दिल्ली के सरोजिनी नगर, जनपथ या लाजपत नगर जैसे बाजारों से शॉपिंग करना हर किसी को पसंद होता है। वहां 200, 300 या 500 रुपये में बड़े-बड़े इंटरनेशनल ब्रांड्स के जैकेट, जींस और स्वेटशर्ट आराम से मिल जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो कपड़े शोरूम में हजारों रुपये के बिकते हैं, वो इन पिश्तों या पटरियों पर इतने सस्ते कैसे आ जाते हैं?
इन कपड़ों का सफर जितना आप सोचते हैं, उससे कहीं ज्यादा लंबा और दिलचस्प है। न्यूयॉर्क, कनाडा या कोरिया की गलियों से चलकर ये कपड़े दिल्ली के बाजारों तक कैसे पहुंचते हैं और इसके पीछे पानीपत का क्या कनेक्शन है, आइए इसे समझते हैं।
विदेशी डोनेशन बॉक्स से पानीपत का सफर
इस पूरे खेल की शुरुआत होती है अमेरिका, कनाडा, साउथ कोरिया, चीन, यूएई और जापान जैसे देशों से। वहां के लोग अक्सर अपने कपड़े दान पेटी (Donation Bins), चैरिटी संस्थाओं (जैसे Goodwill या Salvation Army) या थ्रिफ्ट स्टोर में दे देते हैं। विदेशों में लोग कपड़ों को बहुत जल्दी बदल देते हैं, कई बार तो सिर्फ एक या दो बार पहनकर ही छोड़ देते हैं।
इन संस्थाओं के पास जब बहुत ज्यादा स्टॉक जमा हो जाता है, तो वो बचे हुए और हल्के डिफेक्ट वाले कपड़ों को छांटकर बड़ी-बड़ी मशीनों से दबाकर बेल (यानी गठरी) बना देती हैं। ये बेल समुद्र के रास्ते जहाजों से भारत के गुजरात (मुंद्रा पोर्ट) पहुंचती हैं और वहां से ट्रकों के जरिए आती हैं हरियाणा के पानीपत में। पानीपत इस समय पूरे देश में इन सेकंड हैंड और सरप्लस कपड़ों का सबसे बड़ा होलसेल हब बना हुआ है।
हर एक गठरी में छुपा है एक सरप्राइज
पानीपत के बरसात रोड पर ऐसे सैकड़ों गोदाम हैं, जहां जमीन से लेकर छत तक इन कपड़ों के ढेर लगे हुए हैं। यहां कपड़ों की एक-एक गठरी (Bale) का वजन 80 किलो से 100 किलो तक होता है। एक गठरी की कीमत उसकी क्वालिटी के हिसाब से 8000 रुपये से लेकर 30000 रुपये तक होती है। टॉप्स की गठरी सस्ती होती है, जबकि विंटर जैकेट की महंगी।
इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि दुकानदार को पैसे देने से पहले यह देखने को नहीं मिलता कि गठरी के अंदर कौन से ब्रांड के या किस रंग के कपड़े हैं। जब गांठ खुलती है, तभी पता चलता है कि अंदर क्या है। कई बार तो इसमें हूबहू Louis Vuitton या Zara जैसे बड़े ब्रांड्स के असली और महंगे कपड़े भी निकल आते हैं।
मुनाफे का गणित: 80 रुपये की जींस, 300 रुपये में बिक्री
अगर गणित के हिसाब से समझें तो दुकानदारों के लिए इसमें बहुत तगड़ा मुनाफा होता है। मान लीजिए एक किलो कपड़े की लागत लगभग 250 रुपये आई। एक किलो में करीब तीन जींस या ट्राउजर चढ़ जाते हैं। इस हिसाब से दुकानदार को एक जींस सिर्फ 80 से 100 रुपये की पड़ती है, जिसे वो सरोजिनी जैसे बाजार में आराम से 250 या 300 रुपये में बेच देते हैं।
कश्मीरी गेट से कन्याकुमारी तक सप्लाई और फाइनल टच
पानीपत से ये कपड़े सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और सीधे केरल-कन्याकुमारी तक भेजे जाते हैं। लेकिन बाजारों में बिकने से पहले पानीपत के ही छोटे-छोटे वर्कशॉप में इन कपड़ों को चमकाया जाता है। यहां कपड़ों को अच्छे से इस्त्री (Iron) किया जाता है और तय करके पैक किया जाता है। अगर किसी बड़े शोरूम या दुकान में बेचना हो, तो यहां मात्र 50 पैसे से 1 रुपये में Max, Zara या Tommy Hilfiger जैसे ब्रांड्स के नए टैग भी लगा दिए जाते हैं। यही वजह है कि पटरी पर मिलने वाले कई कपड़ों पर आपको ब्रांड का टैग बिल्कुल नया जैसा दिखता है।
तो अगली बार जब आप सरोजिनी नगर में बारगेनिंग करके कोई चमचमाता हुआ जैकेट खरीदें, तो समझ जाइएगा कि वह सात समंदर पार करके और पानीपत का चक्कर लगाकर आपकी अलमारी में सजने आया है।
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