अमेरिका और ईरान के बीच चली 100 दिनों से अधिक की तनातनी ने दुनिया की बड़ी आबादी को एहसास करा दिया कि युद्ध की कीमत मानवता को किस तरह चुकानी पड़ती है . हजारों किलोमीटर दूर गिरने वाली मिसाइलें किस तरह युद्ध से दूर खड़े मुल्कों में रहने वाले लोगों की रसोई से रोजगार तक पर असर डालती हैं . मिडिल ईस्ट की टेंशन ने पूरी दुनिया की आर्थिक तरक्की की रफ्तार को सुस्त कर दिया…लेकिन, World Bank की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि तमाम वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा . ऐसे में हमारे की बड़ी आबादी के मन में ये सवाल भी उठ रहा है कि जब हम दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था हैं – तो फिर रोजमर्रा की चुनौतियां कम क्यों नहीं हो रही हैं? महंगाई की तुलना में कमाई क्यों नहीं बढ़ रही है? कॉलेज से पास आउट युवाओं को खाली हाथ क्यों घूमना पड़ रहा है? बड़ा सवाल ये भी है कि क्या मौजूदा आर्थिक विकास की रफ्तार से भारत 2047 तक विकसित देशों की कतार में पहुंच पाएगा ? क्या भारत की GDP 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की हो पाएगी ? क्या हमारे उद्योग-धंधे AI युग की चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार हैं ? क्या हमारे देश के लोगों की प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों जैसी हो जाएगी? क्या हमारी अर्थव्यवस्था के बीच से ऐसा सिस्टम निकलेगा, जिसमें 81 करोड़ लोगों के सामने हर महीने मिलने वाले मुफ्त सरकारी अनाज की ओर देखने की मजबूरी नहीं रहेगी? भारत के 11 करोड़ किसानों को हर साल मिलने वाले 6 हजार रुपये का इंतजार नहीं रहेगा ? क्या गरीब-अमीर के बीच की खाई कम होगी? एक सवाल ये भी है कि अगले 10 वर्षों में हमारी अर्थव्यवस्था, बैंकिंग और करेंसी में किस तरह का बदलाव दिखना तय है?

आंकड़ों की बाजीगरी में कई बार असली तस्वीर कहीं छिप जाती है या धुंधली दिखाई देती है . आम आदमी समझ नहीं पाता कि जो तस्वीर अर्थशास्त्री दिखाने की कोशिश कर रहे हैं – वैसी तस्वीर उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में क्यों नहीं दिखाई दे रही है . मसलन, World Bank की रिपोर्ट भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली Economy बता रही है . चीन की अर्थव्यवस्था से भी तेज रफ्तार…अमेरिका से भी अधिक रफ्तार…सऊदी अरब, यूएई सब पीछे . World Bank को भारतीय अर्थव्यवस्था पर इतना भरोसा है कि वर्ष 2026-27 के लिए भारत की Growth Rate 6.6% रहने का अनुमान लगाया है . हालांकि, पिछले वर्ष की तुलना में ये कम है . ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने पहला अग्निपथ यही है कि क्या इस रफ्तार हम 2047 तक विकसित देशों की लिस्ट में शामिल हो पाएंगे? देश के दिग्गज अर्थशास्त्रियों ने विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सालाना 8 से 10 फीसदी के बीच ग्रोथ रेट को जरूरी बताया था . लेकिन, आज की तारीख में GDP रैंकिंग में भी भारत खिसक कर 6वें नंबर पर आ गया है .

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ये भी अजीब इत्तेफाक है कि दुनिया में सबसे तेज आर्थिक विकास दर के बावजूद भारत अब तक 5 ट्रिलियन डॉलर के टारगेट तक नहीं पहुंच पाया है. साल 2018 में प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का टारगेट सेट किया था …लेकिन, अभी भी लक्ष्य से भारत करीब 850 अरब डॉलर पीछे है . ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मौजूदा रफ्तार से 2047 तक भारत 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन पाएगा ?

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सवाल ये भी है कि आखिर भारत अब तक 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था क्यों नहीं बन पाया . इसकी एक वजह मानी जा रही है कि डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार कमजोर होना . साल 2018 में एक डॉलर करीब 70 रुपये का था..जो अब 95 रुपये का हो चुका है. दूसरी वजह, कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन की वजह से आर्थिक रफ्तार से सुस्ती … तीसरी वजह, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और चौथी वजह है - वैश्विक तनाव की वजह से एक्सपोर्ट की सुस्त रफ्तार .

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विश्व बैंक की 2026-27 की रिपोर्ट

  1. भारत की 6.6%
  2. चीन की 4.2%
  3. अमेरिका की 2.5%
  4. जापान की 0.7%
  5. सऊदी अरब की 3%
  6. UAE की 2.4%

आर्थिक विकास दर का अनुमान लगाया गया है. मौजूदा समय में भारत 6.5% से 6.6% सालाना विकास दर के साथ दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना हुआ है . अगर भारत की आर्थिक तरक्की की मौजूदा रफ्तार बनी रही और डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के स्तर पर टिका रहा…तो अगले 2 वर्ष में भारत 5 ट्रिलियन के टारगेट को छू सकता है . अगर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का हिसाब लगाएं तो

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  • पहले नंबर पर $32.38 trillion के साथ अमेरिका खड़ा है .
  • दूसरे नंबर पर $20.85 trillion के साथ चीन खड़ा है .
  • तीसरे नंबर पर $5.45 trillion के साथ जर्मनी है .
  • चौथे नंबर पर $4.38 trillion के साथ जापान है .
  • पांचवें नंबर पर $4.26 trillion के साथ यूनाइटेड किंगडम है.
  • उसके बाद $4.15 trillion के साथ भारत का नंबर है .

ऐसे में साल 2047 तक भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए अभी बहुत तेज दौड़ लगाने की जरूरत है . आजादी की 100वीं वर्षगांठ से पहले भारत को विकसित देश बनाने के लिए प्रति व्यक्ति आय भी विकसित देशों जैसी होनी चाहिए…अगर आज की तारीख में विकसित देशों से भारतीयों की आय की तुलना की जाए तो

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  • अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय 94,430 डॉलर है .
  • चीन में 14,874 डॉलर
  • जर्मनी में 65,303 डॉलर
  • जापान में 35,703 डॉलर
  • ब्रिटेन में 61,056 डॉलर और
  • भारत में 2,813 डॉलर
  • फ्रांस में 52,083 डॉलर
  • इटली में 46,505 डॉलर
  • रूस में 18,525 डॉलर

ऐसे में समझा जा सकता है कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अभी विकसित देशों से कितना पीछे खड़ा है. 2047 तक भारत की अर्थव्यवस्था को 30 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का टारगेट कैसे पूरा होगा? डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत भी अर्थव्यवस्था के डॉक्टरों की चिंता बढ़ा रही है…26 मई, 2024 को जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने, तब एक डॉलर की कीमत 58.94 रुपये थी . आज की तारीख में एक डॉलर की कीमत 95 रुपये से अधिक हो चुकी है . भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी कम हुआ है . इस साल जनवरी से मई तक महंगाई दर में लगातार बढ़ोतरी देखी गई . आम आदमी आंकड़ों की बाजीगरी नहीं जानता-समझता है . लेकिन, ये जरूर जानता है कि हर महीने उसे रसोई गैस सिलेंडर के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है . स्कूटर, बाइक या कार से दफ्तर जाने वाले लोगों को ये जरूर महसूस हो रहा है कि उनका पेट्रोल का खर्चा बढ़ गया है . मिडिल ईस्ट की जंग की आग में चाय-समोसा तक सब महंगा हो गया. भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी स्थिति समझने के लिए एक दूसरे आंकड़े की मदद लेना भी जरूरी है. Global Inequality Report 2026 के मुताबिक, देश में सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों के पास कुल दौलत का 65 प्रतिशत हिस्सा है…उसमें भी सिर्फ एक प्रतिशत के पास 40% हिस्सा है. देश के टॉप 10% लोगों की कमाई में हिस्सेदारी 58% है…वहीं, नीचे से यानी आर्थिक रूप से कमजोर 50% लोग मिलकर 15% कमाई कर पाते हैं. मतलब, पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह का आर्थिक विकास हुआ है – उसमें अमीर और अमीर होता चला गया…गरीब और गरीब होता गया . सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि महंगाई लगातार बढ़ रही है .


National Statistical Office की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया कि मई में ग्रामीण इलाकों में खुदरा महंगाई 4.25 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 3.53 प्रतिशत दर्ज की गयी . इस साल जनवरी में महंगाई दर 2.74%, फरवरी में 3.21%, मार्च में 3.40%, अप्रैल में 3.48%, मई में 3.93% दर्ज की गई . पूरी दुनिया किस तरह के संकट से गुजर रही है . इसका प्रधानमंत्री मोदी पहले ही जिक्र कर चुके हैं .

भारत का आम आदमी महंगाई के बोझ तले बेहाल है . पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी का असर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देश की बड़ी आबादी पर पड़ रहा है. दूसरी ओर, आर्थिक असमानता को लेकर जारी Global Inequality Report 2026 बताती है कि भारत में आर्थिक विकास की सुनामी के बावजूद समाज में असमानता बढ़ी है. सबसे ज्यादा कमाने वाले 10 प्रतिशत लोग भारत की कमाई का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं..तो नीचे से गरीब 50% लोग सिर्फ 15% में सिमटे हैं. सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल दौलत का करीब 65% हिस्सा है… अकेले टॉप 1% लोगों के पास 40% दौलत है . मौजूदा ट्रेंड इशारा कर रहा है कि तेजी से बदलते दुनिया के अर्थतंत्र में हमारे देश में अमीर और अमीर हो रहा है…गरीब और गरीब .

आंकड़ों के मुताबिक, साल 1951 से 1980 तक भारत की कुल आय में टॉप 10% अमीरों का हिस्सा 33 से 35% के बीच रहा … 1980 से 2000 के बीच टॉप 10% रईसों की कमाई में हिस्सेदारी 40% तक पहुंच गयी … जो अब 58% हो चुकी है . अगर कमाई में अमीरों की हिस्सेदारी बढ़ी है तो इसका मतलब ये भी निकलता है कि कमाई में गरीबों की हिस्सेदारी घटी है…आज की तारीख में दुनिया में सबसे अधिक युवा भारत में हैं . लेकिन, एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि हमारी युवा शक्ति में से एक बड़ा वर्ग ऐसा है - जिसके पास उसकी डिग्री के हिसाब से काम नहीं है. कमाई नहीं है. एक बड़ा वर्ग ऐसा है- जिसके पास सिर्फ नाम का रोजगार है .

एक स्टडी बताती है कि 2047 तक भारत में प्रति व्यक्ति आय करीब सात गुना बढ़ जाएगी मतलब प्रति व्यक्ति कमाई करीब 15 लाख रुपये होगी…लेकिन, सवाल यही है कि क्या सबकी कमाई बढ़ेगी या सिर्फ समाज के मुट्ठी भर लोगों की . विकसित भारत में गरीब-अमीर के बीच की खाई कम होगी या और चौड़ी ?

भारत एक युवा और महत्वाकांक्षी देश है . युवाओं के सपने बड़े हैं . जिस परिवार का बैंक में खाता है . गैस कनेक्शन, टीवी, स्मार्टफोन और पक्की छत है . वो अब गुजारे लायक जिंदगी से आगे की सोच रखते हैं . बेहतर स्कूल, बेहतर इलाज, बेहतर सुविधाओं के साथ अच्छी कमाई चाहते हैं . लेकिन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने हमारे उद्योग जगत के सामने नई तरह की चुनौतियां पैदा कर दी है . फैक्ट्रियों में इंसानों की जगह ह्यूमनॉइड रोबोट लेते जा रहे हैं…एआई का इस्तेमाल कर कर्मचारियों पर होने वाला खर्च कम करने की जुगत चारों ओर चल रही है . मतलब, संकट नौकरी और रोजगार पर भी है . अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 40 फीसदी ग्रेजुएट्स को नौकरी नहीं मिल पा रही है . जिस रफ्तार से AI आगे बढ़ रहा है – उससे नौकरियों के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है . ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे उद्योग जगत को AI किस हद तक प्रभावित करेगा? एआई की चुनौतियों के अग्निपथ को हमारे उद्योग-धंधे किस तरह पा करेंगे?

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 1.1 करोड़ ग्रेजुएट बेरोजगार हैं और 40% युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही … 15 से 25 वर्ष के ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर करीब 40 फीसदी है…वहीं, 25 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में 20 फीसदी है . सामान्य ग्रेजुएट ही नहीं इंजीनियरिंग और MBA जैसी प्रोफेशनल कोर्सेज की डिग्री लिए घूमने वाले बेरोजगारों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है . दूसरी ओर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नौकरियों की प्रकृति में लगातार बदलाव कर रहा है . फैक्ट्री से दफ्तर तक ऑटोमेशन और एआई को तेजी से अपनाया जा रहा है . इससे पुराने ढर्रे की नौकरियां खत्म हो रही है और नई पैदा हो रही नौकरियों के लिए खास तरह की Skill की जरूरत है . दूसरी ओर, फैक्ट्रियों की Workforce में ह्यूमनॉइड रोबोट तेजी से जगह बनाते जा रहे हैं. अर्थशास्त्रियों की सोच है कि इंसान की तुलना में रोबोट बहुत सस्ते हैं. ऐसे AI रोबोट्स से इंसान की तुलना में कई गुना अधिक काम लिया जा सकता है. एक स्टडी के मुताबिक,भारत में करीब 52 हजार से अधिक रोबोट काम कर रहे हैं…हर साल 9 हजार की रफ्तार से नए रोबोट हमारे देश में Work Force का हिस्सा बन रहे हैं . अभी भारत में सबसे ज्यादा रोबोट का इस्तेमाल ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में हो रहा है . ऐसे में सवाल उठ रहा है कि रोबोट भारत के उद्योग-धंधों और अर्थव्यवस्था के आकार-प्रकार में कितना बदलाव करेंगे?

एआई तकनीक का इस्तेमाल कर Scale, Efficiency और Productivity बढ़ाई जा सकती है . लेकिन, ये ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है कि जेनरेटिव AI के दौर में अपने संस्थान की साइबर अटैक से किस तरह सुरक्षा सुनिश्चित की जाए - जिससे कोई AI एजेंट सिस्टम में घुसपैठ न सके. इसके लिए कंपनियों को हाई रिस्क वाली प्रक्रियाओं को डीपफेक युग के हिसाब से डिजाइन करना होगा… कमांड वेरिफिकेशन के लिए तकनीक के साथ नई सोच की भी जरूरत होगी…AI आधारित खतरों को तकनीकी समस्या से अधिक आर्किटेक्चर और डिजाइन की समस्या की तरह देखना होगा…कारखाना, फैक्ट्री या दफ्तरों की साइबर सुरक्षा के लिए Zero Trust मॉडल पर फोकस करना होगा मतलब, हर बार पहचान, डिवाइस, एक्सेस को कन्फर्म करना होगा? एक बहुत मजबूत कानूनी कवच की भी जरूरत महसूस की जा रही है - जिससे AI एजेंट्स और बॉट्स द्वारा किए गए अपराध या नुकसान की भरपाई के लिए किसी को दोषी या जिम्मेदार ठहराया जा सके?

अमेरिका की सिलिकॉन वैली में इन दिनों एक बात को लेकर सबसे अधिक चर्चा हो रही है . वो है – सुरक्षा की . एआई के दौर में सिस्टम को, संस्थान को साइबर अटैक से बचाने की . टेक एक्सपर्ट ये भी दलील दे रहे हैं कि तकनीकी खतरों के साथ-साथ संस्थानों को अपने निर्णय, प्रक्रिया और सुरक्षा ढांचे की भी जिम्मेदारी लेनी होगी . मतलब, AI से जुड़े खतरों ने पूरी दुनिया की सोच को बदल दिया है . अब तक ये सोच थी कि हमलावर इंसान होता है…जो थकता है…गलतियां करता है . उसकी सीमाएं होती हैं . किसी व्यक्ति को देखकर या उसकी आवाज सुनकर उसकी पहचान सुनिश्चित की जा सकती है . लेकिन, एआई ने इन दोनों धारणाओं को बदल दिया है . आज की तारीख में AI एजेंट बिना रुके, बिना थके, रियल टाइम खुद को बदलते हुए अटैक कर सकते हैं . आपके सिस्टम में घुसपैठ कर सकते हैं . दरअसल, अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बनाए रखने में बैंकिंग सिस्टम बहुत अहम भूमिका निभाता है . एआई का प्रभाव हमारे देश के बैंकिंग सिस्टम में भी दिखना तय है . अभी हमारे देश में करीब 50 करोड़ UPI यूजर्स हैं…मतलब, अपने स्मार्टफोन में अपना पूरा बैंक खाता लेकर चलते हैं . लेकिन, जिस तरह से साइबर फ्रॉड की घटनाएं बढ़ रही हैं…जिस तरह से AI एजेंट एक्टिव होते जा रहे हैं . वैसे में हमारे रुपये-पैसे और बैंक खाते की सुरक्षा का इंतजाम क्या है? आने वाले वर्षों में बैंकिंग, करेंसी और शेयर बाजार में कितना बदलाव दिखेगा ? इसे भी जानना और समझना जरूरी है .

पिछले दो दशकों में बैंकिंग सेक्टर में बहुत बदलाव आया है - पैसा जमा करने से निकालने तक के लिए बैंक जाने का झंझट बहुत हद तक कम हो चुका है . बैंक ब्रांचों से ATM और उसके बाद UPI ने भारत में बैंकिंग को बहुत आसान बना दिया है . छोटे-मोटे लोन भी अब बैंक सेकेंडों में ऑनलाइन उपलब्ध करा देते हैं हैं..लेकिन, भारत के बैंकिंग सेक्टर में अभी और बदलाव होना बाकी है . दलील दी जा रही है कि AI और रोबोटिक्स इसी रफ्तार से बढ़ते रहे - तो ऐसी अर्थव्यवस्था आकार ले सकती है - जिसमें मनी यानी रुपया,डॉलर, यूरो वगैरह का महत्व खत्म हो जाएगा और संसाधनों की कोई कमी नहीं होगी? मौजूदा समय में जिस करेंसी के दम पर दुनिया का पूरा अर्थशास्त्र चल रहा है- उसका समीकरण अगले कुछ वर्षों में पूरी तरह बदल जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए .

भारत में UPI यूजर्स की संख्या करीब 50 करोड़ है. UPI पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी रियल टाइम भुगतान प्रणालियों में से एक है . माना जा रहा है कि अगले 10 वर्षों में UPI का और विस्तार होगा - मसलन अंतरराष्ट्रीय भुगतान बढ़ सकते हैं, क्रेडिट आधारित UPI उपयोग बढ़ सकता है, छोटे कारोबारियों के लिए डिजिटल क्रेडिट आसान हो सकता है, बैंक ग्राहक की आय, लेन-देन और डिजिटल व्यवहार का सेकेंडों विश्लेषण कर तेजी से लोन मंजूर या नामंजूर कर सकते हैं . अगले कुछ वर्षों में पारंपरिक बैंक और फिनटेक कंपनियों के बीच कंपीटिशन बढ़ने के कयास लगाए जा रहे हैं. इससे ग्राहकों को बैंकिंग की तेज, सस्ती और बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी… पारंपरिक करंसी मतलब नोट और सिक्के के इस्तेमाल का चलन धीरे कम होना तय है … पारंपरिक करेंसी की जगह डिजिटल करेंसी में दुनिया लेन-देन करती दिख सकती है - जिसमें क्रिप्टो और ब्लॉकचेन ड्राइविंग सीट पर दिख सकते हैं .

अत्याधुनिक तकनीक जिस रफ्तार से बैंकिंग और शेयर बाजार में दाखिल हो रही है … उससे शेयर बाजार में उथल-पुथल और अनिश्चितता के पहले से अधिक चांस है. क्योंकि, अब AI शेयर ट्रेडिंग बॉट्स मैदान हैं- ये ऐसे सॉफ्टवेयर हैं जो AI और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल कर स्टॉक मार्केट में ट्रेड करते हैं . सेकेंडों में बड़े डेटा का विश्लेषण करते हैं..ट्रेडिंग पैटर्न की पहचान करते हैं. इंसानी भावनाओं को भी समझते हैं,उस हिसाब से रणनीति बनाते हैं और बिना एक सेकंड की देरी के खरीद या बिक्री का फैसला लेते हैं . AI बॉट्स 24 घंटे बिना रुके-बिना थके काम करते हैं..ऐसे में एल्गोरिदम और AI बॉट्स आने वाले दिनों में शेयर बाजार में खरीद-ब्रिकी को बहुत हद तक प्रभावित करते दिख सकते हैं . अगले कुछ वर्षों में भारत में बैंकिंग, करेंसी और शेयर बाजार में ट्रेडिंग का तौर-तरीका क्रांतिकारी तरीके से बदल जाए … तो हैरानी नहीं होनी चाहिए . लेकिन, डिजिटल दुनिया में घूम रही करंसी और लेन-देन ने लोगों की बैंक खातों में जमा-पूंजी की सुरक्षा को लेकर चिंता भी पैदा कर दी है .

गूगल डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हसबिन ने हाल में एक भविष्यवाणी की…उनके मुताबिक, अगले 4 साल में एआई इंसानों से ज्यादा समझदार हो जाएगा…डेमिस हसबिन ने सरकारों से AI सुरक्षा पर तुरंत कदम उठाने की अपील की…AI कंपनी एंथ्रोपिक के Mythos को लेकर बहुत चर्चा हो चुकी है. कंपनी की ओर से कहा गया कि Mythos उन बग्स का भी पता चला सकता है – जिसे अबतक कोई नहीं ढूंढ पाया … मतलब, Mythos बैंकिंग सिस्टम के भीतर की खामियों की पहचान कर सकता है . इससे बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थानों को खतरा पैदा हो सकता है . लोगों की जमा-पूंजी खतरे में आ सकती है . पिछले कुछ दशकों से हमारे देश के हुक्मरानों की जो नीतियां रही हैं–उसमें ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का एक ही तरीका रहा है. कभी इस देश से तेल खरीदों … कभी उस देश से तेल खरीदों . भारत जैसे विशालकाय देश की ऊर्जा सुरक्षा बहुत हद तक विदेशी आयात पर निर्भर है . इस तस्वीर को भी बदलना जरूरी है . क्योंकि, भविष्य में Energy भी एक ताकतवर करेंसी जैसी बन जाएगी…जिसके पास भी Energy Resources होंगे- तो इसे सामरिक हथियार की तरह इस्तेमाल करेगा . ऐसे में अगर अगले 21 वर्षों में भारत को विकसित देशों की कतार में खड़ा करना है – तो हमारी रणनीति और तैयारी भी तकनीक में आते बदलाव से दो कदम आगे की होनी चाहिए . तकनीक, Skill Development और आर्थिक विकास के संगम की धारा इस तरह आगे बढ़नी चाहिए–जिससे सबको उसके हुनर के हिसाब से रोजगार के मौके मिल सके . भारत को 2047 तक विकसित देश बनाता है तो हमें Skill First Economy पर फोकस करना होगा. आज की तारीख में दुनियाभर में करीब साढ़े तीन करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग फैले हैं…ये संख्या कई गुना बढ़ सकती है. युवा आबादी को बिना प्रोडक्शन इकोसिस्टम का हिस्सा बनाए –समतामूलक, समरस और संपन्न राष्ट्र बनाना मुश्किल है. अगर हर हाथ को उसकी क्षमता के हिसाब से काम नहीं मिलेगा – तो 2047 तक जीडीपी के आंकड़ों में भारत चाहे जितना बड़ा दिखे … प्रति व्यक्ति आय का ग्राफ चाहे जितना ऊपर जाए … लेकिन, समाज में गरीब-अमीर के बीच खाई और चौड़ी होगी . एक ऐसा बड़ा वर्ग हमेशा तैयार रहेगा – जिसे मुफ्त सरकारी अनाज, इलाज और हर महीने कैश का इंतजार रहेगा . ऐसे में आंकड़ों की बाजीगरी से इतर दुनिया में तेजी से होते बदलावों को देखते हुए से एक ऐसी राह चुननी होगी – जिसमें समाज के आखिरी व्यक्ति की भी उत्पादन में भागीदारी सुनिश्चित कराई जा सके.