अमेरिकी शेयर बाजार में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है. अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बाद वॉल स्ट्रीट में पिछले 19 महीनों की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई. खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक कंपनियों के शेयरों में ऐसी बिकवाली आई कि देखते ही देखते निवेशकों के 2.5 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 23.50 लाख करोड़ रुपये) पानी में बह गए. लेकिन इस पूरी दुनिया में मचे तहलका के बावजूद भारतीय शेयर बाजार पूरी मजबूती से खड़ा रहा और उसमें तेजी देखने को मिली. आइए बहुत ही आसान और सीधी भाषा में समझते हैं कि अमेरिका में क्या हुआ और भारत का बाजार कैसे बचा रहा.
अमेरिका में क्यों गिरे AI और टेक कंपनियों के शेयर?
अमेरिकी बाजार में आई इस गिरावट के पीछे वहां का राजनीतिक माहौल सबसे बड़ी वजह है. डेमोक्रेटिक पार्टी के आने के बाद निवेशकों को डर है कि सरकार एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर्स और बिजली खपत पर सख्त नियम लागू कर देगी. सरकार ऐसे नियम बनाने की सोच रही है जिससे डेटा सेंटर की वजह से बढ़ने वाली बिजली की कीमतों से आम लोगों को बचाया जा सके.
दिग्गज कंपनियों को नुकसान:
एनवीडिया (Nvidia) के शेयर 4% और स्पेसएक्स (SpaceX) के शेयर 9% तक टूट गए. इसके अलावा मेटा, अमेजन और गूगल जैसी बड़ी कंपनियों के शेयरों में भी बिकवाली हुई.
दुनिया भर के बाजारों में दिखा असर
अमेरिकी बाजारों की गिरावट से दुनिया के बाकी बाजार भी अछूते नहीं रहे. दक्षिण कोरिया का बाजार 6% तक टूट गया. वहीं जापान का निक्केई इंडेक्स भी 6% गिरा. ताइवान का बाजार 4.5% नीचे आ गया और यूरोप के बाजार भी लाल निशान में बंद हुए.
भारतीय शेयर बाजार में क्यों रही तेजी?
पूरी दुनिया के बाजारों में हाहाकार मचने के बावजूद भारतीय शेयर बाजार हरे निशान में बने रहे. इसके 3 बड़े कारण हैं:
- विदेशी निवेशकों (FIIs) की बड़ी खरीदारी: विदेशी संस्थागत निवेशकों ने गुरुवार को भारतीय बाजार में लगभग 15,000 करोड़ रुपये की बंपर खरीदारी की. पिछले छह सालों में एक दिन में की गई यह सबसे बड़ी लिवाली है.
- भारत का अलग मार्केट ढांचा: भारतीय शेयर बाजार में अमेरिका की तरह केवल एआई इंफ्रास्ट्रक्चर वाली कंपनियों का ज्यादा दबदबा नहीं है. इसके अलावा, अमेरिका में आई इस मंदी का फायदा भारतीय आईटी (IT) कंपनियों को मिलने की उम्मीद में आईटी शेयरों में लिवाली हुई.
- सस्ता हुआ कच्चा तेल : कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गई हैं. तेल सस्ता होने से भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव कम हुआ है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है.