एक बार फिर अयोध्या चर्चा में है . बहुत चर्चा में… मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम में आस्था रखने वाले हर शख्स के मन में सवाल उठ रहा है कि श्रीराम के नाम पर किसने किया ‘विश्वासघात’? विश्वासघात लोगों की आस्था के साथ… 'विश्वासघात' लोगों द्वारा श्रीराम को दिए गए चढ़ावे के साथ… 'विश्वासघात' लोगों के उस सपने के साथ, जिसमें रामराज्य लाने का वादा किया गया था . आम आदमी ये सोच कर हैरान-परेशान है कि क्या वाकई राम मंदिर के चढ़ावे में भी चोरी हो सकती है? श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने बकायदा प्रेस रिलीज जारी कर कहा है कि श्रद्धालुओं द्वारा दान में दी गयी चांदी की ईंटे, आभूषण आदि प्रभु श्रीराम की सेवा में अर्पण हेतु न्यास के अधिकारियों को सौंपी गई – वस्तुएं सुरक्षित हिसाब से उपलब्ध हैं . ये भी कहा गया है कि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने इस्तीफा सौंप दिया है…और उनके इस्तीफे पर ट्रस्ट की अगली बैठक में विचार होगा? ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि आखिर ट्रस्ट ये बात बताने में इतनी देर क्यों लगी ? श्रीराम ने तो मानव सभ्यता को ईमानदारी, सच्चाई और त्याग का रास्ता सिखाया ! फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की नगरी में बार-बार मर्यादा क्यों टूटती है? जून के पहले हफ्ते में राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी का मामला सामने आया…करीब हफ्तेभर बाद योगी सरकार ने जांच के लिए तीन सदस्यीय SIT का गठन कर दिया … SIT ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी और अब फाइनल जांच रिपोर्ट का इंतजार है . इस मामले में देर से ही सही FIR भी दर्ज हुई और 8 लोगों की गिरफ्तारी भी . हालांकि, ट्रस्ट से जुड़े चंपत राय समेत किसी भी बड़े पदाधिकारी का नाम आरोपियों की लिस्ट में नहीं है . सवाल ये भी है कि चढ़ावा चोरी के मामले में सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों को ही आरोपी क्यों बनाया गया ? श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में कर्ताधर्ता की भूमिका में रहे माननीयों को क्यों नहीं ? आम आदमी के बीच चर्चा इस बात को लेकर भी हो रही है कि क्या वाकई श्री राम मंदिर को मिले चढ़ावे में भी चोरी हो सकती है? आखिर चढ़ावे में चोरी का विवाद कितनी दूर तक जाएगा … क्या ये हमारी सियासत को फिर बदलेगा ? इस घटना से हमारे देश के लोगों की धार्मिक आस्था और दान-पुण्य की सोच पर कितना असर पड़ेगा? अटकलें लगाई जा रही हैं कि अयोध्या के चंदा चोरी मामले की गूंज दूर तक और देर तक सुनाई देगी . अयोध्या की कहानी वैसे तो त्रेता युग से शुरू होती है. लेकिन, आज मैं आपको उतना पीछे लेकर नहीं जाऊंगी . मैं आपको बताने की कोशिश करुंगी कि आजादी के बाद अयोध्या में कब-कब बड़ी हलचल पैदा हुई और उस हलचल से क्या निकला? हमारा समाज, हमारी राजनीति और लोगों की आस्था किस हद तक प्रभावित हुई … अयोध्या को सियासतदानों ने किस तरह लॉन्चिंग पैड की तरह इस्तेमाल किया? अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद भी रामराज्य का सपना क्यों नहीं पूरा हुआ?
अयोध्या में श्रीराम मंदिर की चढ़ावे में चोरी की ख़बरों ने सबसे ज्यादा आम आदमी की आस्था पर चोट की है…उसके भरोसे पर चोट की है. सामान्य श्रद्धालुओं को ये सोचने पर मजबूर कर दिया क्या भगवान के चढ़ावे में भी चोरी हो सकती है? श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में हेर-फेर सिर्फ एक अपराधिक वारदात, चोरी या डकैती नहीं है. ये देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और भरोसा के साथ बड़ा विश्वासघात है. BJP ने अयोध्या के नाम पर पिछले 36 वर्षों में जो कुछ हासिल किया..वो राम मंदिर के उद्घाटन के ढाई वर्षों में ही दांव पर लग गया.आखिर श्रद्धालुओं की आस्था पर लगी चोट की भरपाई कैसे होगी? क्या श्रद्धालु पहले की पहले मंदिरों में दान-पुण्य करेंगे? क्या दान-पुण्य करते समय श्रद्धालुओं के दिमाग में ये बात नहीं आएगी कि कोई उनके चढ़ावे में भी चोरी जैसा महापाप कर सकता है?
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भारत के सामान्य श्रद्धालु इस बात को हजम नहीं कर पा रहे हैं कि अयोध्या में जिस श्रीराम मंदिर का उन्हें इतना इंतजार था…जिस राम मंदिर के निर्माण का रास्ता इतनी लंबी कानूनी लड़ाई के बाद खुला..जिस राम मंदिर के नाम पर इतनी राजनीति हुई..जिस मंदिर आंदोलन से बीजेपी इतनी मजबूत हुई…जिस राम मंदिर का इतना भव्य उद्घाटन हुआ..उद्घाटन के करीब 29-30 महीनों के भीतर ही चढ़ावे में चोरी हुई . ये रूपये-पैसे, सोना-चांदी की चोरी नहीं…लोगों की आस्था के साथ विश्वासघात है.
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ये भारत की सनानत परंपरा से निकला रास्ता है - जिसमें लोग भगवान के नाम पर अपना सोना-चांदी, धन-दौलत,रुपया-पैसा अर्पण कर कभी भी ये जानने की कोशिश नहीं करते कि उनके चढ़ावे का क्या हुआ ? मंदिर उनके चढ़ावे का कहां और किस तरह इस्तेमाल कर रहा है? लेकिन, अयोध्या में मंदिर प्रशासन के कर्मचारियों ने जिस तरह चढ़ावे में चोरी को अंजाम दिया - उससे लोगों के भरोसे पर गहरी चोट लगी है . लोग मंदिरों में चढ़ावे से पहले सोचने को मजबूर हो गए हैं कि उनके दान-पुण्य में भी कोई चोरी-डकैती को नहीं कर लेगा?
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श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट चाहे जितना भी कहे कि लोगों का दान-पुण्य सुरक्षित और हिसाब से रखा गया है . सवाल ये भी उठ रहा है कि राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी या किसी भी हेर-फेर को रोकने का फूल प्रूफ तंत्र क्यों नहीं था ? क्या लोगों के चढ़ावे को भी राम भरोसे छोड़ दिया गया था ? एक बात तय है कि अयोध्या में जिस तरह लोगों की आस्था के विश्वासघात हुआ है - उससे देश के मंदिरों में दान और चढ़ावा कम हो सकता है? लोग मंदिरों में दान-पुण्य से पहले सोचेंगे कि उनके दान में कोई सेंधमारी या चोरी तो नहीं कर लेगा?
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अयोध्या में बने भव्य-दिव्य और अलौकिक श्री राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी की ख़बरों से आम-ओ-खास सब हैरान हैं. ये भी आरोप लग रहे हैं कि जमीन की खरीद-बिक्री के नाम पर भी बड़ा खेल हुआ है . सवालों में कई माननीयों की भूमिका हैं . भले ही अयोध्या में चंदा चोरी का मामला तूल पकड़ने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने SIT जांच बैठा दी … सीएम योगी ने भरोसा दिया है कि जल्द दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा…SIT की शुरुआती जांच के आधार पर 25 जून, 2026 को पहली FIR दर्ज हुई – जिसमें 8 नाम हैं . रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, अविनाश शुक्ला, मनीष यादव, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और करुणेश पांडेय . अगर FIR की कॉपी गौर से देखें – तो उसमें नामजद सभी आठों आरोपियों के पिता का नाम अज्ञात लिखा हुआ है…श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से साफ-साफ कहा गया कि महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने अपना इस्तीफा सौंप दिया है . लेकिन, अभी उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है . ट्रस्ट की अगली बैठक में चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफा पर विचार होगा…अब सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या चंपत राय और अनिल मिश्रा ने नैतिक आधार पर इस्तीफा दिया या दोनों को लगता है कि कहीं गलती हुई है? आखिर ट्रस्ट ने चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफा को तुरंत स्वीकार क्यों नहीं किया? ये समझना भी जरूरी है कि आखिर श्री राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी का मामला आखिर सामने कैसे आया और SIT के रडार पर आखिर कौन-कौन है?
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पिछले कुछ दिनों से सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर चल रही है कि मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और डॉक्टर अनिल मिश्रा इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं? इस मुद्दे पर सस्पेंस खत्म करते हुए ट्रस्ट की ओर से कहा गया है कि श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महामंत्री चंपत राय और न्यासी अनिल मिश्रा से त्यागपत्र प्राप्त हुआ है . न्यास अपनी आगामी बैठक में इसका विचार करेगा . हालांकि, मंदिर में चढ़ावा देने वालों श्रद्धालुओं को भी ट्रस्ट ने भरोसा देने की कोशिश की है कि श्रीराम की सेवा में अर्पित चांदी, गहने आदी सुरक्षित हैं . ट्रस्ट की प्रेस रिलीज में साफ-साफ कहा गया है कि असामाजिक, अधार्मिक, स्वार्थी तत्वों द्वारा सनानत धर्म पर लांछन लगाने के प्रयास को सफल नहीं होने देंगे . चढावा चोरी मामले में दर्ज पहली FIR में 8 आरोपियों के नाम हैं-जिन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है . सभी आरोपियों को खास जिम्मेदारी सौंपी गयी थी -
- रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू की जिम्मेदारी दानपात्रों की देखरेख की थी .
- अनुकल्प मिश्रा की जिम्मेदारी रुपयों की गिनती की थी .
- लवकुश मिश्रा चढ़ावे की गिनती टीम का हिस्सा था .
- सुभाष चंद्र श्रीवास्तव को कैश काउंटिंग स्टाफ के प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई थी .
- करुणेश पांडेय के जिम्मे दान के रुपये को पहुंचाने का काम सौंपा गया था .
- मनीष यादव के जिम्मे दानपात्रों में आनेवाले चढ़ावे की गिनती का काम था .
- अविनाश शुक्ला की ड्यूटी दान को रुपये को कक्ष तक पहुंचाने और गिनती की थी . और
- रमाशंकर मिश्रा को दानपात्रों को गणना कक्ष तक पहुंचाने और उनकी निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी .
राम मंदिर से जुड़े इन सामान्य कर्मचारियों की तनख्वाह भी मुश्किल से 20 से 30 हजार के बीच बताई जा रही है. लेकिन, राम जन्मभूमि परिषर में पहुंचते ही मामूली तनख्वाह के बाद भी इनके हाव-भाव और तौर-तरीके बदल गए… अयोध्या से समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक पवन पांडे ने आरोप लगाया कि राम मंदिर के लिए मिले चढ़ावे में सात से साढ़े सात करोड़ के बीच की हेराफेरी हुई है . फिर समाजवादी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने X पर लिखा, 'समस्त विश्व में भगवान राम के उपासकों के लिए ये एक बेहद संवेदनशील समाचार है कि ‘राम मंदिर’ के चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पायी गई है . ये मंदिर ट्रस्ट के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है . कोई भी सफ़ाई देने के लिए सामने नहीं आना चाहता है .'
राम मंदिर में चढ़ावे में चोरी के मामले की चर्चा पूरे देश में होने लगी . ट्रस्ट के जुड़े अहम लोगों की भूमिका पर सवाल उठने लगे…इसके बाद PMO ने जिला प्रशासन के माध्यम से ट्रस्ट से रिपोर्ट मांगी थी. लेकिन, ट्रस्ट ने गबन से इनकार कर दिया. वहीं, अयोध्या के साधु-संत चढ़ावे में हेरफेर पर खुलकर बोलने लगे . योगी सरकार ने मामले को बढ़ता देख तीन सदस्यीय SIT का गठन कर दिया और 15 दिनों में रिपोर्ट देने की डेडलाइन तय कर दी गयी…SIT अधिकारियों ने राम मंदिर में चढ़ावा, चढ़ावे की गिनती, सुरक्षा व्यवस्था, रुपये-पैसे से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले . मंदिर के कर्मचारियों और ट्रस्ट के पदाधिकारियों से भी पूछताछ हुई. ट्रस्ट महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा से भी सवाल-जवाब हुए … श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में चोरी पर सीएम योगी की सार्वजनिक प्रतिक्रिया पहली बार 19 जून को आईं .
विपक्षी पार्टियां लगातार ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा और गोपाल राव की भूमिका पर सवाल उठा रही थीं…लेकिन, इस मामले में पहली FIR दर्ज हुई तो उसमें किसी भी ट्रस्टी या बड़े पदाधिकारी का नाम नहीं था . अब सवाल उठ रहा है कि क्या राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी में सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी ही शामिल थे..या वो सिर्फ मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे थे ? सवाल ये भी है कि कहीं आरोपी कर्मचारियों ने ट्रस्ट से जुड़े बड़े लोगों से अपनी नजदीकियों का नाजायज फायदा तो नहीं उठाया? आखिर, अयोध्या में किसने किसके साथ विश्वासघात किया..ये भी एक बड़ा यक्ष प्रश्न बन चुका है .
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा और जमीन खरीद के प्रभारी गोपाल राव की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं . लेकिन, पहली FIR में न तो चंपत राय का नाम आया…न अनिल मिश्रा का और न गोपाल राव का . ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मंदिर प्रशासन से जुड़े कर्मचारियों ने चढावे में चोरी को अंजाम दिया…और ट्रस्ट में शामिल बड़े जिम्मेदार लोगों को इसकी भनक तक नहीं लगी या फिर किसी को बचाया जा रहा है? राम जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्यों में हर तरह के लोग हैं . साधु-संत के साथ अनुभवी नौकरशाह भी हैं . अब सवाल उठ रहा है कि आखिर कमी कहां रह गई - जिसे अनुभवी लोगों की पारखी नजरें देख और समझ नहीं पायीं ? अयोध्या से निकला चढ़ावा में चोरी कांड भविष्य में मंदिरों के मैनेजमेंट में कितना बदलाव करेगा ? देवता के खजाने की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए किस तरह की पहल होगी…इस सवाल का जवाब तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है . लेकिन, ये तय है कि श्री राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी के मामले में जांच रिपोर्ट में जो भी आए… इस मामले में दोषियों को कितनी भी जल्दी और कड़ी सजा मिले…लेकिन, एक बात तय है कि चढ़ावे में चोरी का मुद्दा विधानसभा चुनाव में जोरशोर से सुनाई देगा?
अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी के मामले पर सियासी सुनामी की लहरें उठने लगी हैं . विपक्षी पार्टियों को बीजेपी को घेरने का बड़ा मौका मिल गया है…समाजपार्टी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने X पर लिखा कि भाजपा का 'लंकाकांड' अयोध्या में ही होगा और 'दानभक्तों' का मुखौटा उतर गया है . आज की तारीख में भारत के 21 राज्यों में NDA की सरकार है.14 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं…पिछले 12 साल से केंद्र में लगातार बीजेपी की सरकार है,14 करोड़ से अधिक सदस्यों के साथ बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है . बीजेपी को इस मुकाम तक पहुंचाने में अयोध्या और राम मंदिर मुद्दे ने बड़ी भूमिका निभाई है…अयोध्या में भव्य-दिव्य राम मंदिर का वादा भी पूरा हो गया..लेकिन, मंदिर के चढ़ावे में चोरी का मुद्दा बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तीनों को असहज कर रहा है . क्योंकि, चढ़ावे में चोरी का मामला हर आदमी की आस्था से जुड़ा है…उसके मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से जुड़ा है . ये लोगों की आस्था और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के नाम पर विश्वासघात से कम नहीं है .
माना जा रहा है कि बीजेपी विरोधी पार्टियों की पूरी कोशिश रहेगी कि किसी कीमत पर बीजेपी और हिंदुत्ववादी संगठनों इस मुद्दे पर घेरा जाए . बीजेपी को बैकफूट पर लाया जाए …अगले साल यानी 2027 फरवरी-मार्च में यूपी में विधानसभा चुनाव होना है . चढ़ावे में चोरी के मुद्दे का वोट की जमीन पर पहला टेस्ट यूपी विधानसभा चुनाव में दिखना तय माना जा रहा है . ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पूरी कोशिश होगी कि SIT जांच रिपोर्ट के आधार पर चढ़ावे में चोरी के एक-एक दोषी को कड़ी सजा दिलाई जाए - चाहे वो कितने भी रसूखदार क्यों न हों .
अगर योगी सरकार चुनाव से पहले चढ़ावा चोरी मामले में दूध का दूध और पानी का पानी अलग करने में कामयाब हो जाती है - तो ये एक बड़ा दाग धुलने जैसा होगा . (इतना ही नहीं श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भीतर की खामियां भी सामने आ सकती हैं…)ऐसे में ये भी बहुत हद तक मुमकिन है कि BJP फिर आक्रामक तरीके से श्रीराम और अयोध्या के मुद्दे को ड्राइविंग सीट पर लाए-जिसमें विपक्ष के बेरोजगारी-महंगाई जैसे मुद्दे पीछे छूट जाएं और PDA का फॉर्मूला ध्वस्त हो जाए…लेकिन, आगे की राह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि इस मामले को किस तरह हैंडल किया जाता है . विपक्ष चढ़ावा में चोरी के मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाता है?
2027 के यूपी चुनाव में अयोध्या में चंदा चोरी का मामला जोर-शोर से सुनाई देना तय है . माना जा रहा है कि बीजेपी को घेरने के लिए विरोधी पार्टियों के हाथ एक ऐसा मुद्दा लगा है – जिसकी काट शायद भगवा ब्रिगेड के पास नहीं है. चढ़ावे में चोरी का मुद्दा भारतीय राजनीति में एक ऐसे रसायन की तरह है – जिसके साइड इफेक्ट की व्याख्या राजनीतिक पंडित अपने-अपने हिसाब से कर रहे हैं . लेकिन, एक बड़ा सच ये भी है कि भारत में धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता है . यहीं, वजह है कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में भारतीयों को जोड़ने के लिए महात्मा गांधी ने भी राम और रामराज्य की बात की…आजादी के बाद डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने भी सोशलिस्टों की राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए रामायण मेले की परिकल्पना की…तो बीजेपी को भी राष्ट्रीय फलक पर बड़ा आसमान अयोध्या आंदोलन से ही मिला . ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि 1980 के दशक से अयोध्या किस तरह हमेशा चर्चा में बनी रही और भारत में चुनावी राजनीति का चाक चलता रहा.
वो साल 1986 का था. VHP ने अयोध्या में रामलला के मंदिर का ताला खोलने के लिए आंदोलन तेज कर दिया..तब की केंद्र की राजीव गांधी सरकार की बेचैनियां बढ़ गयीं … अयोध्या में रामजन्मभूमि का दशकों से बंद ताला खुलने का रास्ता अदालत से निकला . लेकिन, कहा गया कि बाबरी मस्जिद में दशकों से बंद ताला खोलने की स्क्रिप्ट राजीव गांधी और उनके करीबियों ने तैयार की थी . अयोध्या में ताला खुलने के बाद देश की राजनीति तेजी से हिंदू-मुस्लिम, सेक्लुयर-कम्युनल खांचे में बंटने लगी…शायद कांग्रेस को लगा कि चुनाव में फायदा होगा … लेकिन, 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस सत्ता की रेस में पिछड़ गयी…दूसरी ओर, देश में मंडल-कमंडल की हवा तेज हो गई. वहीं, अयोध्या की आंधी को देखते हुए बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और
25 सितंबर,1990 को BJP के लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या के लिए राम रथ पर सवार हुए… करीब 10 हजार किलोमीटर का रूट तय था. आडवाणी का रथ आगे बढ़ता रहा और बीजेपी के लिए राजनीतिक तैयार होती गयी . बीजेपी नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर मजबूत होने लगी .
बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी की गिरफ्तारी के साथ ही रथ यात्रा खत्म हो गयी…लेकिन, बीजेपी के लिए राजनीतिक जमीन तैयार हो गयी…वहीं, 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर फायरिंग के बाद मुलायम सिंह मुसलमानों के नए रहनुमान के तौर पर उभरे…तो बिहार में लालू यादव ने भी अपने लिए नया वोट-बैंक गढ़ लिया . श्रीराम की अयोध्या राजनीति का नया लॉन्चपैड बन चुकी थी . अयोध्या का झगड़ा अदालत में था और राजनेता अपने-अपने तरीके से वोट की जमीन तैयार करने में जुटे थे..तो हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े कारसेवकों के अयोध्या में राम मंदिर का सपना अधूरा था . ऐसे में 1990 में दशक में अदालती रोक के बावजूद में कारसेवक अयोध्या में चबूतरे के निर्माण के लिए पहुंच रहे थे - तब की यूपी की कल्याण सिंह सरकार की ओर से पुलिस को बल प्रयोग नहीं करने के सख्त आदेश थे.
6 दिसंबर, 1992 को दोबारा कारसेवा शुरू करने का ऐलान किया गया था . कारसेवा के लिए अयोध्या में पहले से करीब दो लाख स्वयंसेवक पहुंच चुके थ… सुबह होते ही कारसेवकों का सैलाब सैकड़ों साल से खड़ी बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ा… और कुछ घंटों में ही बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबद मलबे के रूप में जमीन पर थे . अयोध्या में ढांचे की सुरक्षा में तैनात पुलिसवालों ने कारसेवकों को रोकने की कोई कोशिश नहीं की..उस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की अयोध्या में कहां-कहां मर्यादा टूटी - इसे हर आदमी अपने-अपने लेंस से देखता है … केंद्रीय बल जब वहां पहुंचे तब तक वहां एक अस्थायी मंदिर बन चुका था. राम-सीता की मूर्ति स्थापित हो चुकी थी … लेकिन, अयोध्या विवाद ज्यों का त्यों बना रहा . अयोध्या विवाद की गूंज चुनावों में भी सुनाई देती रही और अदालतों के भीतर जिरह में भी .
अयोध्या का मुकदमा इलाहाबाद हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. साल 2014 में केंद्र में प्रचंड बहुमत से बीजेपी सत्ता में आई…प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे नरेंद्र मोदी . लेकिन, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का वादा अधूरा था… सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की कोशिश की..लेकिन, बात नहीं बनी . अयोध्या विवाद में 5 जजों की संविधान पीठ ने 40 दिन सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद 9 नवंबर, 2019 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया … इसके तहत 2.77 एकड़ की पूरी विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए श्री राम लला विराजमान' को सौंप दी गई, और सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन दी गयी .
देश की सबसे बड़ी अदालत ने देश के सबसे पुराने और पेचीदा मसले को सुलझा दिया.सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या में में राम मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया था… तय समय के भीतर ट्रस्ट बना. अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर बना…बहुत भव्य तरीके से उद्धाटन हुआ . लगा कि अब अयोध्या की चर्चा सिर्फ श्रीरामलला के भव्य मंदिर की वजह से होगी…एक तीर्थ स्थल के रूप में होगी . लेकिन, फिर अयोध्या चर्चा में है - श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में चोरी को लेकर…श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट क्षेत्र के महानुभावों की भूमिका को लेकर .
सरयू किनारे बसी अयोध्या हमेशा लोगों के बीच चर्चा में रही…अयोध्या के नाम पर राजनीतिक दिशा-दशा बदलती रही . श्रीराम और अयोध्या के नाम पर सत्ता समीकरण बैठाने का खेल चतुराई से खेला जाता रहा…दूसरी अयोध्या के झगड़े को सुलझाने के लिए अदालत में कानूनी दांव पेंच भी चलता रहा. अयोध्या हमेशा चर्चा में बनी रही…सवाल तब भी उठा, जब राजीव गांधी के दौर में बाबरी मस्जिद का ताला खुला…सवाल तब भी उठा, जब 1989 में राजीव गांधी ने अयोध्या से अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत की और रामराज्य लाने का वादा किया… रामराज्य लाने का चुनावी वादा करने के बाद भी राजीव गांधी की सत्ता में दोबारा वापसी नहीं हो पायी…साल 1989 में यूपी की सत्ता से कांग्रेस का ऐसा वनवास हुआ - जो अब तक खत्म नहीं हो पाया है . अयोध्या कई नए राजनीतिक समीकरण और चुनावी गठबंधनों की आधारशीला रही…भारतीय राजनीति को दो दशक से अधिक समय तक सेक्युलर और कम्युनल खांचे में बांटे रखने का आधार भी अयोध्या से निकला . लेकिन, ये समझना भी जरूरी है कि आजादी के बाद आखिर अयोध्या विवाद किस तरह आगे बढ़ा ? साल 1949 में आधी रात को रामलला के प्राकट्य होने की घटना ने किस तरह अयोध्या विवाद को नया आकार दिया .
रात के अंधेरे में बाबरी मस्जिद में कुछ हलचल हुई और मूर्तियां अवतरित हो गयीं . सुबह होते ही पूरे इलाके में आग की तरह ये खबर फैली कि अयोध्या में रामलला का जन्म हुआ है . इस रहस्यमयी रात ने अयोध्या की पूरी तस्वीर बदल दी…कुछ ने इसे चमत्कार माना…तो कुछ ने सोची समझी साजिश . 23 दिसंबर,1949 को ही एक FIR दर्ज हुई..जिसमें तीन लोगों को नामजद किया गया- अभिराम दास, राम शक्ल दास और सुदर्शन दास . इन तीन नामों के साथ 50-60 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी दंगा भड़काने,अतिक्रमण जैसी कुछ दफाओं में केस दर्ज किया गया . फैजाबाद के तत्कालीन डीएम केके नायर ने इसे विवादित संपत्ति घोषित कर ताला लगवा दिया … उनसे यूपी तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने लिखित आदेश देकर यथास्थिति बहाल करने के लिए कहा..तो डीएम नायर ने जवाब में लिखा, 'रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से निकालकर राम चबूतरे पर ले जाना संभव नहीं है. ऐसा करने से अयोध्या, फैजाबाद और आसपास के गांवों-कस्बों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. जिला प्रशासन के अधिकारियों, यहां तक कि पुलिस वालों की जान की गारंटी भी नहीं दी जा सकती.'
डीएम नायर से दोबारा यथास्थिति बहाल करने के लिए कहा गया…तो जवाब में उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी . तब डीएम नायर का इस्तीफा यूपी की तत्कालीन पंत सरकार ने स्वीकार नहीं किया … लेकिन, उनके सुझावों को जरुर मान लिया . इसके बाद मस्जिद अपनी जगह पर रही और रामलला की मूर्ति अपनी जगह . लेकिन, 23 दिसंबर … 1949 की सुबह की घटना ने अयोध्या विवाद को बढ़ा दिया…1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद कोर्ट से रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष अनुमति मांगी . 1959 में निर्मोही अखाड़ा बाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत पहुंच गए … एक ओर कोर्ट में अयोध्या पर तारीख पर तारीख मिल रही थी…दूसरी ओर,1952 में ही केके नायर ने रिटायमेंट ले लिया. उनका राजनीति में पहले से झुकाव था…वो भारतीय जनसंघ के टिकट पर बहराइच से लोकसभा पहुंच गए…बाद में उनकी पत्नी भी सांसद बनीं-वो भी जनसंघ के टिकट से…जिस विचाराधारा के दम पर जनसंघ कांग्रेस का विकल्प बनना चाह रही थी..उसे शुरुआती वर्षों में कोई खास कमायाबी नहीं मिली .
एक ओर अयोध्या का केस अदालत में था..दूसरी ओर, देश में वोट बैंक की राजनीति भी तेजी से बदल रही थी . इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी और जनसंघ ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया..वो साल था 1977 का..आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई… लेकिन, आपसी मतभेद और कुर्सी के लिए खींचतान में जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिन नहीं चल पायी . इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद संघ परिवार ने मंथन किया कि अगले चुनाव से पहले कैसे हिंदुओं को राजनीतिक रूप से एकजुट किया जाए .
अप्रैल 1980 में भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ…लेकिन, आगे का रास्ता मुश्किल था . वो साल 1981 का था. अयोध्या से करीब ढ़ाई हजार किलोमीटर दूर तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में सैकड़ों परिवारों धर्मांतरण किया…इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया..इसके बाद 1983 में विश्व हिंदू परिषद ने संस्कृति रक्षा अभियान शुरू किया … 'एकात्मता यात्रा' निकाली गयी . कहा जाता है कि VHP नेताओं के साथ इंदिरा गांधी की कई गोपनीय बैठकें हुईं और अयोध्या धीरे-धीरे राजनीति के केंद्र में आने लगी . वीएचपी की मांग थी - मस्जिद का ताला खोलकर मंदिर निर्माण के लिए जमीन दी जाए,इसी दौर में राम जन्मभूमि न्यास का गठन हुआ. लेकिन, अयोध्या और विवाद ठीक उसी तरह चलते रहे - जैसे सरयू की धारा .
इतिहास गवाह है कि अयोध्या और विवाद दोनों साथ-साथ चले हैं . अयोध्या का मतलब होता है- जहां युद्ध करना असंभव हो या जिसे कोई जीत न सके . अयोध्या त्रेतायुग से श्रीराम की रही है . श्रीराम पूरी दुनिया को त्याग, समर्पण और जनसेवा का संदेश देते रहे हैं . अयोध्या से निकला रामराज्य का दर्शन पश्चिम के सहभागी लोकतंत्र में सबकी संपन्नता और भयमुक्त समाज की अवधारणा को भी जोड़ देता है…अयोध्या परिवर्तन की पक्षधर है…आधुनिकता की पक्षधर है . वहां के राजा श्रीराम एक सामान्य नागरिक के सवाल उठाने पर अपनी पत्नी सीता को जंगल भेज देते हैं . ये जानते हुई भी कि उनकी सीता पर उठाए गए सवाल बेबुनियाद हैं . ये अयोध्या से निकला दर्शन है – जिसमें एक भाई के जंगल जाने पर दूसरा भाई जिसे राज सिंहासन पर बैठना था – वो भाई की खड़ाऊ रखकर राजकाज संभालने की जिम्मेदारी तो निभाता है … लेकिन, खुद तपस्वियों जैसा जीवन जीता है . ये अयोध्या से निकला अदभूत दर्शन है – जिसमें स्वं से ऊपर समाज का कल्याण है . लेकिन, दुर्भाग्य ये है कि अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर तो बन गया – लेकिन, उस मंदिर परिसर से जुड़े कुछ लोगों ने चढावे में चोरी जैसे महापाप को अंजाम देने में भी हिचक नहीं दिखाई… मंदिर प्रशासन से जुड़े अहम पदों पर बैठे महानुभावों ने सवाल उठने के तुरंत बाद अपने पदों से इस्तीफा नहीं दिया … सियासत भी अयोध्या में अपने नफा-नुकसान का हिसाब लगा रही है . ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अयोध्या के चढ़ावा चोरी कांड के बाद देशभर के मंदिरों के रख-रखाव तंत्र में बदलाव आएगा…क्या देश के हर हिस्से में खड़े लाखों मंदिरों में चढ़ावे की गिनती और देवता के पैसे के इस्तेमाल का पारदर्शी तंत्र अयोध्या से निकलेगा? 2026 का आयोध्या कांड भविष्य के लिए कौन सी राह दिखाएगा और किसे वनवास देगा?