ग्लोबल ऑटोमोबाइल सेक्टर से एक बहुत बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आ रही है. दुनिया की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनियों में से एक फॉक्सवैगन (Volkswagen) में बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है. लागत (Cost) घटाने और घाटे से उबरने के लिए कंपनी करीब 1 लाख कर्मचारियों की छंटनी और सालाना 5 लाख कारों का प्रोडक्शन कम करने का बड़ा प्लान बना रही है.

सीईओ ओलिवर ब्लूम (Oliver Blume) के इस फैसले के बाद कंपनी के भीतर भूचाल आ गया है और कर्मचारी यूनियन ने सीधे तौर पर देशव्यापी हड़ताल (Strike) की चेतावनी दे डाली है. आइए समझते हैं कि आखिर इतनी बड़ी दिग्गज कं पनी अचानक इस मोड़ पर क्यों आ खड़ी हुई है.

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आखिर Volkswagen में क्यों आई छंटनी की नौबत?

कंपनी प्रबंधन का मानना है कि पुराने बिजनेस मॉडल से अब काम नहीं चलने वाला. फॉक्सवैगन के सामने 3 सबसे बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं:

  1. चीन के बाजार में झटका: चीन की ऑटो इंडस्ट्री बहुत तेजी से बदली है और वहां स्थानीय इलेक्ट्रिक कारों की वजह से फॉक्सवैगन की बिक्री में बड़ी गिरावट आई है.
  2. जर्मनी में मैन्युफैक्चरिंग महंगी: प्रतिद्वंद्वी कंपनियों (Competitors) की तुलना में फॉक्सवैगन की उत्पादन लागत करीब 30 फीसदी ज्यादा आ रही है.
  3. 10 अरब यूरो की भारी कटौती का लक्ष्य: कंपनी अपने मुनाफे के मार्जिन को बढ़ाकर 9% करना चाहती है, जिसके लिए कम से कम 10 अरब यूरो (Billions of Euros) की अतिरिक्त लागत कम करनी होगी.

इतना ही नहीं, कंपनी कारों के मॉडल्स, उनके ऑप्शंस और अधिकारियों की संख्या में भी भारी कटौती करने की तैयारी में है.

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सपनों की दुनिया में जी रहे CEO: यूनियन का फूटा गुस्सा
सीईओ ओलिवर ब्लूम की इस कॉस्ट-कटिंग योजना का कंपनी की पावरफुल ट्रेड यूनियन IG Metall और कर्मचारियों ने कड़ा विरोध किया है. यूनियन नेताओं का कहना है कि 9% मुनाफे का लक्ष्य सपनों की दुनिया (Fantasy World) जैसा है. अगर यह योजना वापस नहीं ली गई, तो कारखानों में काम पूरी तरह ठप्प कर हड़ताल की जाएगी.

यूनियन का आरोप है कि सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और चीन की रणनीति में मैनेजमेंट ने जो गलतियां कीं, उसकी सजा अब आम कर्मचारियों को दी जा रही है. श्रम प्रतिनिधियों ने मांग की है कि सभी जर्मन प्लांट्स के कर्मचारियों को नौकरी न जाने की लिखित गारंटी दी जाए.

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क्या अकेले फैसला ले पाएंगे CEO?
फॉक्सवैगन में छंटनी का यह फैसला लागू करना सीईओ ब्लूम के लिए बिल्कुल आसान नहीं होने वाला है. जर्मनी में कंपनी बोर्ड और फैसलों में ट्रेड यूनियनों का बहुत बड़ा प्रभाव होता है. लोअर सैक्सनी (Lower Saxony) राज्य सरकार की भी कंपनी में अहम हिस्सेदारी है, जो इतनी बड़ी संख्या में छंटनी के फैसले को वीटो (रोक) कर सकती है.

इलेक्ट्रिक गाड़ियों की रेस और चीन के बदलते मार्केट ने दुनिया की दिग्गज ऑटो कंपनियों की कमर तोड़ दी है. फॉक्सवैगन का यह संकट यह साफ दर्शाता है कि आने वाले समय में ग्लोबल ऑटो इंडस्ट्री में और भी बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं.

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