युद्ध के मैदान में जब गोलियां चलती हैं, तो बाजार में डॉलर की धमक बढ़ जाती है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया भर के निवेशकों को असमंजस में डाल दिया है। जहां एक तरफ शेयर बाजार गोते लगा रहे हैं, वहीं अमेरिकी डॉलर सुपरपावर बनकर उभर रहा है। लेकिन क्या यह मजबूती सिर्फ दिखावा है? क्या कच्चे तेल की आग में डॉलर खुद झुलस सकता है? जानिए ईरान युद्ध के बीच डॉलर की मजबूती और कमजोरी का पूरा गणित।
डॉलर में उबाल: कमजोरी नहीं, बल्कि मजबूती के संकेत
ताजा आंकड़ों (17 मार्च 2026) के अनुसार, डॉलर कमजोर होने के बजाय मजबूत हो रहा है। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:
- तेल की कीमतों में ‘आग’ और पेट्रो-डॉलर का खेल
ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें $104 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में होता है, इसलिए तेल की बढ़ती मांग और कीमतों ने डॉलर की डिमांड को बढ़ा दिया है। इसे ‘पेट्रो-डॉलर’ प्रभाव कहा जाता है, जो अमेरिकी मुद्रा को सहारा दे रहा है। - ब्याज दरों में कटौती पर ‘ब्रेक’
युद्ध की वजह से वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई है, जिससे महंगाई (Inflation) बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस महंगाई को रोकने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) ब्याज दरों में कटौती के अपने फैसले को टाल सकता है। जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो विदेशी निवेशक डॉलर में निवेश करना ज्यादा पसंद करते हैं, जिससे यह और मजबूत होता है। - सुरक्षित ठिकाने की तलाश (Safe Haven Demand)
जब भी दुनिया में युद्ध जैसी स्थिति बनती है, निवेशक जोखिम भरे शेयर बाजारों (Equity) से पैसा निकालकर सुरक्षित एसेट्स की ओर भागते हैं। डॉलर दुनिया की सबसे तरल और सुरक्षित मुद्रा मानी जाती है, इसलिए वैश्विक उथल-पुथल के बीच इसकी मांग बढ़ जाती है।
क्या डॉलर कभी कमजोर हो सकता है?
मजबूती के बावजूद, कुछ ऐसे कारक हैं जो लंबी अवधि में डॉलर पर दबाव डाल सकते हैं:
भारी बजटीय घाटा: युद्ध के कारण अमेरिका का रक्षा खर्च बढ़ सकता है। अगर अमेरिका का बजटीय घाटा बहुत ज्यादा बढ़ता है, तो निवेशक डॉलर की स्थिरता पर सवाल उठा सकते हैं।
विकल्पों की तलाश: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से कई देश (जैसे चीन और रूस) डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर ईरान युद्ध के दौरान तेल का व्यापार अन्य मुद्राओं (जैसे युआन या यूरो) में होने लगता है, तो डॉलर का दबदबा कम हो सकता है।
ट्रंप प्रशासन की नीति: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ऐतिहासिक रूप से एक ‘कमजोर डॉलर’ (Weak Dollar) के पक्षधर रहे हैं ताकि अमेरिकी निर्यात को बढ़ावा मिल सके। अगर सरकार जानबूझकर डॉलर की वैल्यू कम करने के कदम उठाती है, तो इसमें गिरावट आ सकती है।
फिलहाल (मार्च 2026), ईरान युद्ध डॉलर के लिए ‘बूस्टर’ का काम कर रहा है। डॉलर इंडेक्स (DXY) 100 के स्तर के आसपास बना हुआ है, जो पिछले कई महीनों का उच्च स्तर है। जब तक युद्ध और तेल का संकट बना रहेगा, डॉलर के कमजोर होने की संभावना काफी कम है।
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