भारत एक विविधताओं से संपन्न देश है, जहां अलग-अलग धर्म, मान्यताओं और विचारों वाले लोग रहते हैं. नॉनवेज खाने वालों में भारत का नाम दुनिया में बड़े देशों में आता है, लेकिन अक्सर मांसाहार को लेकर चौंकाने वाले फैसले सामने आते रहते हैं. हाल ही में तमिलनाडु से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसमें 31 जुलाई से चिकन बिक्री पर रोक लगाने का ऐलान किया गया है. इस फैसले ने न सिर्फ उपभोक्ताओं बल्कि पोल्ट्री उद्योग तक सभी की चिंता बढ़ा दी है.
चिकन ट्रेडर्स फेडरेशन ने किया बैन का आह्वान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये फैसला कोई सरकारी प्रतिबंध नहीं है, बल्कि तमिलनाडु चिकन ट्रेडर्स फेडरेशन ने अपने सदस्य व्यापारियों से राज्यभर में चिकन की बिक्री बंद करने का आह्वान किया है. इस फैसले को पुडुचेरी के कई चिकन व्यापारियों का भी समर्थन मिला है. व्यापारियों का आरोप है कि ब्रॉयलर कंपनियां सरकार द्वारा तय किए गए खाद्य सुरक्षा और पशु कल्याण संबंधी नियमों का पालन नहीं कर रही हैं, जिससे ग्राहकों तक अशुद्ध चिकन पहुंचने का खतरा बढ़ रहा है.
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क्या है विवाद का सबसे बड़ा कारण?
विवाद का सबसे बड़ा कारण ब्रॉयलर मुर्गों के लिए लागू 'प्री-स्लॉटर फीड विदड्रॉल' नियम है. सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, मुर्गों को बाजार या प्रोसेसिंग यूनिट भेजने से कम से कम 12 घंटे पहले उन्हें दाना देना बंद कर देना चाहिए. एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा करने से मुर्गों का पाचन तंत्र काफी हद तक खाली हो जाता है, जिससे उनके आखिरी समय में आंत फटने या मल के संपर्क में आने की संभावना कम रहती है.
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नियमों की अनदेखी
इस प्रक्रिया से साल्मोनेला, ई.कोलाई और कैंपिलोबैक्टर जैसे हानिकारक बैक्टीरिया से मांस के दूषित होने का जोखिम भी घटता है. इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन के दौरान गंदगी कम फैलती है और चिकन की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है. फेडरेशन का आरोप है कि कई ब्रॉयलर कंपनियां इस नियम की अनदेखी कर रही हैं. उनका कहना है कि मुर्गों को ट्रक में लोड किए जाने तक लगातार दाना खिलाया जाता है, जिससे हर पक्षी का वजन करीब 100 ग्राम तक बढ़ जाता है.
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किस पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
व्यापारियों के अनुसार, अतिरिक्त दाने पर कंपनियों का खर्च भले ही कुछ रुपये का हो, लेकिन बढ़े हुए वजन का आर्थिक बोझ आखिरकार थोक व्यापारियों, खुदरा दुकानदारों और आखिर में ग्राहकों पर पड़ता है. फेडरेशन का दावा है कि उसने कई बार कंपनियों से नियमों का पालन करने की मांग की, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ. इसी के विरोध में बिक्री रोकने का निर्णय लिया गया है. अगर ये विवाद जल्द खत्म नहीं हुआ तो इसका असर ग्राहकों के अलावा रेस्टोरेंट, ढाबे और चिकन से जुड़े खानों पर भी पड़ेगा.