देश के दिग्गज उद्योगपति और 'रेमंड' को घर-घर का ब्रांड बनाने वाले विजयपत सिंघानिया अब हमारे बीच नहीं रहे. एक समय में 'द कंप्लीट मैन' की परिभाषा गढ़ने वाले सिंघानिया की अपनी जिंदगी के आखिरी साल किसी त्रासदी से कम नहीं थे. 12,000 करोड़ रुपये के साम्राज्य के मालिक रहे सिंघानिया ने अपने जीवन के अंतिम दिन मुंबई के एक किराए के घर में बिताए, जो भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे भावुक कहानियों में से एक है. व्यापार और साहसिक कार्यों के लिए उन्हें 2006 में पद्म भूषण से नवाजा गया. साथ ही, उन्हें भारतीय वायु सेना में मानद 'एयर कोमोडोर' की रैंक भी दी गई थी.
वो एक फैसला और बिखर गया सब कुछ
विजयपत सिंघानिया के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साल 2015 था. उन्होंने पिता के मोह में आकर अपने साम्राज्य के सारे शेयर बेटे गौतम सिंघानिया के नाम कर दिए थे. उन्हें लगा था कि रिटायरमेंट के बाद वे सुकून से रहेंगे, लेकिन यही उनकी 'हिमालय जैसी भूल' साबित हुई. जल्द ही पिता-पुत्र के रिश्ते इतने कड़वे हो गए कि उन्हें अपने ही बनाए 'जेके हाउस' से बाहर निकलना पड़ा. उन्होंने अपनी आत्मकथा 'An Incomplete Life' में लिखा था कि "बेटे को सब कुछ देना मेरी सबसे बड़ी गलती थी."
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वर्ल्ड रिकॉर्ड और लंदन टू दिल्ली बाय एयरक्राफ्ट
सिंघानिया सिर्फ बिजनेस के खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि उन्हें खतरों से खेलने का शौक था. उनके जीवन के कुछ ऐसे तथ्य जो शायद ही लोग जानते हों. 2005 में उन्होंने 67 साल की उम्र में 69,000 फीट की ऊंचाई पर हॉट एयर बैलून उड़ाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था. उन्होंने अकेले माइक्रोलाइट एयरक्राफ्ट (छोटे विमान) में 23 दिनों में लंदन से दिल्ली तक की उड़ान भरी थी, जो उस समय एक अविश्वसनीय उपलब्धि थी.
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अंतिम समय का संघर्ष
अपनी आलीशान जिंदगी के लिए मशहूर रहे सिंघानिया ने अंतिम समय में कानूनी लड़ाइयां लड़ीं. वे अक्सर मीडिया के सामने अपने हक और मान-सम्मान की बात करते दिखे. उनके निधन के साथ ही भारतीय उद्योग जगत का वह सितारा डूब गया जिसने दुनिया को 'सूटिंग और शर्टिंग' का नया सलीका सिखाया, लेकिन खुद की जिंदगी के अंत में वह 'अधूरेपन' का शिकार रह गए.