अक्सर कहा जाता है Past is history … Future is mystery & Present is gift. इस बात को भारत के संदर्भ में जानने, देखने और समझने की जरूरत है . पिछले कुछ वर्षों से विकसित भारत की बात बहुत जोर-शोर से हो रही है. पहली बार 15 अगस्त, 2022 को प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किला की प्राचीर से 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का टारगेट सेट किया . अब सवाल उठता है कि अगले 20 वर्षों में भारत विकसित राष्ट्र कैसे बनेगा? भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी किसकी है – सरकार की या समाज की ? क्या अपने दम पर कोई सरकार किसी मुल्क को विकासशील से विकसित राष्ट्र में बदल सकती है ? शायद नहीं . साल 1947 में भारत आजाद हुआ – सपने बड़े थे . चुनौतियां बड़ी थीं . इतिहास गवाह है कि आजादी के आंदोलन से निकले नेताओं ने किस तरह आजाद भारत में समाज के आखिरी पायदान पर खड़े आखिरी आदमी की जिंदगी में बदलाव के लिए प्रयास किया . नतीजा ये रहा कि 1947 में भारत की GDP जहां 2.7 लाख करोड़ रुपये थी – वो अब बढ़कर 345 लाख करोड़ रुपये के निशान को पार कर चुकी है . साक्षरता दर 12% हुआ करती थी – जो अब 80 फीसदी से अधिक हो गयी है . भारतीय युवाओं के Technical Expertise की छाप दुनिया की हर अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी और Innovation में दिख जाती है . आज के भारत में फाइटर जेट से लेकर पनडुब्बी तक बन रहे हैं . लेकिन, 2047 में भारत कैसा होगा ? ये किसी अभी एक Mystery की तरह है . क्योंकि, 2047 तक भारत को विकसित बनाने का मिशन किसी एक प्रधानमंत्री, किसी एक सरकार, किसी एक राजनीतिक दल, किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है . ये देश के एक अरब 45 करोड़ लोगों का साझा लक्ष्य है – जिसे पूरा करने के लिए सरकार के साथ समाज को भी पूरी शिद्दत से काम करना होगा . ऐसे में आज समझने की कोशिश करेंगे कि आम आदमी के लिए विकसित भारत का मतलब क्या होगा ? विकसित भारत बनाने के लिए सरकार और समाज को अभी क्या-क्या करने की जरूरत है ? क्या सिर्फ GDP अधिक होने या प्रति व्यक्ति आय बढ़ने से भारत विकसित देश बन जाएगा? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

भारतीय परंपरा में धर्म की खास अहमियत रही है . हमारे यहां धर्म का मर्म सिर्फ पूजा-पाठ भर से नहीं कर्म या जिम्मेदारी से रहा है. किसी भी नागरिक को अधिकार मुफ्त में नहीं मिलते, उसकी कीमत चुकानी पड़ती है . वो कीमत होती है – कर्तव्य की, जिम्मेदारी की . हमारे संविधान में नागरिकों को आजादी, बराबरी और सम्मान का मौलिक अधिकार दिया गया हैं, तो 1976 में संविधान संशोधन के जरिए मौलिक कर्तव्य भी जोड़े गए . दरअसल, अधिकार और कर्तव्य की बात आज इसलिए करनी पड़ रही है कि हमारे देश की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है. Gen G है..मिलेनियल्स है. ये वर्ग ऊर्जा से लबरेज है. प्रयोगधर्मी है . टेक फ्रेंडली है . अपने अधिकारों की बात बहुत मुखर होकर करता है. लेकिन, अधिकारों के साथ जिम्मेदारी की बात भी उतनी ही शिद्दत से होनी चाहिए … चाहे वो देश के नागरिक के तौर पर हो…चाहे स्कूल में विद्यार्थी के तौर पर या दफ्तर और कारखानों में कर्मचारी के तौर पर . ऐसे में ये समझना जरूरी है कि भारत मिशन 2047 में Gen Z और मिलेनियल्स किस तरह की भूमिका निभा सकते हैं?

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आज भारत ने भी एक बहुत बड़ा सपना देखा है. प्रण संकल्प के साथ देखा है. नई ऊंचाइयों को छूने के लिए देखा है और वो सपना है जब आजादी के 100 साल होंगे. 2047 में हम विकसित भारत बना के रहेंगे. 140 करोड़ देशवासियों के पुरुषार्थ से इस लक्ष्य को हमें हासिल करना है. हम भारत के लोग चाहते हैं कि साल 2047 तक हमारा देश भी विकसित राष्ट्र बन जाए . भारत के लोगों की कमाई विकसित देशों जैसी हो जाए . लोगों का जीवन स्तर अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, स्वीडन, ब्रिटेन के नागरिकों जैसा हो जाए. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि हम भारत को विकसित देशों जैसा बनाने के लिए खुद क्या कर रहे हैं? एक नागरिक के तौर पर, एक विद्यार्थी के तौर पर, एक दफ्तर या कारखाना में काम करनेवाले कर्मचारी के तौर पर .

हमारा कर्तव्य बनता है कि हम बलवान बनें, वैभवशाली बनें, धनवान बनें और बुद्धिमान बनें. भारत के युवा पूरे विश्व में केवल यशस्वी ही न बनें, बल्कि सार्थक भी बनें . भारत की आबादी में Gen Z की हिस्सेदारी करीब 37 से 40 करोड़ के बीच है . हमारी आबादी में जेन जी वो हिस्सा है - जो स्कूल से कॉलेज तक छात्र के रूप में पढ़ाई कर रहा है. दफ्तर से कारखानों तक और खेत से लेकर खदान तक Workforce के रूप में काम कर रहा है. जेन जी में एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है-जिसके पास पढ़ाई यानी डिग्री के बाद भी कोई काम नहीं है . मौजूदा समय में दुनिया में सबसे बड़ी Gen Z आबादी भारत में है . आज जो युवा 14 से 29 के बीच हैं - वो अगले 21 वर्षों में 35 से 50 साल के बीच होंगे . भारत को तरक्की की रफ्तार बढ़ाने में ईंधन की भूमिका में रहेंगे. लेकिन, दिक्कत ये है कि जेन जी का तौर - तरीका पिछली पीढ़ी से थोड़ा अलग है .

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जेन जी से पहले की पीढ़ी यानी मिलेनियल्स की आबादी हमारे देश में करीब 44 करोड़ है . इस वर्ग में 30 से 45 साल के बीच के लोग आते हैं . मतलब, ये वर्ग पढ़-लिख कर हमारे सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. साल 2047 तक मिलेनियल्स की उम्र 50 से 65 साल के बीच पहुंच जाएगी…मतलब, ये वर्ग एक ओर जेन जी को भविष्य के लिए तैयार कर रहा है . वहीं…दूसरी ओर विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने में लगातार योगदान देता रहेगा. ऐसे में अगले 20-21 वर्षों में विकसित भारत बनाने के लिए जितनी मुखरता से अधिकारों की बात हो रही है-उतनी ही मुखरता के साथ कर्तव्य और जिम्मेदारियों की बातें भी होनी चाहिए .

एक नागरिक के तौर पर कर्तव्य है- नियम-कायदों का पालन एक छात्र के रूप में कर्तव्य है - बेहतर ढंग से पढ़ाई करना और नई-नई Skills सीखना. एक कर्मचारी के रूप में कर्तव्य है-पूरी ईमानदारी से अनुशासित होकर काम करना और जिम्मेदारियों को निभाना . दुनिया में तकनीक के क्षेत्र में होते बदलावों के हिसाब से खुद को तैयार करना भी जेन जी और मिलेनियल्स की जिम्मेदारी है . Gen Z सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट या प्रोटेस्ट करने वाली पीढ़ी नहीं है. Digital Entrepreneurship, Online Education, Start up, Innovation, Creation और नए विचारों वाली पीढ़ी है . भारत की असली ताकत समाज और जिम्मेदारियों के ताने-बाने में रही है . लेकिन, चिंता की बात ये है कि इस युवा पीढ़ी का बड़ा वर्ग यूनिवर्सिटी की डिग्री लेने के बाद खाली हाथ है . नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, हमारे देश में 15 से 29 साल की उम्र के करीब 8.7 करोड़ युवा NEET कैटेगरी में है यानी Not in education, Employment or Training…विकसित भारत का लक्ष्य लिए आगे बढ़ रहे भारत में ये एक ऐसा वर्ग है – जिसमें 8 करोड़ से अधिक युवा न पढ़ाई कर रहे हैं…न नौकरी कर रहे हैं…न किसी तरह की ट्रेनिंग ले रहे हैं . इसकी एक बड़ी वजह है – युवाओं का Unskilled या Low Skilled होना . ऐसे में सवाल उठता है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है – सरकार या समाज ?

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इंडिया स्किल रिपोर्ट 2026 के मुताबिक युवाओं की रोजगार क्षमता में सुधार हुआ है. भारत में Employability 56.35 फीसदी पर पहुंच गयी है . इसका मतलब ये हुआ कि 100 में से 56 युवा नौकरी के लिए तैयार हैं . लेकिन, समस्या ये है कि हमारे युवाओं को किस तरह की नौकरी मिलती है? प्रोफेशनल कोर्सेज के बाद भी कितने युवाओं को उनकी पढ़ाई और डिग्री के हिसाब से नौकरी या सैलरी मिल पाती है? किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य का मुख्य काम माना जाता है - अपने नागरिकों के लिए बेहतर स्कूल और कॉलेज खोलना, जिससे बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जा सके . दुनिया में होते बदलावों के हिसाब से गतिशील शिक्षा नीति बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार की होती है -जिससे छात्रों को बेहतर ढंग से Skilled किया जा सके . भविष्य के लिए तैयार किया जा सके. लेकिन, समाज की भी ये जिम्मेदारी है कि बच्चों को पढ़ाई और नई Skills सीखने के लिए प्रेरित करे .

भारत में हर साल 15 लाख से अधिक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट पासआउट होते हैं-जिसमें 60% से 65% इंजीनियरों में इंडस्ट्री के मुताबिक जरूरी तकनीकी कौशल की कमी महसूस की गयी है. इसी तरह देश के नामी 20-30बिजनेस स्कूल को छोड़ दिया जाए तो आधे से अधिक MBA ग्रेजुएट्स को डिग्री पूरी होने के बाद तुरंक कैंपस प्लेसमेंट नहीं मिलता है . अगर सरकार की जिम्मेदारी तकनीकी बदलावों के हिसाब से शिक्षा नीति बनाने और युवाओं को Skilled करने की है. तो समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि छात्र - छात्राओं को पूरी शिद्दत से पढ़ाई-लिखाई और ट्रेनिंग के लिए प्रेरित करे. आगे बढ़ाये. इतना ही नहीं - जो लोग यानि जेन जी या मेलेनियल्स Workforce का हिस्सा हैं-उन्हें भी बदलावों के हिसाब से खुद को upskill या reskill करना होगा . मिशन विकसित भारत के लिए हर नागरिक को Globle Job Market के हिसाब से खुद को तैयार करना होगा. जिससे सबको उसकी पढ़ाई, ट्रेनिंग और स्किल के हिसाब से कमाई का बेहतर मौका मिल सके .

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प्रधानमंत्री ने कहा था कि दुनिया में बहुत कुछ मिलता है, सस्ता मिलता है, जल्दी मिल सकता है. लेकिन उससे हमारा सामर्थ्य तैयार नहीं होता. ना हमारे सामर्थ्य की कसौटी होती है और इसलिए हमें भी अपनी क्षमताओं को बढ़ाना है. दरअसल, Skilled Workforce भारत की तरक्की की रफ्तार और तेज कर सकती है . मसलन, युवा, नई तकनीकों का निर्माण, स्टार्टअप और नए उद्योगों की शुरुआत, रोजगार पैदा करने में अहम भूमिका, रिसर्च और इनोवेशन में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं . Global Job Market में भारतीय टैलेंट के झंडाबरार के रूप में अपनी पहचान को और मजबूत कर सकते हैं . साथ ही, दुनिया के उन विकसित देशों की समस्याओं का भी समाधान कर सकते हैं - जो Skilled Youth Workforce के लिए तरस रहे हैं . विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए सामाजिक ताने-बाने में ऐसा वर्ग बिल्कुल नहीं होना चाहिए- जो न पढ़ाई करता हो, न नौकरी करता हो..न बिजनेस करता हो, न खेती करता हो. मतलब, हर हाथ को उसकी हुनर और क्षमता के हिसाब से काम मिलना जरूरी है .

भारत का एक-एक आदमी हिसाब लगा रहा है कि उसके लिए विकसित भारत के मायने क्या होंगे? क्या विकसित भारत में बेरोजगारी नहीं होगी? क्या सबके पास अच्छी सैलरी वाली नौकरी होगी? गांव और शहर के बीच विकास में बहुत ज्यादा अंतर नहीं होगा ? सरकारी स्कूल में बच्चों को भेजना किसी गरीब की मजबूरी नहीं होगा – वो इस भरोसे के साथ बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजेगा कि वहां भी प्राइवेट स्कूलों जैसी ही शिक्षा मिलेगी ? क्या मजबूरी में गरीब इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में नहीं जाएगा –बेहतर इलाज की आस में भरोसे के साथ जाएगा . सरकार का काम सिर्फ योजनाएं बनाना नहीं है. सिर्फ आधारभूत संरचना खड़ा करना नहीं है . एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना है – जिसमें हर नागरिक की तरक्की के खिड़की दरवाजे उसकी क्षमता के हिसाब से खुलते हों . एक ऐसा माहौल बनाने की जिम्मेदारी है – जिसमें कंपनियां निवेश करें. नौकरियां पैदा हो…छोटे उद्योग यानी MSME को रफ्तार मिले . दुनिया भारत को सिर्फ बाजार नहीं Manufacturing और Innovation Hub के रूप में देखे .

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कोई भी देश सिर्फ GDP से विकसित नहीं बनता है. विकसित बनता है -अपने विकसित और जिम्मेदार नागरिकों से . सरकार विकास के लिए EcoSystem बना सकती है . लेकिन, तरक्की की रफ्तार बढ़ाने के लिए समाज को मिलकर काम करना होता है . सरकार दुनिया की सबसे बेहतरीन सड़कें बना सकती है . लेकिन, ट्रैफिक नियमों को मानने की जिम्मेदारी लोगों की है. सरकार इलाज के लिए बेहतरीन अस्पताल बना सकती है. लेकिन, सेहत के प्रति जागरुक रहने की जिम्मेदारी लोगों की है .सरकार देश के आखिरी छोर और आखिरी गांव तक इंटरनेट की सुविधा पहुंचा सकती है - लेकिन, उसका फायदा उठाते हुए खुद को Skilled करना लोगों की जिम्मेदारी है . सरकार स्कूल-कॉलेज खोल सकती है. लेकिन, शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई के लिए बच्चों को भेजने की जिम्मेदारी समाज की है . छात्रों में पढ़ाई की आदत डालना परिवार और समाज का काम है. ये सरकार का काम है कि स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई का स्तर बेहतर हो. अच्छे टीचर और प्रोफेसर हों. टीचरों की समय-समय पर ट्रेनिंग का इंतजाम हो.. लेकिन, शिक्षा और शिक्षकों के प्रति सम्मान का रास्ता को समाज से ही निकलेगा? ऐसे में विकसित भारत के लिए सरकार और समाज दोनों को एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हुए आगे बढ़ना होगा .

सरकार का काम उद्योग के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना है . नीतियां बनाना है. एक ऐसा माहौल जिसमें उद्योगपतियों को अपना निवेश सुरक्षित लगे. एक ऐसा माहौल बनाना जिसमें मुनाफा के चांस अधिक दिखे. एक ऐसा माहौल-जहां प्रोडक्शन के लिए हर तरह की सुविधाएं मौजूद हों. औद्योगिक घरानों की भी जिम्मेदारी है कि ऐसे उद्योगों में निवेश करें - जिससे अधिक रोजगार पैदा होता हो … जिसके लोगों की जिंदगी की मुश्किलें आसान हों. जिससे देश की आर्थिक विकास की रफ्तार तेज होती हो . किसी भी Welfare State में सरकार का काम होता है – नागरिकों की तरक्की के लिए नीतियां बनाना और बेहतर माहौल बनाना . माहौल बनाने का मतलब है – Infrastructure, Education, Healthcare, Law & order, Ease of doing Business, Research & Innovation की दिशा में काम करना . तरक्की की बयार में पीछे छूटे लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा का इंतजाम करना . कोई भी सरकार रास्ता बना सकती है. लेकिन चलना तो समाज को होता है . ऐसे में किसी भी देश को विकसित बनाने का कोई लक्ष्य सिर्फ सरकार और बजट के भरोसे पूरा नहीं हो सकता है . बदलाव की सुनामी हमेशा नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य के बीच तालमेल के साथ समाज के व्यवहार से आती है . मतलब, सिर्फ GDP के आंकड़ों से कोई मुल्क विकसित नहीं बन सकता है . मिशन 2047 के लिए संतुलित आर्थिक विकास के साथ सामूहिक भागीदारी और जिम्मेदारी को ड्राइविंग सीट पर बैठाना बहुत जरूरी है .

माना जाता है कि भारत को विकसित देश बनाने के लिए प्रति व्यक्ति आय भी विकसित देशों जैसी होनी चाहिए…अगर आज की तारीख में विकसित देशों से भारतीयों की आय की तुलना की जाए तो अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय 94,430 डॉलर है . चीन में 14,874 डॉलर, जर्मनी में 65,303 डॉलर, जापान में 35,703 डॉलर, ब्रिटेन में 61,056 डॉलर और भारत में 2,813 डॉलर, फ्रांस में 52,083 डॉलर, इटली में 46,505 डॉलर, रूस में 18,525 डॉलर है ऐसे में समझा जा सकता है कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत विकसित देशों से कितना पीछे खड़ा है? लेकिन, क्या प्रति व्यक्ति आय बढ़ने मात्र भर से भारत विकसित देशों जैसा बन जाएगा?

आज हमारे देश में एक दूसरे तरह की भी समस्या है - वो है आर्थिक असमानता की . Global Inequality Report 2026 के मुताबिक, देश में सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल दौलत का 65 प्रतिशत हिस्सा है. उसमें भी सिर्फ एक प्रतिशत के पास 40% हिस्सा है . देश के टॉप 10% लोगों की कमाई में हिस्सेदारी 58% है… वहीं, नीचे से यानी आर्थिक रूप से कमजोर 50% लोग मिलकर 15% कमाई कर पाते हैं . पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह का आर्थिक विकास हुआ है – उसमें अमीर और अमीर होता गया. गरीब और गरीब होता गया. आज हालात ये हैं कि सरकार 81 करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त अनाज बांट रही है. देश के करोड़ों हलधरों को पीएम किसान सम्मान निधि के तहत साल में 6 हजार रूपये दिए जा रहे हैं. ऐसे में मिशन 2047 यानि विकसित भारत के लिए हर नागरिक को अपनी क्षमता और आय बढ़ाने के लिए काम करना होगा .

हमारे देश की Labour Force में महिलाओं की भागीदारी अभी 35 फीसदी के आसपास है – जिसे 2047 तक बढ़ाकर 50% पर ले जाना जरूरी है . पिछले कुछ दशकों में महिलाओं को लेकर समाज की मानसिकता में बहुत बदलाव आया है – लेकिन, अभी बहुत बदलाव की दरकार है . महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना बहुत जरूरी है. विकसित भारत के लिए महिलाओं की भूमिका घर, अर्थव्यवस्था, नेतृत्व और फैसला लेने में बराबर की होनी चाहिए . समाज को एक ऐसे Ecosystem की ओर बढ़ना होगा – जिसमें Degree से अधिक Skill, सरकारी या प्राइवेट नौकरी से अधिक प्रोडक्टिविटी, Repetitive काम से अधिक Innovation को महत्व दिया जाए . हर शख्स समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की शुरुआत खुद से करे .

विकसित भारत एक ऐसा साझा मिशन है - जिसमें सरकार नीति बनाएगी, उद्योग निवेश करेगा, युवा नया कौशल सीखेगा, शिक्षक नई पीढ़ी बनाएगा. किसान उत्पादकता बढ़ाएगा, महिला श्रमशक्ति में बढ़ेगी, वैज्ञानिक आविष्कार करेगा, कारोबारी रोजगार देगा और आम आदमी अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए व्यवस्था बेहतर बनाने में अपनी दमदार भूमिका निभाएगा. ऐसे में जब देश के सभी नागरिक पूरी ईमानदारी से अपना काम करेंगे तो विकसित भारत का तय समय से पहले भी पूरा हो सकता है . विकसित भारत का लक्ष्य GDP बढ़ाने से कहीं अधिक समाज की सामूहिक जिम्मेदारी और सामूहिक तरक्की का मिशन है .

हमारे संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोगों से होती है. सरकारें बदलती रहती हैं . तरक्की और बदलाव में सरकार की भूमिका सीमित होती है . वहीं समाज की भूमिका अधिक होती है . समाज निरंतर आगे बढ़ता रहता है. ऐसे में विकसित भारत एक अरब 40 करोड़ से अधिक लोगों का एक साझा मिशन है. ये सवाल बहुत हद तक मायने नहीं रखता है कि सरकार हमारे लिए क्या कर रही है? मायने ये रखता है कि हम भारत के लिए क्या कर रहे हैं? कालचक्र के हिसाब से साल दर साल कैलेंडर पलटता जाएगा और 2047 का साल आ जाएगा . लेकिन, विकसित भारत अपने आप नहीं बनेगा, सरकार और समाज दोनों को मिलकर काम करना पड़ेगा . समाज के हर व्यक्ति को अपनी दमदार भागीदारी निभानी पड़ेगी. एक सक्षम और समावेशी सरकार के साथ जिम्मेदार समाज यही साझेदारी विकसित भारत की राह को आसान और छोटा बनाएगी, जिसमें हर नागरिक को अपनी तरक्की और खुशहाली का बेहतर मौका मिलेगा?

किसी भी मुल्क की अर्थव्यवस्था कुम्हार के चाक की तरह होती है . जब तक चाक चलता रहता है – कुम्हार अपने हुनर से कुछ-न-कुछ गढ़ता रहता है . इसी तरह जब सरकार और समाज दोनों मिलकर अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभाते हैं – तो मुल्क तरक्की करता है . मुल्क के लोग अपने हुनर के हिसाब से कुछ-न-कुछ गढ़ते रहते हैं . इससे अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलती है. ऐसे में अगर अर्थव्यवस्था का चाक संतुलन के साथ चलता रहा – तो भविष्य का भारत Manufacturing Powerhouse बन सकता है . Agri Business में बेहिसाब संभावनाएं हैं . हमारे गांव सिर्फ मजदूर देने वाले क्षेत्र नहीं ग्रामीण उद्योग के नए केंद्र बन सकते हैं. छोटे कारोबारी अपने वजूद के लिए संघर्ष करने की जगह Scale पर फोकस कर सकते हैं . ऐसे में विकसित भारत बनाने के लिए सरकार और समाज को गाड़ी के दोनों पहिये की तरह संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा. सरकार नीति बनाए तो समाज को उन नीतियों का पालन सुनिश्चित कराने में सहयोग करना चाहिए. सरकार Infrastructure और Policy पर फोकस करे. तो Industry निवेश पर फोकस करे . समाज युवाओं को बेहतर शिक्षा हासिल करने और Skill सीखने के लिए प्रेरित करे. तो यूनिवर्सिटी Research & Innovation पर फोकस करे . ये समाज की जिम्मेदारी है कि किसी भी काम को छोटा या बड़ा में परिभाषित न करे…हर काम का सम्मान और हुनर को सलाम की फलसफा समाज के भीतर से आना चाहिए . अगर समाज शिक्षकों को सम्मान और Entrepreneur को आदर के भाव से देखेगा – तो मिशन 2047 की राहें छोटी हो सकती हैं .

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