India’s Rural-Urban Education Gender Gap: इस बात में कोई शक नहीं है कि भारत में लड़कियों की सारक्षरता पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हुई है, लेकिन इसके बावजूद रूरल-अर्बन डिवाइड साफ नजर आता है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (2023-24) के डेटा के मुताबिक, भारत ने सेकेंडरी एजुकेशन में जेंडर गैप को कम करने में तरक्की की है, लेकिन गांवों के मुकाबले शहरी इलाकों में ये सुधार कहीं ज्यादा दिख रहा है.
गांवों में जेंडर एजुकेशन गैप काफी ज्यादा
सर्वे से पता चलता है कि देश भर में 54.6% पुरुषों और 46.4% महिलाओं ने कम से कम 10 साल की स्कूलिंग पूरी की है NFHS-5 की तुलना में, महिलाओं का आंकड़ा 5.4 परसेंट पॉइंट बढ़ा है, जबकि पुरुषों का 4.4 पॉइंट बढ़ा है, जिससे कुल जेंडर गैप 9.2 से घटकर 8.2 पॉइंट रह गया है.
हालांकि रूरल-अर्बन डिवाइड ज्यादा साफ तस्वीर दिखाता है शहरी भारत में, 64% पुरुषों और 61.5% महिलाओं ने 10 या उससे ज्यादा साल की एजुकेशन पूरी की है, जिससे जेंडर गैप सिर्फ़ 2.5 परसेंट पॉइंट रह गया है गांव के इलाकों में, पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 49.9% और महिलाओं के लिए 39.7% है, जिससे 10.2 पॉइंट का गैप बनता है.
इन राज्यों में दिखता है बड़ा अंतर
केरल, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी जैसे कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शहरी महिलाओं ने पढ़ाई-लिखाई में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है. ग्रामीण इलाकों की बात करें तो महिलाएं सिर्फ केरल, सिक्किम और मेघालय में पुरुषों से आगे हैं. ये अंतर बिहार और यूपी में खास तौर पर देखा जा सकता है, बिहार में 10 साल की पढ़ाई पूरी करने वालों में शहरी महिलाओं की संख्या शहरी पुरुषों से थोड़ी ज्यादा है, जबकि ग्रामीण पुरुषों को ग्रामीण महिलाओं की तुलना में ज्यादा फायदा है
ग्रामीण महिलाओं को ज्यादा नुकसान
देश भर में, एक शहरी महिला के 10 साल की स्कूली पढ़ाई पूरी करने की संभावना एक ग्रामीण महिला की तुलना में 21.8 परसेंट पॉइंट ज्यादा है पुरुषों के लिए, शहरी-ग्रामीण अंतर 14.1 पॉइंट है. केरल दिखाता है कि कैसे पहुंच से फर्क कम हो सकता है वहां 84.6% ग्रामीण महिलाओं ने 10 या उससे ज्यादा साल की पढ़ाई पूरी की है, जबकि शहरी आंकड़ा 88.7% है
क्यों है ऐसा गैप?
डेटा से पता चलता है कि पास के सेकेंडरी स्कूल और ट्रांसपोर्ट तक पहुंच लड़कियों की पढ़ाई में एक बड़ा रोल अदा करती है जहां सेकेंडरी स्कूल आसानी से मिल जाता है, वहां जेंडर गैप काफी कम हो जाता है. बचपन की शुरुआती पढ़ाई एक अलग पैटर्न दिखाती है, जिसमें गांव के प्रीस्कूल में अटेंडेंस कभी-कभी शहरों के लेवल से ज्यादा हो जाती है, जो कुछ हद तक आंगनवाड़ी सेंटर की पहुंच को दिखाता है.
कैसे खत्म होगा अंतर?
इन नतीजों से पता चलता है कि लड़कियों की पढ़ाई को बेहतर बनाने के लिए जगह, स्कूल की अवेलेबिलिटी और वहां तक लड़कियां कैसे पहुंचे, इस पर ध्यान देने की जरूरत है, साथ ही घर की पसंद के हिसाब से पारंपरिक तरीकों पर भी फोकस करना होगा. परिवार को भी अपनी बच्चियों की बेहतर पढ़ाई और लड़कों से एजुकेशन में बराबरी पर ध्यान देना होता, तभी आने वाले दशकों में हम ये अंतर को खत्म या काफी कम कर सकते हैं.
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