मुंबई/नई दिल्ली: वैश्विक अनिश्चितता और कच्चे तेल की सप्लाई में बाधा के चलते भारतीय रुपया गुरुवार, 19 मार्च को अपने अब तक के सबसे निचले स्तर (All-time Low) पर बंद हुआ। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 93 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करते हुए 93.12 पर जा गिरा। इससे पहले बुधवार को यह 92.63 के स्तर पर था।

गिरावट की 3 मुख्य वजहें:

  1. कच्चे तेल का शॉक: मिडिल ईस्ट में प्रमुख ऊर्जा बुनियादी ढांचों पर हमलों के बाद गुरुवार को कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं। भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल आयात करता है, ऐसे में तेल महंगा होने का सीधा असर रुपये की वैल्यू पर पड़ता है।
  2. विदेशी निवेशकों की नाराजगी: तेल की कीमतों में अस्थिरता को देखते हुए विदेशी निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से हाथ खींचना शुरू कर दिया है। मार्च महीने में अब तक $8 बिलियन (करीब 74,000 करोड़ रुपये) से ज्यादा की पूंजी बाहर जा चुकी है, जो जनवरी 2025 के बाद सबसे बड़ी निकासी है।
  3. महंगाई और ग्रोथ का खतरा: अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि ऊर्जा की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ धीमी हो सकती है और महंगाई (Inflation) बेकाबू हो सकती है। आयात महंगा होने से माल ढुलाई और उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी।

ग्लोबल राहत की कोशिशें
हालांकि, शुक्रवार सुबह कुछ राहत के संकेत मिले हैं। यूरोपीय देशों और जापान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) के जरिए जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए हाथ मिलाया है। वहीं, अमेरिका ने भी तेल की आपूर्ति बढ़ाने के कदम उठाए हैं, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी देखी गई है।

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आम आदमी पर क्या होगा असर?
रुपये के कमजोर होने का मतलब है कि अब विदेश यात्रा, विदेशों में पढ़ाई और आयातित सामान (जैसे मोबाइल, लैपटॉप और कच्चा तेल) महंगे हो जाएंगे। यदि रुपया इसी स्तर पर बना रहता है, तो आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।

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