भारतीय रुपया इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। साल 2026 की शुरुआत से अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में लगभग 7% की गिरावट आ चुकी है। 15 मई को पहली बार रुपया 96 के स्तर को पार कर गया, जिससे बाजार में हलचल मच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो रुपया 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी छू सकता है।

क्यों फ्री-फॉल में है रुपया?

कच्चे तेल का दबाव: भारत अपनी जरूरत का 88-90% तेल आयात करता है। पिछले दो महीनों से ब्रेंट क्रूड $100 प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है, जिससे भारत का आयात बिल (Import Bill) काफी बढ़ गया है।

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विदेशी निवेशकों की विदाई: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) लगातार भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपया कमजोर हुआ है।

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सुरक्षित निवेश की मांग: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशक रुपये जैसी उभरती करेंसी के बजाय डॉलर जैसे सेफ-हेवन एसेट्स को तरजीह दे रहे हैं।

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सरकार और RBI का एक्शन प्लान
रुपये की गिरावट को रोकने के लिए सरकार ने किलाबंदी शुरू कर दी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातकों में से एक है। सरकार ने हाल ही में कीमती धातुओं पर इंपोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) बढ़ा दी है ताकि सोने की मांग कम हो और डॉलर का बाहर जाना (Outflow) रुके। पीरामल ग्रुप के मुख्य अर्थशास्त्री देबोपम चौधरी के अनुसार, आयात शुल्क बढ़ाने से भारत के आयात बिल में लगभग $2.5 बिलियन की कमी आ सकती है। कयास लगाए जा रहे हैं कि नीति निर्माता देश में विदेशी पूंजी के प्रवाह (Inflow) को सुधारने के लिए जल्द ही कुछ नए उपायों की घोषणा कर सकते हैं।

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क्या ये उपाय काफी होंगे?
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकारी उपाय मददगार तो हैं, लेकिन रुपये की असली सेहत कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों की वापसी पर निर्भर करेगी। एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर कच्चे तेल के दाम लंबे समय तक ऊंचे रहे, तो रुपये का 100 के स्तर तक जाना तय है। फिलहाल रुपये के लिए राह चुनौतीपूर्ण है। जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ठंडी नहीं होतीं, तब तक घरेलू करेंसी पर दबाव बना रहने की आशंका है।