नई दिल्ली: देश के खेतों, पर्यावरण और हमारी थाली में घुल रहे सबसे खतरनाक रसायनों में से एक पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) पर मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा कदम उठाया है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने इस जानलेवा खरपतवारनाशक (हर्बिसाइड) पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आधिकारिक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब देश का कोई भी व्यक्ति पैराक्वाट डाइक्लोराइड का न तो आयात (Import) कर सकेगा और न ही इसका निर्माण, बिक्री, परिवहन, वितरण या उपयोग कर पाएगा। इस जहर पर अब पूरी तरह से कानूनी ताला लग चुका है।
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क्यों माना जाता है इसे चिकित्सा जगत का काल?
मेडिकल साइंस में पैराक्वाट डाइक्लोराइड को एक बेहद खौफनाक रसायन माना जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति इसके संपर्क में आ जाए या गलती से इसे निगल ले, तो उसकी जान बचाना लगभग नामुमकिन हो जाता है, क्योंकि इसका दुनिया में कोई तोड़ (Antidote) उपलब्ध नहीं है। इलाज के दौरान यह केमिकल इंसान के फेफड़ों को बहुत तेजी से गला देता है। इसके अलावा, यह लिवर और किडनी को पूरी तरह फेल करने के साथ-साथ त्वचा और आंखों को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
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मूंग की फसल में जहर का खेल बना प्रतिबंध का बड़ा आधार
सरकारी नियमों के मुताबिक, पैराक्वाट को केवल 9 स्वीकृत फसलों (चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का और अंगूर) के लिए ही मंजूरी दी गई थी। लेकिन कंपनियों के कानूनी कवच और लापरवाही के चलते देश के कई हिस्सों, जैसे राजस्थान और मध्य प्रदेश में, इसका भारी दुरुपयोग हो रहा था।
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किसान लेबर का खर्च और समय बचाने के लिए कटाई से ठीक पहले मूंग की खड़ी फसल को तेजी से सुखाने के लिए इस जहर का अवैध रूप से अंधाधुंध छिड़काव कर रहे थे। नतीजा यह हुआ कि जिस मूंग की दाल को लोग सेहत बनाने के लिए खा रहे थे, उसमें इस जानलेवा केमिकल के अंश मिलने लगे थे। सरकार ने इस खतरनाक ऑफ-लेबल यानी अवैध उपयोग को बैन लगाने का एक सबसे बड़ा कारण माना है।
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कंपनियों के लिए सख्त आदेश: 3 महीने में सरेंडर करें सर्टिफिकेट
केरल जैसे राज्यों ने पहले भी इस पर रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन एग्रो-केमिकल कंपनियों ने अदालतों में तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर इसे पलटवा दिया था। इस बार केंद्र सरकार ने कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 27 के तहत सीधे पूरे देश में इस पर प्रतिबंध लगाया है।
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इस एक्शन के बाद एग्रो-केमिकल कंपनियों को जारी किए गए सभी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट तुरंत प्रभाव से रद्द माने जाएंगे। जिन भी निर्माताओं या डीलरों के पास इसके स्टॉक या सर्टिफिकेट हैं, उन्हें 3 महीने के भीतर इसे अपनी रजिस्ट्रेशन कमेटी को सरेंडर करना होगा। ऐसा न करने पर सीधी कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई होगी। राज्य सरकारों को इस आदेश को जमीन पर सख्ती से लागू करने, औचक निरीक्षण करने और दोषियों पर मुकदमा दर्ज करने के पूरे अधिकार दे दिए गए हैं।
जिन देशों ने बनाया, उन्होंने दशकों पहले बैन किया
इस विनाशकारी केमिकल का इतिहास 144 साल पुराना है। साल 1882 में ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने इसे कपड़ों को रंगने वाली एक रासायनिक डाई के रूप में बनाया था। बाद में 1955 में ब्रिटेन की एक लैब में पता चला कि यह पौधों को पल भर में सुखा सकता है, जिसके बाद 1962 में इसे ग्रामोक्सोन (Gramoxone) नाम से बाजार में उतारा गया।
दुनिया का दोहरा चेहरा:
यह बेहद हैरान करने वाला विरोधाभास है कि इस जहर को बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी सिंजेंटा के घर, स्विट्जरलैंड ने 1989 में ही इसे बैन कर दिया था। ऑस्ट्रिया ने 1993, इंग्लैंड ने 2007 और चीन ने 2017 में अपनी धरती पर इसके इस्तेमाल को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित कर दिया था। लेकिन विडंबना देखिए कि इंग्लैंड और चीन जैसे देश खुद के नागरिकों को बचाकर, भारत जैसे विकासशील देशों में तिजोरियां भरने के लिए इसका उत्पादन कर बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट करते रहे।
आपत्तियों और सुझावों के लिए 30 दिनों का समय
क्योंकि यह अभी एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन है, इसलिए सरकार ने प्रभावित होने वाले किसानों, आम जनता या कंपनियों को अपनी आपत्तियां और सुझाव लिखित रूप में भेजने के लिए 30 दिनों का समय दिया है। यह सुझाव संयुक्त सचिव (प्लांट प्रोटक्शन), कृषि भवन, नई दिल्ली को भेजे जा सकते हैं, जिन पर विचार करने के बाद इस प्रतिबंध को अंतिम रूप से पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा।