Amit Shah demographic panel: देश की आबादी और सामाजिक संरचना में हो रहे अप्राकृतिक बदलावों और अवैध आप्रवास (घुसपैठ) से निपटने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने ‘डेमोग्राफिक पैनल’ यानी जनसांख्यिकी परिवर्तन पर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है. इस विशेष आयोग का मुख्य उद्देश्य अवैध घुसपैठ के पैटर्न का गहराई से विश्लेषण करना और देश की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार को ठोस नीतिगत उपाय सुझाना है. यह समिति जनसांख्यिकीय बदलाव को राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा मानती है. यह समिति देश के अलग-अलग हिस्सों में जनसंख्या के संतुलन में आ रहे बदलावों का बारीकी से विश्लेषण करेगी.
समिति में कौन-कौन शामिल हैं?
सरकार द्वारा गठित इस विशेष और महत्वपूर्ण कमिटी का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर को बनाया गया है. उनके कानूनी और प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए इस गंभीर विषय की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है. इस हाई-लेवल कमिटी को बेहद मजबूत और असरदार बनाने के लिए प्रशासनिक, सुरक्षा और आर्थिक मामलों के तीन बड़े विशेषज्ञों को इसमें बतौर मेंबर (सदस्य) शामिल किया गया है, इनमें सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्रा, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य व अर्थशास्त्री डॉ. शमिका रवि शामिल हैं. इसके साथ ही इसमें जनगणना आयुक्त को भी शामिल किया गया है.
सदस्य सचिव: गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (Foreigners-I) इस जिम्मेदारी को संभालेंगे.
क्या करेगी यह कमिटी?
इस विशेष पैनल को अपनी विस्तृत रिपोर्ट और कार्ययोजना सौंपने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया है. अपने कार्यकाल के दौरान यह समिति मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन क्षेत्रों पर काम करेगी:
- असामान्य बदलावों की जांच और विश्लेषण: समिति यह पता लगाएगी कि देश के किन खास क्षेत्रों और सामाजिक समुदायों में असामान्य रूप से जनसंख्या का असंतुलन पैदा हुआ है.
- अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन: भारत में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और उनके वापस भेजने के लिए एक स्थायी और मजबूत कानूनी व्यवस्था का सुझाव देना इस समिति का प्रमुख काम होगा.
- कड़े नियमों और नीति का निर्माण: भविष्य में किसी भी तरह की घुसपैठ को पूरी तरह रोकने के लिए सीमा प्रबंधन को कैसे मजबूत किया जाए, समिति इस पर सरकार को विस्तृत योजना सौंपेगी ताकि डेमोग्राफिक असंतुलन को सुधारा जा सके.
कमिटी में शामिल तीनों दिग्गज विशेषज्ञ कौन?
- पूर्व IPS बालाजी श्रीवास्तव: सुरक्षा और खुफिया मामलों के एक्सपर्ट
बालाजी श्रीवास्तव 1988 बैच के (AGMUT कैडर) रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं. वे दिल्ली पुलिस, मिजोरम और पुडुचेरी जैसे संवेदनशील इलाकों में कानून-व्यवस्था संभाल चुके हैं. दिल्ली पुलिस में उन्होंने स्पेशल सेल, इंटेलिजेंस, इकोनॉमिक ऑफेंस विंग और विजिलेंस जैसे बड़े विभागों का नेतृत्व किया है. साल 2021 में वे दिल्ली पुलिस कमिश्नर का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल चुके हैं. आंतरिक सुरक्षा, खुफिया तंत्र और संगठित अपराध को रोकने में उनका लंबा अनुभव इस कमिटी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है.
- पूर्व IAS दुर्गाशंकर मिश्रा: प्रशासनिक सुधारों के चाणक्य
उत्तर प्रदेश कैडर के 1984 बैच के आईएएस अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्रा ने आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की है. वे केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के सचिव रह चुके हैं, जहां उन्होंने स्मार्ट सिटी मिशन और AMRUT योजना जैसी बड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया. वे दिल्ली मेट्रो (DMRC) के चेयरमैन और दिसंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव भी बनाए गए. उनका कार्यकाल कई बार बढ़ाया गया, जो सरकार में उनके भरोसे को दिखाता है. प्रशासनिक सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में उनका गहरा अनुभव है.
- डॉ. शमिका रवि: देश की जानी-मानी अर्थशास्त्री
डॉ. शमिका रवि वर्तमान में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की सदस्य और भारत सरकार की सचिव हैं. इससे पहले वे ब्रूकिंग इंडिया में अनुसंधान निदेशक, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) में आर्थिक नीति की उपाध्यक्ष और ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन में गवर्नेंस स्टडीज प्रोग्राम की अनिवासी वरिष्ठ फेलो जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुकी हैं. आर्थिक और सामाजिक आंकड़ों के विश्लेषण में उनकी विशेषज्ञता कमिटी के काम आएगी.
आखिर क्यों पड़ी इस कमेटी की जरूरत?
पिछले कुछ सालों में असम, बंगाल, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड जैसे सीमावर्ती राज्यों के साथ-साथ बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और यूपी जैसे राज्यों में डेमोग्राफिक चेंज (जनसांख्यिकी बदलाव) को लेकर विवाद सामने आए हैं. इन इलाकों में अवैध प्रवास, सीमा पार से घुसपैठ और फर्जी पहचान पत्रों के सहारे बसने के आरोप लगते रहे हैं.
सरकार का मानना है कि इस बदलाव का सीधा असर वहां के स्थानीय संसाधनों, रोजगार, सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ रहा है. खासकर जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक पहचान और जमीन के अधिकारों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं. इसी वजह से सरकार पूरे देश के डेमोग्राफिक पैटर्न का वैज्ञानिक और संस्थागत अध्ययन कराना चाहती है, ताकि वास्तविक स्थिति के आधार पर ठोस नीतियां बनाई जा सकें.
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