आरबीआई (RBI) की मौद्रिक नीति और सरकार के बड़े टैक्स रिफॉर्म्स के बाद शुक्रवार को बाजार में एक अनोखा नजारा देखने को मिला। एक तरफ जहां नीतिगत मोर्चे पर सरकार और रिजर्व बैंक ने विदेशी कूटनीति और रुपये को संभालने के लिए चौतरफा बाजूका (बड़ा पैकेज) चला दिया, वहीं दूसरी तरफ शेयर बाजार का बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी (Nifty) पूरी तरह शांत या सपाट (Flat) बंद हुआ।
आम तौर पर इतने बड़े आर्थिक सुधारों के बाद शेयर बाजार में बंपर तेजी (Relief Rally) आती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. बाजार के इस रुख ने साफ कर दिया है कि निवेशकों की नजरें अब उन मोर्चों पर टिकी हैं जो न तो आरबीआई के हाथ में हैं और न ही सरकार के बस में।
पॉलिसी में क्या था वो मेगा पैकेज?
आरबीआई और सरकार ने मिलकर देश में डॉलर्स के प्रवाह को बढ़ाने और रुपये की कमजोरी को रोकने के लिए कई बड़े और कड़े नीतिगत फैसले लिए हैं। सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के लिए सरकारी बॉन्ड्स (G-Secs) पर लगने वाले लॉन्ग-पेंडिंग टैक्स के झंझटों को खत्म कर दिया है।
सरकारी कंपनियों (PSUs) को विदेशों से कर्ज (ECBs) जुटाने के लिए रियायती स्वाइप विंडो दी गई है और बैंकों को विदेशी मुद्रा अनिवासी जमा (FCNR-B) जुटाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। बाजार के जानकारों का अनुमान है कि इन कदमों से आने वाले महीनों में देश के भीतर करीब 30 से 40 अरब डॉलर का विदेशी फंड आ सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि यह पैसा कम से कम 3 से 5 साल की मैच्योरिटी वाला (‘Sticky Money’) होगा, जो वैश्विक उतार-चढ़ाव में अचानक देश से बाहर नहीं भागता।
तो फिर निफ्टी (Nifty) क्यों रह गया फ्लैट?
बाजार के विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे 3 सबसे बड़े कारण और ‘अज्ञात’ चुनौतियां हैं जो निवेशकों को सता रही हैं:
तेल का झटका और क्रूड का गणित (The Oil Factor)
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय किसी लिक्विडिटी या मांग की कमी से नहीं, बल्कि सप्लाई चेन के झटके (Supply Shock) से जूझ रही है. पिछले दो महीनों में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल रही है। हालांकि, आरबीआई ने अपने नए ग्रोथ और महंगाई के अनुमानों में कच्चे तेल का भाव 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास माना है। बाजार को डर है कि अगर तेल की कीमतें इससे ऊपर बनी रहीं, तो यह घरेलू मांग को दबा देगी और रुपये पर दबाव फिर से बढ़ जाएगा।
अल नीनो (El Niño) और मानसून का खतरा
कच्चे तेल के साथ-साथ बाजार में अब अल नीनो और मानसून की बेरुखी को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। अगर देश में भयंकर गर्मी और असमान मानसून के कारण खेती प्रभावित होती है, तो ईंधन की महंगाई के साथ खाद्य महंगाई (Food Inflation) भी बेकाबू हो सकती है। भोजन और ईंधन, ये दो ऐसे मोर्चे हैं जो आम आदमी के घरेलू बजट और बाजार की दिशा तय करते हैं।
अमेरिकी बॉन्ड्स के मुकाबले कमजोर रिटर्न (The Yield Arithmetic)
विदेशी निवेशकों के लिए भारत ने अपने रास्ते जरूर आसान किए हैं, लेकिन गणित अभी भी भारत के पक्ष में नहीं है। भारतीय सरकारी बॉन्ड पर इस समय लगभग 6.2% से 6.3% का रिटर्न (Yield) मिल रहा है, जबकि अमेरिकी ट्रेजरी (US Treasury) पर यह लगभग 4.5% है। जब विदेशी निवेशक इस पर 3% से 3.5% की हेजिंग लागत जोड़ते हैं, तो उन्हें नेगेटिव कैरी का सामना करना पड़ता है। यानी टैक्स छूट के बावजूद अमेरिकी निवेशकों के लिए भारतीय बॉन्ड मार्केट अभी भी बहुत मुनाफे का सौदा नहीं दिख रहा है।
Resilient Growth: डरने की बात नहीं, पर सतर्कता जरूरी
बाजार के लिए सबसे बड़ी तसल्ली की बात यह है कि आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा के बयानों में कोई घबराहट या पैनिक नहीं था। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी (GDP) ग्रोथ का अनुमान मामूली रूप से घटाकर 6.6% (पहले 6.9%) किया है और महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1% (पहले 4.6%) किया है। आरबीआई का स्पष्ट संदेश है कि माहौल चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था किसी गंभीर तनाव की ओर नहीं बढ़ रही है।
सरकार और रिजर्व बैंक ने अपनी तरफ से सारे सुरक्षा चक्र (Buffers) तैयार कर दिए हैं। अब शेयर बाजार और रुपये की किस्मत पूरी तरह से इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल (Brent Crude) के तेवरों और देश में मानसून की चाल पर निर्भर करेगी।
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