तमिलनाडु में वोटिंग की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती आ रही है - मुकाबला उतना ही दिलचस्प होता जा रहा है. सत्ताधारी DMK ने चुनावी घोषणा पत्र में महिलाओं के लिए खास इल्लाथरासी कूपन योजना का ऐलान किया है. इसके तहत महिलाओं को 8 हजार रूपये का कूपन दिया जाएगा. इसका फायदा सूबे की उन महिलाओं को मिलेगा - जो इनकम टैक्स के दायरे में नहीं आती हैं. इसी तरह AIADMK ने सरकार बनने पर रेफ्रिजेटर देने का वादा किया है. मतलब, फ्रीबीज योजनाओं के सहारे तमिलनाडु में सत्ता हासिल करने की जुगत चल रही है. ये तमिल राजनीति का आजमाया हुआ फॉर्मूला है - जो अब देश के हर राज्य के चुनाव में दिखाई देता है. तमिलनाडु में डीएमके अपनी सत्ता बचाने के लिए AIADMK को BJP का मोहरा साबित करने में तुली हुई है. लोगों को डर दिखा रही है कि अगर AIADMK सत्ता में लौटी तो इसका मतलब होगा बीजेपी की एंट्री. हालांकि, दोनों ही पार्टियां द्रविड़ अस्मिता की राजनीति करती हैं. वहीं, साउथ फिल्मों के सुपर स्टार विजय थलापति बीजेपी को अपना वैचारिक विरोधी मानते हैं. तो DMK को राजनीतिक विरोधी. तमिलनाडु विधानसभा की सभी सीटों पर विजय की TVK ने उम्मीदवार उतारे हैं. माना जा रहा है कि TVK का प्रभाव खासतौर पर शहरी इलाकों में है. चेन्नई की सभी सीटों पर TVK की मौजूदगी का असर दिख सकता है - जो दशकों से DMK के अभेद्य चुनावी किले की तरह रहा है. ऐसे में हिसाब लगाया जा रहा है कि चुनावी अखाड़े में TVK की मौजूदी से किसे ज्यादा नफा या नुकसान हो सकता है. पहले बताया था कि कैसे द्रविड़ आंदोलन से तमिलनाडु की सियासी धारा निकली. ब्राह्मण वर्चस्व के खिलाफ दलित और पिछड़ी जातियां कैसे एकजुट हुईं? हिंदी विरोध ने किस तरह से डीएमके के लिए जमीन तैयार की. एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद उनकी पार्टी में कब्जे के लिए किस तरह भीषण संघर्ष हुआ और जयललिता सब पर भारी पड़ीं. आज बात तमिल पॉलिटिक्स में जयललिता और करुणानिधि का दौर खत्म होने की? आज बात जयललिता और करुणानिधि के बाद की राजनीति की. आज बात 2026 में सूबे के सियासी मिजाज और समीकरणों की. आज समझने की कोशिश करेंगे कि क्या द्रविड़ राजनीति के सबसे मजबूत किले में भगवा ब्रिगेड सेंध लगा पाएगी? क्या तमिल पॉलिटिक्स अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रही है या उसमें कोई बदलाव आया है? मुख्यमंत्री स्टालिन अपना किला बचाने के लिए किस फार्मूले पर सबसे ज्यादा भरोसा कर रहे हैं? बीजेपी तमिलनाडु को लेकर कितनी कॉन्फिडेंट है?
जयललिता ने तमिल राजनीति के मूल तत्वों या कहें विचारों में जरा भी मिलावट की कोशिश नहीं की. वो भले ही चमक-दमक वाले सिनेमा की दुनिया से सियासत में आईं थीं. लेकिन, लोगों के दिलों पर राज करना की हर अदा उन्हें अच्छी तरह आती थी. इसीलिए, उन्होंने गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाईं. मसलन, 2013 में गरीबों के लिए अम्मा कैंटीन, जहां 5 रुपये में भरपेट खाना मिलता था. अम्मा हेल्थ चेकअप से लेकर अम्मा फॉर्मेसी तक शुरू हुई, अम्मा टीवी, अम्मा सीमेंट, अम्मा मैरिज हॉल्स, अम्मा कॉल सेंटर की शुरुआत हुई. उन्होंने दूसरी पार्टियों को मुफ्त की रेबड़ियां बांट कर लोगों के दिलों पर राज करने वाली राजनीतिक राह दिखाई. तो करुणानिधि की डीएमके यूपीए की जहाज पर सवार थी. मनमोहन सरकार में शामिल डीएमके मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे. तो 2014 में आय के अधिक संपत्ति केस में जयललिता को 4 साल की जेल की सजा हुई. उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी और जेल जाना पड़ा. ऐसे में ओ. पनीरसेल्वम को सूबे की कमान मिली. 2016 के विधानसभा चुनाव में AIADMK को तमिलनाडु में दोबारा सरकार बनाने का मौका मिला. जब जयललिता अस्पताल में भर्ती हुईं, तब भी उन्होंने पनीरसेल्वम पर ही भरोसा जताया. लेकिन, 2016 में उनके निधन के बाद AIADMK में वर्चस्व की लड़ाई सड़कों पर आ गयी. ऐसे बीजेपी अपने लिए नए सिरे से संभावनाएं तलाशने लगी.
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जयललिता के निधन के बाद उनकी सियासी विरासत संभालने को लेकर जंग शुरू हो गयी. एक ओर तब मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे ओ. पनीरसेल्वम थे, जो कभी जयललिता के सबसे करीबियों में से एक थे. जिन्हें सियासी गलियारों में OPS के नाम से जाना जाता था. दूसरी ओर, एडप्पाडी के पलनीस्वामी यानी EPS थे. जो पनीरसेल्वम के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. AIADMK में दो फाड़ हो गया, एक गुट OPS दूसरा EPS. पार्टी में मची खींचतान का फायदा उठाने की कोशिश की कभी जयललिता की करीबियों में से एक रहीं शशिकला ने. उन्होंने खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की तैयारी कर ली. राज्यपाल के न्यौते का इंतजार था. लेकिन, दो दशक पुराने भ्रष्टाचार के एक मामले में शशिकला को जेल जाना पड़ा. ऐसे में उन्होंने अपने भरोसेमंद पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया. इस सोच के साथ कि भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पलानीस्वामी होंगे. लेकिन, हुकूमत उनके इशारे पर चलेगी.
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राजनीति के चतुर खिलाड़ी पलानीस्वामी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही अपने हिसाब से फैसले लेना शुरू किया. उन्होंने भीतरखाने पनीरसेल्वम से भी समझौता कर लिया. शशिकला ने इसे अपने साथ धोखा माना. पलानीस्वामी ने गोटियां ऐसे बैठाईं कि शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दीनाकरन को AIADMK में अपने लिए कोई उम्मीद नहीं दिखी. दिनाकरन ने अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम नाम से नई पार्टी बना ली.
तमिलनाडु की सियासी जमीन में बीजेपी ने खाद-पानी मिलाना शुरू कर दिया. AIADMK के नेताओं के साथ बीजेपी नेताओं की केमेस्ट्री बेहतर होने लगी. दूसरी ओर, बढ़ती उम्र के साथ के. करुणानिधि की सेहत लगातार गिरती जा रही थी. DMK में उनकी विरासत संभालने को लेकर शीत युद्ध चल रहा था. 7 अगस्त, 2018 को करुणानिधि ने आखिरी सांस ली. उनकी सियासी विरासत मिली एमके स्टालिन को. उन्होंने ये मुकाम हासिल किया अपने सौतेले भाई एमके अलागिरी को पछाड़कर. अब चुनावों में स्टालिन को खुद को साबित करना था. 2019 में लोकसभा चुनाव की घंटी बजी, स्टालिन की अगुवाई वाले सेक्यूलर प्रोग्रेसिव अलायंस यानी SPA ने 39 में से 38 सीटें जीत लीं. NDA के खाते में आईं सिर्फ एक सीट. बीजेपी को मिले करीब साढ़े तीन प्रतिशत वोट. बीजेपी तेजी से तमिलनाडु में अपनी वोट की जमीन मजबूत करने के मिशन में जुट गयी.
जयललिता के निधन के दो साल बाद तमिल राजनीति के दूसरी आकाशगंगा करुणानिधि भी इस दुनिया से अलविदा हो गए. उनके पुत्र एमके स्टालिन ने मोर्चा संभाला. साल 2021 में तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव की घंटी बजी और डीएमके की सत्ता में वापसी हुई. ये स्टालिन के काम करने का स्टाइल है - जिसमें एक ओर वो AIADMK पर प्रचंड प्रहार करते हैं. दूसरी ओर, बीजेपी को भी लपेटने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. स्टालिन बीजेपी की अगुवाई वाले केंद्र पर हिंदी थोपने, हिंदुत्व विचारधारा फैलाने और केंद्रीय फंड रोकने का आरोप जड़ते रहे हैं. सूबे की घटती आबादी को देखते हुए स्टालिन लोगों से अधिक बच्चे पैदा करने की भी अपील करते हैं. उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन सूबे में उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे हैं. इस साल फरवरी के दूसरे हफ्ते में तमिलनाडु की एक करोड़ 31 लाख महिलाओं के खाते में 5 हजार रुपये जमा हो जाते हैं. महिलाएं समझ नहीं पाती कि ये पैसा कहां से आया. किसने भेजा. उसके बाद सीएम स्टालिन बताते हैं कि ये रुपये कलाइग्नार मगलीर उरिमाई थिट्टम योजना के तहत महिलाओं के खाते में डाले गए हैं. सूबे की 234 सीटों में से 200+ जीतने का टारगेट स्टालिन ने रखा है. इसके लिए गठबंधन भी किया गया है - जिसमें कांग्रेस, DMDK, VCK, लेफ्ट और MDMK जैसी पार्टियां शामिल हैं.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन अच्छी तरह जानते हैं कि मुकाबला कितना कड़ा है. एक-एक वोट कितना अहम है? ऐसे में स्टालिन ने तमिल राजनीति का सबसे भरोसेमंद फॉर्मूला फिर आजमाया. उन्होंने केंद्र सरकार की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर सवाल उठाया और इसे हिंदी थोपने का प्लान बताया. वो अच्छी तरह जानते हैं कि तमिलनाडु के लोग भाषा के मुद्दे पर कितना संजीदा हैं.
पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह तमिलनाडु में बीजेपी का विस्तार हुआ है. उसमें स्टालिन शायद AIADMK से बड़ा खतरा BJP से महसूस कर रहे हैं. सीएम स्टालिन के निशाने पर AIADMK से अधिक BJP रही है. उनके बेटे और उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन सनानत धर्म को लेकर कुछ साल पहले एक विवादित बयान दे चुके हैं.
तमिलनाडु की सत्ता में दोबारा वापसी के लिए स्टालिन की खासतौर से चार रणनीति के साथ बढ़ रहे हैं. पहली, गठबंधन, दूसरा, चुनावी वादे, तीसरा, AIADMK को बीजेपी का मोहरा साबित करना और चौथा, तमिल राजनीति के मूल मुद्दों को आगे रखना यानि हिंदी विरोध.
राजनीति के चतुर खिलाड़ी स्टालिन को अंदाजा है कि वोटों के कटने से पूरा सत्ता समीकरण बिगड़ सकता है. ऐसे में सूबे की 234 में से 164 सीटों पर DMK के सिंबल से उम्मीदवार मैदान में हैं. कांग्रेस 28, DMDK 10, VCK 8, CPI 5, CPM 5 और MDMK 4 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.
इस गठबंधन में कई दूसरी छोटी पार्टियां भी हैं - जिन्हें 10 सीटें दी गईं हैं. मतलब, DMK ने गठबंधन साझीदारों के लिए 70 सीटें छोड़ने जैसा बड़ा फैसला लिया. दरअसल, एमके स्टालिन गठबंधन सहयोगियों के चुंबक से सूबे के हर समुदाय के वोट को SPA के पाले में लाने की कोशिश करते दिख रहे हैं.
एमके स्टालिन ने सत्ता में दोबारा वापसी के लिए वादों की झड़ी लगा दी है. डीएमके ने अपने घोषणा पत्र में 525 वादे किए हैं. जिसमें इनकम टैक्स नहीं देने वाली महिलाओं को जरूरी घरेलू सामान खरीदने के लिए 8,000 रुपये का कूपन देने का वादा किया गया है. तो महिलाओं को हर महीने दी जाने वाली 1000 रुपये की मदद को डबल यानी 2000 करने का वादा भी किया गया है. माना जा रहा है कि DMK ने बहुत चतुराई से सूबे की महिला वोटरों को साधने का दांव चला है.
मुख्यमंत्री एमके स्टालिन अटैक इज बेस्ट डिफेंस की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. वो बीजेपी पर लगातार प्रचंड प्रहार करते रहे हैं. स्टालिन महंगाई से लेकर LPG सिलिंडरों की कमी के लिए केंद्र की NDA सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. वो मोदी सरकार पर केंद्रीय फंड रोकने का भी आरोप लगाते हैं. DMK की रणनीति AIADMK को BJP का मोहरा साबित करने की है. वहीं, हिंदुत्ववादी बीजेपी द्वारा बैकसीट ड्राइविंग का भय दिखाकर AIADMK पर प्रचंड प्रहार, सूबे के अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट करने की कोशिश मानी जा रही है. आज की तारीख में DMK बदली रणनीति के दम पर AIADMK की द्रविड़ साख को भी चुनौती देती दिख रही हैं. वहीं, तमिल अस्मिता बनाम दिल्ली प्रभाव के मुद्दे को आगे कर विपक्षी पार्टियों के वोट में सेंधमारी का दांव आजमा रही है.
मुख्यमंत्री स्टालिन का द्रविड़ियन मॉडल तमिलनाडु की सियासत में DMK को मजबूती दे रहा है. उनकी सरकार की योजनाएं मसलन महिलाओं के खाते में कैस ट्रांसफर, महिलाओं के लिए बस में मुफ्त सफर जैसी योजनाओं ने DMK की वोट की जमीन को सींच रहे हैं. DMK ने महिलाओं के लिए 8 हजार रूपये के कूपन का भी ऐलान किया है – जिससे वो कुछ भी खरीददारी कर सकती हैं. वहीं, AIADMK भी गठबंधन के सहारे सत्ता में वापसी की कोशिश करती दिख रही है. AIADMK के ईके पलानीस्वामी यानी EPS के साथ बीजेपी मजबूती से खड़ी है. अन्नाद्रमुक की अगुवाई वाले गठबंधन में BJP को 27, PMK को 18 सीटें दी गई हैं. इस गठबंधन में कुछ और दल भी शामिल हैं, 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर 11 फीसदी तक पहुंच गया. बीजेपी उन्हीं क्षेत्रों पर खासतौर से फोकस कर रही है - जहां उसका आधार मजबूत हुआ है.
BJP रणनीतिकारों को लगता है कि सूबे की एमके स्टालिन सरकार के खिलाफ लोगों में आक्रोश है. ऐसे में एमके स्टालिन सरकार को हर मुद्दे पर घेरने लगातार कोशिश हो रही है.
बीजेपी रणनीतिकारों को लगता है कि AIADMK के साथ गठबंधन की वजह से पलड़ा NDA का भारी है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में AIADMK को 20.46% तो BJP को 11. 24% वोट मिला.
बीजेपी के वोट में भारी उछाला. बीजेपी ने जिस तरह से तमिलनाडु की सियासी जमीन में कमल के लिए खाद-पानी मिलाया - उसका नतीजा ये है कि हिंदी पट्टी की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी ने सूबे के शहरी खासतौर से कोयंबटूर, चेन्नई, मदुर के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में पकड़ मजबूत की है.
दक्षिणी तमिलनाडु के कन्याकुमारी, तिरुनेलवेली, थूथुकुडी और विरुधुनगर जैसे जिलों में हिंदू वोट का कुछ हिस्सा बीजेपी के खाते में जाने का अनुमान लगाया जा रहा है.
पश्चिमी तमिलनाडु के कोयंबटूर, तिरुपुर, इरोड, नमक्कल, करूर,सलेम जिले में भी खास समुदाय के वोट पर बीजेपी फोकस कर रही है.
रामनाथपुरम, वेल्लोर, और कुड्डालोर में भी बीजेपी को अपने लिए संभावना दिख रही है.
2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जहां 21 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, वहीं, इस बार 27 सीटों पर BJP के सिंबल से उम्मीदवार मैदान में हैं. BJP रणनीतिकार तमिल राजनीति के मिजाज को अच्छी तरह जानते हैं. इसलिए चेन्नई में पलानीस्वामी ड्राइविंग सीट पर हैं. बीजेपी ने पलानीस्वामी को खुश रखने के लिए अपने नेता अन्नामलाई को किनारे बैठाने में भी देर नहीं की.
पिछले कई दशकों से तमिलनाडु में सत्ता DMK और AIADMK के बीच आती-जाती रही है. दोनों पार्टियों की विचारधारा में कोई खास फर्क नहीं है. AIADMK का ग्रामीण और मध्यवर्गीय वोटरों में पकड़ मानी जाती है. गरीब और मध्यमवर्गीय वोटरों तो लुभाने के लिए पलानीस्वामी ने वादा किया है कि अगर वो सत्ता में आते हैं तो चावल राशन धारकों को मुफ्त में रेफ्रिजरेटर दिया जाएगा. DMK सरकार महिलाओं को 1000 रुपये देती है, वो इसे बढ़ाकर डबल यानी 2000 कर देंगे. AIADMK की सरकार बनने पर पुरुषों को भी बसों में मुफ्त सफर की सुविधा मिलेगी.
पश्चिमी तमिलनाडु को AIADMK का गढ़ माना जाता है. इस क्षेत्र में पलानीस्वामी का प्रभाव ज्यादा है. छोटे शहरों के साथ ग्रामीण इलाकों में भी AIADMK की पकड़ मजबूत मानी जाती है. दक्षिणी हिस्से में बीजेपी से गठबंधन की वजह से NDA को अपना पलड़ा मजबूत लग रहा है. लेकिन, तमिलनाडु के लोग किस सोच और मुद्दे पर EVM का बटन दबाएंगे - इसे लगातार डीकोड करने की कोशिशों में चुनावी अखाड़े के महारथी जुटे हैं.
तमिलनाडु में बीजेपी के कॉन्फिडेंस बढ़ने की तीन बड़ी वजह है - पहली, तमिलनाडु में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहते अन्नामलाई ने पदयात्रा की. अपने खास अंदाज और आक्रमक तेवरों के जरिए युवाओं को बीजेपी से जोड़ा. फिलहाल, तमिलनाडु बीजेपी की कमान नैनार नागेंद्रन के हाथों में है, जो जयललिता और ओ. पनीरसेल्वम की सरकार में मंत्री रह चुके हैं. नागेंद्रन AIADMK से बीजेपी में आए हैं - बीजेपी रणनीतिकार अच्छी तरह जानते हैं कि नागेंद्रन का कब, कहां और किस तरह इस्तेमाल करना है. दूसरी, बीजेपी के बड़े नेताओं की सोच है कि इस बार चुनाव में DMK के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है. इसलिए, बीजेपी नेताओं ने स्टालिन सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दे को जमकर उठाया. तीसरी, PMK और AMMK जैसे दलों को गठबंधन की छतरी तले लाने की वजह से सूबे के पिछड़े वोट बैंक के NDA में शिफ्ट होने का अनुमान लगाया जा रहा हैं. बीजेपी की पश्चिमी और दक्षिणी तमिलनाडु में पकड़ मजबूत मानी जा रही है. तमिलनाडु चुनाव में जीत-हार तय करने में एक और फैक्टर काम करता है – वो है कम वोटों का अंतर. दो से तीन फीसदी वोटों के अंतर से भी बड़ा खेल हो जाता है. ऐसे में एक्टर विजय थलापति की पार्टी TVK की एंट्री ने तमिलनाडु में समीकरणों को उलझा दिया है. विजय की TVL को चुनाव चिन्ह के तौर पर सीटी मिली है, जो अकेले सूबे की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है. एक्टर से राजनेता बने विजय अपने बड़े युवा फैनबेस और एंटी-इस्टैब्लिशमेंट इमेज पर भरोसा कर रहे हैं. वो डीएमके को अपना राजनीतिक और बीजेपी को वैचारिक विरोधी बता चुके हैं.
साउथ के सुपरस्टार विजय थलापति की चुनावी सभाओं में लोगों की भारी भीड़ जुट रही है. उनकी नई-नवेली तमिलगा वेट्री कजगम यानी TVK ने तमिलनाडु विधानसभा की सभी 234 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं. विजय थलापति खुद दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं. अब सवाल उठ रहा है कि क्या विजय थलापति की TVK तमिल राजनीति की पारंपरिक पार्टियों यानी DMK और AIADMK को सीधी टक्कर दे रही है? क्या विजय थलापति को तमिलनाडु के लोग उसी तरह लेंगे- जैसे कभी एमजी रामचंद्रन या जयललिता को लिया?
विजय थलापति भी तमिलनाडु के वोटरों को लुभाने के लिए ठीक उसी रास्ते आगे बढ़ते दिख रहे हैं - जो AIADMK और DMK का रहा है. TVK की सरकार बनने पर हर परिवार को साल में 6 मुफ्त एलपीजी गैस सिलेंडर महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए देने और महिला, बच्चों और बुजुर्गों के लिए अलग विभाग बनाने का वादा करते हैं.
माना जा रहा है कि शहरी क्षेत्रों में विजय थलापति का प्रभाव दिख सकता है. TVK की नजर खासतौर से चेन्नई पर है, जहां DMK की पकड़ बहुत मजबूत मानी जाती है. 2021 के चुनाव में चेन्नई की सभी 16 सीटों पर DMK गठबंधन जीता. तमिल राजनीति का एक मिजाज ये भी है कि ज्यादातर सीटों पर जीत-हार का फैसला कम वोटों से होता है. ऐसे में हर विधानसभा सीट पर TVK उम्मीदवारों की मौजूदगी सत्ता समीकरण बनाने और बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा सकती है.
ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि TVK के अकेले मैदान में उतरने से कुछ वोट मिलने के चांस तो बन रहे हैं. लेकिन, वो सीटों में कितना तब्दील होगा - भविष्यवाणी करना मुश्किल है.
तमिल राजनीति में विजय की एंट्री की तुलना MG रामचंद्रन से भी की जा रही है. इतिहास गवाह है कि MGR ने दो दशक के राजनीतिक अनुभव के बाद करुणानिधि के शासन को चुनौती दी और पार्टी बनाई. दूसरी ओर एक्टर से लीडर बने विजय का राजनीतिक अनुभव अभी बहुत कम हैं.
फिल्म स्टार रजनीकांत और कमल हासन ने भी राजनीति में हाथ आजमाया. लेकिन, बेअसर रहे. हालांकि, एक सच ये भी है कि रजनीकांत और कमल हासन ने करियर के ढालान के दौर में सियायत का रास्ता चुना. दूसरी ओर, विजय थलापति ने ऐसे समय में एंट्री ली है - जब उनका सिनेमा में करियर बुलंदियों के आसमान पर है. विजय की चुनावी सभाओं में जुटने वाली भीड़ अगर वोट में तब्दील हो गईं. तो तमिलनाडु में एक नया समीकरण सामने आ सकता है?
सवाल ये भी है कि क्या विजय तमिल पॉलिटिक्स में दूसरे MGR बनेंगे या कमल हासन और रजनीकांत की तरह चुनावी राजनीति में फ्लॉप हो जाएंगे? सवाल ये भी है कि क्या विजय की पार्टी चेन्नई में DMK का खेल खराब करेगी? सवाल ये भी है कि क्या विजय की TVK ने अकेले चुनाव में उतकर बड़ी गलती कर दी है? क्या चुनावी नतीजों के बाद गठबंधन के सभी सभी विकल्प खुला रखे हुए हैं विजय थलपति? ऐसे सभी सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं. DMK और उसके गठबंधन साझीदार BJP नेतृत्व पर लगातार हमला कर रहे हैं. AIADMK को BJP का मोहरा साबित करने पर तुले हैं, जिससे द्रविड़ वोटों की गोलबंदी की जा सके. द्रविड़ियन राजनीति के गढ़ तमिलनाडु पर BJP की बाज की तरह नजर है. AIADMK के साथ गठबंधन के रास्ते तमिलनाडु की सत्ता में एंट्री के खिड़की-दरवाजे खोलती दिख रही है. BJP आर्थिक उदारीकरण, विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे रखते हुए, खुद को एक ऐसी पार्टी के तौर पर पेश कर रही है - जो तमिल इतिहास और गौरव का सम्मान करती है. तमिलनाडु में अबकी बार सत्ता के लड़ाई बहुत दिलचस्प है. ऐसे में 4 मई को नतीजों के बाद पता चलेगा कि तमिलनाडु के लोग पुराने ढर्रे की राजनीति बनाए रखना चाहते हैं या बदलावों के लिए EVM का बटन दबाते हैं. क्योंकि, तमिलनाडु के नतीजे कुछ हद तक तय करेंगे कि भविष्य में दक्षिण भारत के राज्यों में राजनीति किस तरह से आकार लेगी?