किसी व्यापारी के 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई (UPI) लेनदेन पर ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (MDR) यानी शुल्क लगाना उस व्यवस्था में बदलाव है, जिसमें पिछले छह वर्षों से यूपीआई भुगतान मुफ्त रखने की लागत मुख्य रूप से बैंकों, भुगतान कंपनियों और सरकार के बजटीय प्रोत्साहन से उठाई जा रही थी. मंगलवार शाम जारी आधिकारिक बयान में 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत की दर से एमडीआर लगाए जाने की बात कही गई. हालांकि, यह शुल्क ग्राहक की जगह व्यापारी से वसूला जाएगा और दो व्यक्तियों के बीच होने वाले लेनदेन को इसमें शामिल नहीं किया गया है.
इसके साथ जनवरी, 2020 से लागू शून्य एमडीआर व्यवस्था बदल गई. पुरानी व्यवस्था का मकसद डिजिटल भुगतान को तेजी से बढ़ावा देना था. उस समय यह मॉडल समझ में आता था क्योंकि यूपीआई अभी विस्तार के दौर में था. लेकिन आज इसका पैमाना बिल्कुल बदल चुका है. अगस्त, 2026 में यूपीआई पर 2,451 करोड़ लेनदेन किए गए और उनका कुल मूल्य 29.9 लाख करोड़ रुपये रहा. इतने बड़े पैमाने पर भुगतान नेटवर्क को 24 घंटे चलाने, उसकी क्षमता बढ़ाने, साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने की लागत भी बढ़ी है.
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यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने के फैसले के पीछे यही आर्थिक वजह बताई जा रही है. भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने उद्योग जगत के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा है कि यूपीआई को चलाने की सालाना लागत करीब 20,000 करोड़ रुपये है. इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार ने यूपीआई के लिए 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. ऐसे में सिर्फ सरकारी प्रोत्साहन के सहारे बढ़ते नेटवर्क की लागत उठाने का मॉडल लंबे समय तक पर्याप्त नहीं रह गया था.
हालांकि, सरकार ने एमडीआर को सभी भुगतानों पर लागू करने के बजाय बड़े कारोबारी लेनदेन तक सीमित रखा है. वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, 2,000 रुपये से अधिक के पी2एम (व्यक्तियों द्वारा दुकानदारों को भुगतान) लेनदेन कुल पी2एम संख्या का केवल करीब चार प्रतिशत है, लेकिन उनका हिस्सा कुल यूपीआई भुगतान मूल्य में करीब दो-तिहाई है. यह आंकड़ा बताता है कि इस नीति का निशाना रोजमर्रा के यूपीआई इस्तेमाल पर नहीं, बल्कि अपेक्षाकृत बड़े वाणिज्यिक भुगतानों पर है.
नई व्यवस्था के तहत 5,000 रुपये के पी2एम भुगतान पर 20 रुपये और 50,000 रुपये पर 200 रुपये का एमडीआर लगेगा. यह 75,000 रुपये पर 300 रुपये तक पहुंच जाएगा और उसके बाद इसी स्तर पर स्थिर रहेगा. रेलवे, दूरसंचार, ईंधन और बीमा जैसी आवश्यक सेवाओं के लिए 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर पांच रुपये का एकसमान शुल्क और पूंजी बाजार लेनदेन पर 0.02 प्रतिशत की दर रखी गई है. इस शुल्क व्यवस्था में छोटे व्यापारियों को अलग रखा गया है. क्यूआर कोड के जरिये महीने में एक लाख रुपये तक का यूपीआई भुगतान लेने वाले छोटे व्यापारी इस शुल्क से मुक्त रहेंगे.
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ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में व्यापारियों के क्यूआर भुगतान भी मुफ्त रहेंगे. यानी जिस छोटे व्यापारी के लिए यूपीआई कम मूल्य वाले दैनिक लेनदेन का माध्यम है, उसकी मौजूदा व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा. ग्राहकों पर यह शुल्क नहीं लगेगा. एमडीआर व्यापारी पर लगेगा और एनपीसीआई के मुताबिक इसका बोझ ग्राहक पर नहीं डाला जा सकता. फिर भी इसका अंतिम आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि व्यापारी इस लागत को अपने मार्जिन में समाहित करता है या अपनी कीमतों में किसी तरह समायोजित करता है.
एमडीआर दरअसल यूपीआई उपयोगकर्ताओं पर शुल्क लगाने से ज्यादा यूपीआई से जुड़ी लागत का बोझ उठाने के तरीके में बदलाव है. सरकार ने छोटे और रोजमर्रा के भुगतान को मुफ्त रखते हुए बड़े वाणिज्यिक लेनदेन से नेटवर्क के रखरखाव की लागत का एक हिस्सा सीधे जुटाने की व्यवस्था की है.
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