्ट संसद में जाती है. इसके बाद दोनों सदनों में प्रस्ताव पास होना जरूरी है. प्रस्ताव को हर सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत का समर्थन चाहिए. दोनों सदनों से प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति जज को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं.

CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

CEC को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी है. संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है.इसलिए CEC के खिलाफ प्रस्ताव लाना अपने आप में उन्हें पद से हटाना नहीं है. प्रस्ताव के लिए संसद की निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी और जरूरी विशेष बहुमत हासिल करना होगा. मौजूदा मामले में विपक्ष पहले भी CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर चुका है. 24 सितंबर 2026 को विपक्ष की ओर से फिर दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी की जानकारी सामने आई है. यह कदम चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से जुड़ी हालिया रिपोर्टों के बाद सामने आया है.

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अब तक किनके खिलाफ प्रक्रिया चली?

भारत में अब तक किसी राष्ट्रपति को महाभियोग के जरिए पद से नहीं हटाया गया है. जजों के मामले में सबसे चर्चित मामला जस्टिस वी. रामास्वामी का है. 1993 में उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जज पद से हटाने का प्रस्ताव लोकसभा में आया. संसद के रिकॉर्ड के मुताबिक इस पर जांच समिति की रिपोर्ट के बाद लोकसभा में मतदान हुआ, लेकिन प्रस्ताव को जरूरी समर्थन नहीं मिला. इसलिए वे पद से नहीं हटे.

जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस पी.डी. दिनाकरन के खिलाफ भी हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. दोनों मामलों में संसद के जरिए अंतिम रूप से हटाने से पहले ही संबंधित जज पद से अलग हो गए. हाल के वर्षों में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भी संसद में हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई. संसद के रिकॉर्ड में उनके मामले की जांच समिति की रिपोर्ट दर्ज है.

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