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देश में बढ़ रहा कैश का चलन, फिर भी घट रहे ATM! क्या है भारत का ‘करेंसी पैराडॉक्स’?

भारत में डिजिटल पेमेंट्स के बढ़ते दौर के बावजूद कैश का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, देश में नकदी का फ्लो रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया है, लेकिन दूसरी ओर एटीएम की संख्या घट रही है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इसका आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है? जानिए पूरी कहानी.

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Credit: AI

भारत में डिजिटल पेमेंट्स तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन इसके बावजूद कैश की अहमियत कम नहीं हुई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं. देश में नकदी का फ्लो लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ एटीएम की संख्या घटती जा रही है. यही स्थिति अब ‘इंडिया का करेंसी पैराडॉक्स’ कहलाने लगी है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2017 में देश में करीब 13 लाख करोड़ रुपये की नकदी ट्रेंड में थी. ये आंकड़ा वित्त वर्ष 2026 तक बढ़कर 41 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है. यानी लगभग एक दशक में नकदी की मात्रा तीन गुना से ज्यादा हो चुकी है. नोटों की संख्या भी 10 हजार करोड़ से बढ़कर 17 हजार करोड़ से ज्यादा हो गई है.

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क्यों कम हो रहे ATM?

दिलचस्प बात ये है कि जहां नकदी बढ़ रही है, वहीं एटीएम नेटवर्क लगातार सिकुड़ रहा है. वित्त वर्ष 2023 में देश में एटीएम की संख्या 2.19 लाख से ज्यादा थी, जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर लगभग 2.09 लाख रह गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा कारण डिजिटल भुगतान का बढ़ता इस्तेमाल है. यूपीआई, मोबाइल वॉलेट और ऑनलाइन बैंकिंग के कारण लोग छोटी-बड़ी खरीदारी के लिए पहले की तुलना में कम नकदी निकाल रहे हैं. RBI की रिपोर्ट भी बताती है कि डिजिटल भुगतान बढ़ने से एटीएम पर निर्भरता कम हुई है. आंकड़े बताते हैं कि एटीएम से डेबिट कार्ड के जरिए निकासी भी कम हुई है. वित्त वर्ष 2023 में जहां 685 करोड़ लेनदेन हुए थे, वहीं वित्त वर्ष 2026 में ये संख्या घटकर 534 करोड़ रह गई. निकाली गई राशि भी 32.6 लाख करोड़ रुपये से घटकर 28.6 लाख करोड़ रुपये पर आ गई है. हालांकि एटीएम उद्योग से जुड़े संगठन CATMi ने चिंता जताई है कि कई एटीएम में पर्याप्त नकदी नहीं पहुंच रही है. संगठन के मुताबिक, कई मशीनों को जरूरत के मुकाबले केवल 55 से 65 प्रतिशत नकदी ही मिल रही है. इससे खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नकदी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है. बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि एटीएम चलाने की लागत लगातार बढ़ रही है. सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी प्रणाली, नकदी की ढुलाई और मशीनों के रखरखाव पर खर्च बढ़ने से बैंकों के लिए बड़े एटीएम नेटवर्क को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है.

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क्यों है मुश्किल?

पंजाब एंड सिंध बैंक के सीनियर मैनेजर दीपक कुमार कई तरह के दबावों की ओर इशारा करते हैं. उन्होंने कहा कि चौबीसों घंटे सिक्योरिटी रखना महंगा है और इसके लिए कोई साफ गाइडलाइन नहीं है, RBI के जरूरी ई-सर्विलांस सिस्टम से लागत और बढ़ जाती है. सीनियर मैनेजर ने बताया कि ATM के रखरखाव का काम आउटसोर्स करना भी मुश्किल हो गया है. हाल ही में, एक बड़ी सर्विस प्रोवाइडर कंपनी बंद हो गई, जिससे हजारों ATM का कामकाज ठप हो गया. कुल मिलाकर, ATM चलाने का आर्थिक गणित बिगड़ता जा रहा है. डिजिटल पेमेंट के कारण कैश का इस्तेमाल कम होने और नियमों के पालन व लॉजिस्टिक्स पर ज्यादा खर्च आने की वजह से, बैंकों और ऑपरेटर्स के लिए बड़े ATM नेटवर्क को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है. नतीजतन, दूर-दराज के इलाकों में कैश इस्तेमाल करने वालों को ATM इंफ्रास्ट्रक्चर के सिमटने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है और अपनी कैश की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें ज्यादा इंतजार करना पड़ सकता है

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लेखक के बारे में

Varsha Sikri

वर्षा सिकरी News24 हिंदी डिजिटल में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. जर्नलिज्म में 9 साल का अनुभव रखने वाली वर्षा सिकरी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. वर्षा सिकरी ने सितंबर 2017 में इंडिया टीवी से अपने करियर की शुरुआत की थी, जिसके बाद से उन्होंने रिपब्लिक टीवी, जी न्यूज, आज तक जैसे चैनलों में काम किया. फिलहाल वो News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 9 साल के करियर में वर्षा सिकरी ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. वर्षा सिकरी का पत्रकारिता में अनुभव: 9 साल योग्यता: NRAI स्कूल ऑफ मास कम्यूनिकेशन से ग्रेजुएशन करने के बाद वर्षा सिकरी ने मीडिया में अपने करियर की शुरुआत की. उन्होंने बतौर एंकर और रिपोर्टर भी काम किया है.
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