हिंदी पट्टी के राज्यों में चर्चा पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर हो रही है. ममता बनर्जी की हो रही है. बीजेपी की बंगाल ब्रिगेड की हो रही है. असम की चाय की हो रही है… हिमंता बिस्वा सरमा की प्रचार शैली की हो रही है. गौरव गोगोई द्वारा बैठाये जा रहे वोटों के गणित की हो रही है. लेकिन, तमिलनाडु का चुनावी अखाड़ा भी कम रोचक नहीं है. दक्षिण भारत के मसालेदार सांभर की तरह ही तमिलनाडु की चुनावी राजनीति भी बहुत तीखी और चटपटी है. तमिलनाडु की चुनावी राजनीति में गठबंधन है. फ्रीबीज है. विरासत की सियासत आगे बढ़ाते नेता हैं. सिल्वर स्क्रीन के सुपर स्टार हैं - जो हाथों में सीटी लिए नए तरह की राजनीति का वादा कर रहे हैं. कभी तमिल राजनीति जयललिता और करुणानिधि की परिक्रमा करती थीं. लेकिन, तमिल राजनीति के दोनों दिग्गज अब चेन्नई के मरियाना बीच पर चिर निंद्रा में सो रहे हैं. साल 2016 में जयललिता के निधन के बाद उनकी AIADMK आपसी गुटबाजी में कमजोर हुई . तो 2018 में करुणानिधि के निधन के बाद उनकी DMK को एमके स्टालिन ने संभाला और 2021 से सूबे के मुख्यमंत्री हैं. उनकी राजनीति फ्रीबीज योजनाओं के साथ द्रविड़ सामाजिक न्याय के खंभों पर खड़ी दिखाई देती है. DMK ने किला बचाए रखने के लिए कांग्रेस समेत कई दलों से गठबंधन किया है. वहीं, सत्ता में वापसी के लिए AIADMK ने BJP समेत दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन किया है. तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों के लिए 23 अप्रैल को वोटिंग होनी है. ऐसे में आज मैंने आपको तमिलनाडु के सियासी मिजाज और वहां के सामाजिक ताने-बाने में समय-समय पर होने वाली हलचलों से रू-ब-रू कराने का फैसला किया है. आपको बताऊंगी की तमिल पॉवर पॉलिटिक्स को कौन-कौन से तत्व प्रभावित करते रहे हैं? तमिल राजनीति से सिनेमाई चेहरों का जादू खत्म हो गया या इस बार दक्षिण के सुपर स्टार थलापति विजय का चमत्कार दिखेगा? क्या विजय तमिल राजनीति में वो जगह बना पाएंगे जो कभी एमजी रामचंद्रन या जयललिता की हुआ करती थी? आंदोलन के गर्भ से कैसे फूटी द्रविड़ राजनीति की धारा और वो धारा किन-किन पड़ावों से गुजरते हुए 2026 तक पहुंची है. आज तमिल राजनीति से जुड़े ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब इतिहास के पन्नों को पलटते हुए तलाशने की कोशिश करेंगे.

तमिलनाडु की सियासत और वहां के सामाजिक ताने-बाने को समझने की शुरुआत कहां से की जाए. ये तय करना भी बहुत मुश्किल काम है. तमिलनाडु की जब बात आती है - तो मेरी आंखों के सामने करीब हजार साल पुराना तंजौर का बृहदेश्वर मंदिर आता है, उसके शिखर पर रखा विशालकाय पत्थर आता है. मैं अक्सर सोचती हूं कि उस जमाने में न लिफ्ट थी. न क्रेन थी. फिर इतने बड़े पत्थर को मंदिर के शिखर पर कैसे फिट किया गया होगा? मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, रामेश्वर का रामनाथस्वामी मंदिर, चिदंबरम का नटराज मंदिर जैसे दिव्य-भव्य मंदिरों के पीछे की गजब कहानियां हैं. इन विशालकाय मंदिरों की समाज को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका रही है. मंदिरों से इतर बात की जाए तो वहां के मसालेदार सांभर के साथ डोसा … इडली-बड़ा, केले के पत्ते पर चावल-रसम, कोकोनट चटनी और सांभर के साथ लेमन राइस का ख्याल आता है. तमिलनाडु के इंजीनियरिंग कॉलेजों में उत्तर भारत के छात्र बड़ी संख्या में मिल जाएंगे. खान-पान, रहन-सहन के मामले में बहुत हद तक उत्तर-दक्षिण के बीच की दूरी मिटती जा रही है. लेकिन, तमिलनाडु की राजनीति का मिजाज अलग है. शायद यही वजह है कि 1967 के बाद वहां सत्ता की धुरी क्षेत्रीय पार्टियां रही हैं. राष्ट्रीय पार्टियां उनके पीछे खड़ी रही हैं. तमिलनाडु का इतिहास बहुत पुराना है. ऐसे में तमिल समाज और वहां की सियासत को समझने के लिए कैलेंडर को करीब 110 साल पीछे पलटना पड़ेगा. उस दौर में दक्षिण भारत में ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलित और पिछड़ी जातियां एकजुट हो रही थीं. तब आज का तमिलनाडु मद्रास प्रेसिडेंसी का हिस्सा था. जिसमें ब्राह्मणों की आबादी सिर्फ 3.2 फीसदी थी. लेकिन, तमिल समाज में चारों ओर ब्राह्मणों का वर्चस्व था. इसके विरोध में 1892 में ही मद्रास समाज सुधार संघ की स्थापना हो चुकी थी. कई मौकों पर ब्राह्मणों और पिछड़ी जातियों में टकराव सामने आने लगा. कांग्रेस के तौर-तरीकों से नाराज कुछ लोगों ने अलग राह पकड़ी. बात 1916 की है… कांग्रेस से बगावत कर निकले टीएम नायर और सीपी त्यागराज चेट्टियार जैसे नेताओं ने दक्षिण में पहली गैर-ब्राह्मण संस्था South Indian Liberal Association की छतरी तानी. उसी दौर में गैर-ब्राह्मण घोषणा पत्र जारी हुआ.

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बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ तमिल समाज एक बड़े उथल-पुथल और सामाजिक बदलाव के दौर से गुजरने लगा. ब्रह्मणों के वर्चस्व के खिलाफ दलित और पिछड़ी जातियां एकजुट होने लगीं. ब्राह्मण खुद को आर्यों का पूर्वज और संस्कृत को अपनी संस्कृति का हिस्सा बताते. उस दौर में तमिल भाषा पर संस्कृत का बहुत प्रभाव था. ऐसे में तमिल समाज में एक ऐसे आंदोलन ने जोर पकड़ा - जिसका मकसद था - तमिल भाषा को संस्कृत के चंगुल से आजाद करवाना.

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एक ओर भाषा की पहचान की लड़ाई… दूसरी ओर सामाजिक बराबरी की जंग. बात करीब 100 साल पुरानी है. वो साल था - 1916 का. ब्राह्मण वर्चस्व के खिलाफ बढ़ते असंतोष ने जन्म दिया, जस्टिस पार्टी को. इस पार्टी ने मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस और ब्राह्मण प्रभुत्व को सीधी चुनौती दी. जस्टिस पार्टी की मांग थी - गैर-ब्राह्मणों को भी वैसा ही प्रतिनिधित्व मिले, जैसा उस दौर में मुसलमानों को मिल रहा था.

जस्टिस पार्टी की मांग पर 1919 में मद्रास एसेंबली में गैर-ब्राह्मणों के लिए 28 सीटें रिजर्व कर दी गयी. ये वहां के सामाजिक समीकरणों का ही नतीजा था कि जस्टिस पार्टी ने 1920 के चुनाव में 98 में से 63 सीटें जीत ली. लेकिन, अंग्रेजी सरकार के साथ खड़ी होने की वजह से जस्टिस पार्टी लोगों के मन से उतरने लगी. तब दक्षिण भारत में द्रविड़ आंदोलन के परचम को आगे बढ़ाया ईवी रामास्वामी नायकर पेरियार ने, जो कभी हाथों में कांग्रेस का झंडा लेकर असहयोग आंदोलन से लोगों को जोड़ने में अहम किरदार निभा चुके थे.

परियार ने संस्कृत भाषा का विरोध शुरू किया और इसे दक्षिण में आर्य उपनिवेशीकरण का प्रतीक बताने लगे . उन्होंने हिंदू धर्म की आस्था और मान्यताओं को चुनौती दी. उनके आत्म-सम्मान आंदोलन से लोग बहुत तेजी से जुड़ने लगे. पेरियार की दलीलें तमिल समाज के दलितों और पिछड़ी जातियों को बहुत सुकून देतीं, वो अच्छी तरह समझ रहे थे कि तमिल समाज का बड़ा हिस्सा क्यों उबल रहा है?

रामास्वामी पेरियार अच्छी तरह जानते थे कि हिंदी पट्टी में रामायण और भगवान राम का कितना ऊंचा स्थान है. ऐसे में उन्होंने रामायण को अलग चश्मे से देखना शुरू किया. उन्होंने अपनी सोच के हिसाब से नई रामायण लिख डाली. जिसमें रावण को एक आदर्श द्रविड़ बताने की कोशिश की. पेरियार की उगुवाई में एक ऐसी आंधी चली - जिसमें दक्षिण भारत की सामाजिक लड़ाई. एक नई परिभाषा में ढलने लगी - ब्राह्मण बनाम दलित - आर्य बनाम द्रविड़.

यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं था, यह पहचान, बराबरी और आत्मसम्मान की लड़ाई थी, जिसने दक्षिण भारत की राजनीति और समाज को हमेशा के लिए बदल दिया.

द्रविड़ आंदोलन से पैदा हुए ज्वार ने रामास्वामी पेरियार को दक्षिण भारत का नायक बना दिया. दलित और पिछड़ी जातियों के बीच उनकी छवि एक मसीहा की बन गयी. तमिलनाडु की जमीन पर आंदोलन और सियासत दोनों साथ-साथ आगे बढ़ रहे थे. वो साल 1937 का था, मद्रास प्रेसीडेंसी का चुनाव जीतकर सी. राजगोपालाचारी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे. उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वो पूरे देश में राजाजी के नाम से मशहूर थे. उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी के सेकेंडरी स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया. उनके इस फरमान के विरोध में तमिल भाषी लोग सड़कों पर उतर आए. मद्रास की सड़कों पर प्रचंड विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया. लेकिन, राजाजी अपने फैसले से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं थे. हिंदी विरोध के नाम पर पेरियार ने पहले से मोर्चा संभाल रखा था. उस दौर तक जस्टिस पार्टी की कमान पेरियार के हाथों में आ चुकी थी. उन्होंने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम कर दिया और पहली बार इस पार्टी के बैनर तले द्रविड़नाडु यानी द्रविड़ों का देश बनाने की मांग उठी. द्रविड़ आंदोलन ने सूबे के उग्र सोच वाले नौजवानों से लेकर नास्तिक तक को एक छतरी के नीचे ला दिया. पेरियार के दलित और पिछड़ी जातियों को समाज में बराबरी का हक दिलाने के आंदोलन से सीएन अन्नादुरई जुड़े, जो तमिल फिल्मों और नाटकों की स्क्रिप्ट लिखते थे.

नाटकों के डायलॉग लिखते-लिखते सीएन अन्नारुरई तमिल समाज पर फिल्म कलाकारों के असर को अच्छी तरह भांप चुके थे. तमिल सिनेमा से जुड़े कलाकार स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सामाजिक आंदोलनों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे. ऐसे में उनका समाज के हर वर्ग से लगातार जुड़ाव बना हुआ था. अन्नादुरई की वजह से तमिल सिनेमा का सितारे भी द्रविड़ आंदोलन के मंचों पर दिखने लगे.

साल 1944 में जस्टिस पार्टी का नया अवतार द्रविड़ कड़गम के रूम में सामने आया. वक्त का पहिया आगे बढ़ा और भारत आजादी की दहलीज पर खड़ा था. लेकिन द्रविड़ आंदोलन के भीतर एक बड़ा वैचारिक संघर्ष जन्म ले चुका था. इसके दो बड़े नेता पेरियार और अन्नादुरई अलग-अलग राह पर खड़े थे. पेरियार चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखने के पक्ष में थे. तो अन्नादुरई सत्ता के रास्ते बदलाव लाना चाहते थे. मतभेद धीरे-धीरे टकराव में बदल गए. लेकिन, जब पेरियार ने अपनी उम्र से करीब 40 साल छोटी महिला से विवाह किया, तो टकराव खुलकर सामने आ गया. द्रविड़ कड़गम दो हिस्सों में बंट गया.

पेरियार से नाता तोड़कर अन्नादुरई ने अलग नई पार्टी बनाई - द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम यानी डीएमके. इसके बाद अन्नादुरई ने अपनी पार्टी से तमिल सिनेमा के बड़े-बड़े कलाकारों और लेखकों को जोड़ना शुरू किया. इससे तमिल सिनेमा से जुड़े एन एस कृष्णन, एम आर राधा, शिवाजी गणेशन, एसएस राजेंद्रन, MG रामचंद्रन, एम करुणानिधि, जैसे चेहरे DMK के मंचों पर दिखने लगे.

तमिल सिनेमा के सुपरस्टार्स का स्थानीय लोगों के साथ जुड़ाव ज्यादा था. इसकी बड़ी वजह ये भी थी कि बड़े सितारों का अपनी कमाई का एक हिस्सा सामाजिक कार्यों में खर्च करना. अन्नादुरई की कलम से निकले नाटकों ने तमिल रंगमंच पर तो अपनी ख़ास पहचान बनाई हीं. समाज के भीतर उठ रहे ज्वार को भी अपने नाटकों के जरिए लोगों के सामने रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसी लोकप्रियता का कमाल था कि डीएमके की सभाओं में लोगों का सैलाब उमड़ने लगा.

रुपहले पर्दे के सितारों की लोकप्रियता और मौजूदगी ने DMK की अगुवाई में द्रविड आंदोलन को आगे बढ़ना शुरू किया. तमिलनाडु में सरकार कांग्रेस की थी और DMK सूबे में अपने लिए बड़ा सियासी आसमान तलाश रही थी.

वो साल 1953 का था. मानसून के दस्तक के साथ ही तमिलनाडु के लोगों को प्रचंड गर्मी से राहत मिल चुकी थी. लेकिन, सूबे में हिंदी विरोध की आग लगातार धधक रही थी. तत्कालीन कांग्रेस सरकार के एक फैसले से DMC को हिंदी विरोध का बड़ा मौका मिल गया. दरअसल, उत्तर भारत के एक कारोबारी हुआ करते थे - रामकृष्ण डालमिया. उन्होंने कल्लाकुडी में एक सीमेंट फैक्ट्री लगाई. इससे इलाके के बेरोजगारों को नौकरी मिली. देखते ही देखते इलाके की तस्वीर बदलने लगी. ऐसे में कारोबारियों को प्रोत्साहित करने के इरादे से तब की कांग्रेस सरकार ने 15 जुलाई 1953 को कल्लाकुडी का नाम बदलकर डालमियापुरम कर दिया. सरकार के इस फैसले के खिलाफ DMK ने मोर्चा खोला और इसकी अगुवाई कर रहे थे - 29 साल के करुणानिधि. आंदोलनकारियों को जहां भी हिंदी में लिखे बोर्ड दिखे, उसे उखाड़ फेंका गया या कालिख पोत दी गई. करुणानिधि की अगुवाई में कार्यकर्ता पटरियों पर लेट गए. प्रदर्शन को स्थानीय लोगों का जमकर समर्थन मिला. उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. 5 महीने बाद जब करुणानिधि जेल से बाहर निकले तो DMK में उनका कद एकाएक बहुत ऊंचा हो चुका था. सूबे में वो हर साल हिंदी विरोधी कांफ्रेंस का आयोजन करने लगे. जिसमें बड़े पैमाने पर लोग जुटने लगे. करुणानिधि के हिंदी विरोध का स्टाइल सूबे की तत्कालीन कामराज सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया. 1949 में जब हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया, तब तय हुआ था कि 26 जनवरी, 1965 से सिर्फ हिन्दी ही भारत की इकलौती राजभाषा होगी.

जैसे-जैसे 26 जनवरी, 1965 की तारीख नजदीक आती जा रही थी - डीएमके का हिंदी विरोध तेज होता जा रहा था. तत्कालीन लाल बहादुर शास्त्री सरकार भी मन बन बना चुकी थी कि तय तारीख को ही हिंदी लागू किया जाएगा. ऐसे में DMK ने राज्य व्यापी बंद का आह्वान किया. सीएन अन्नादुरई चाहते थे कि हिंदी लागू किए जाने के विरोध में लोग अपने घरों के बाहर काला झंडा लगाए. इसके लिए तारीख चुनी गई 25 जनवरी, 1965. तमिलों ने हिंदी का प्रचंड विरोध शुरू किया. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब 'भारत नेहरू के बाद' में लिखा है कि 'तमिलनाडु के सैकड़ों गांवों में हिंदी के पुतले जलाए गए और हिंदी किताबों की होली जलाई गई. हिंदी से संबंधित संविधान के पन्नों तक को आग के हवाले कर दिया गया. यही नहीं, रेलवे स्टेशनों और डाकघरों से भी हिंदी के चिन्ह या हो हटा दिए गए या उस पर कालिख पोत दी गई. तमिलनाडु के शहरों, कस्बों में पुलिस और गुस्साए छात्रों के बीच झड़पें हुईं.'

विरोध-प्रदर्शन और हिंसक झड़पों का सिलसिला करीब दो हफ्ते तक चला, जिसमें कईयों की जान गयी. सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारियां हुई. तमिलनाडु में विरोध-प्रदर्शनों को देखते हुए तत्कालीन शास्त्री सरकार को अपना इरादा बदलना पड़ा और हिंदी भारत की इकलौती राजभाषा नहीं बन पायी. लालबहादुर शास्त्री ने रेडियो संबोधन के जरिए भरोसा दिया कि हरेक प्रांत को पूरा अधिकार होगा कि वो अपनी पसंद की भाषा में या अंग्रेजी में काम-काज कर सकता है. इसके बाद विरोध-प्रदर्शन खत्म हुआ. इसे डीएमके ने अपनी बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया. साठ के दशक में हिंदी के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन ने DMK को तमिलनाडु के सियासी फलक पर बड़ी पहचान दिलाई.

कैलेंडर पलटा और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव की घंटी बजी. मजबूत वैचारिक जमीन और चमकदार चेहरों के साझा संघर्ष का ही कमाल था कि 1967 में डीएमके ने सूबे से कांग्रेस का सफाया कर दिया. डीएमके की आंधी में के कामराज जैसे कांग्रेस के कद्दावर नेता भी तिनके की तरह उखड़ गए. सूबे की 222 सीटों में से 137 पर डीएमके ने जीत हासिल की. तमिल राजनीति में हुए इस बदलाव ने पूरे भारत को दंग कर दिया.

तमिलनाडु में जब पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, तो डीएमके की ओर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे सीएन अन्नादुरई. उनके साथ खड़े थे, तब के मशहूर पटकथा लेखक एम करुणानिधि. 3 फरवरी 1969 को मुख्यमंत्री अन्नादुरई ने आखिरी सांस ली. अपने 678 दिन के कार्यकाल में उन्होंने दो भाषा यानी तमिल और अंग्रेजी, समाज सुधार और सरकारी मदद को लेकर लकीर खींची. उसी को आज भी तमिल राजनीति चमकदार बनाने में जुटी हुई है.

सीएन अन्नादुरई के निधन के बाद हिंदी विरोध और द्रविड़ गर्व के मुद्दे को आगे बढ़ाया तमिल सिनेमा के लेखक और कवि एम करुणानिधि ने. उनके साथ मजबूती से खड़े थे - मारुदुर गोपालन रामचंद्रन यानी MGR. जो अपनी जवानी के दिनों से ही खादी के कपड़ों में नज़र आते थे. उनका जादू तमिलनाडु के लोगों के सिर चढ़कर बोलता था. पर्दे पर उनकी छवि एक ऐसे नायक की थी, जो शोषण करने वाली ताकतों के खिलाफ लड़ता था. रुपहले पर्दे पर उनकी ऐसी चमकदार छवि गढ़ने में करुणानिधि की स्क्रिप्ट का अहम योगदान था, अन्नादुरई के निधन के बाद DMK की कमान पूरी तरह से के करुणानिधि के हाथों में आ गयी. उनके समर्थक उन्हें कलाईनार यानी कला का विद्धान कह कर पुकारते थे. अन्नादुरई के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे - करुणानिधि और एमजीआर की हैसियत नंबर दो की हो गयी.

सफलता और शोहरत के बुलंदियों पर खड़े MRG के पैर हमेशा जमीन पर रहे. उनके दिल में समाज के गरीब और कमजोर लोगों के लिए खास जगह थी. वो जरुरतमंदों की मदद का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. MGR जब गरीबों के बीच होते तो उनकी जुबान बोलते, उनके दुख-दर्द में साझीदार बन जाते. उनकी इसी अदा ने उन्हें तमिल समाज में असल जिंदगी का महानायक बना दिया.

MGR का लोगों से जुड़ाव लगातार बढ़ता जा रहा था. साल 1971 में DMK फिर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई. दोबारा करुणानिधि मुख्यमंत्री बने. लेकिन, सत्ता का एक मिजाज ये भी होता है कि आपसी संघर्ष के लिए माहौल बनने होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है. उस दौर में सीएम करुणानिधि पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे. तो MGR से उनकी तल्खी बढ़ने लगी. मामला इस हद तक गया कि करुणानिधि ने MGR को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. ऐसे तमिल सिनेमा और सियासत की एक सुपरहिट जोड़ी टूट गयी.

एमजीआर ने अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम नाम से अलग पार्टी बना ली. तमिल सरोकार, सिनेमा और सियासत तीनों नदी की धारा की तरह आगे बढ़ रहे थे. MGR ने भी अपनी पार्टी के विस्तार के लिए तमिल सितारों का जमकर इस्तेमाल किया. उसमें ग्लैमर को भी जोड़ा और साल 1977 में चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले पहले अभिनेता बन गए.

MGR ने अपनी सरकार के टॉप एजेंडा में लोक-कल्याणवाद को रखा. इससे द्रविड़ कड़गम का मूल तर्कवादी और ब्राह्मण विरोधी एजेंडा कमजोर हो गया. उनकी पार्टी से जुड़े लोग उस दौर में सांसद पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति पर भी अपनी छाप छोड़ने की कोशिश की. दरअसल, तमिल राजनीति में उनकी शख्सियत के सामने दूसरे सियासी दलों के नेताओं की छवि बौनी दिख रही थी.

तमिलनाडु की राजनीति दो ध्रुवों की परिक्रमा करने लगी. एक ओर करुणानिधि की अगुवाई वाली डीएमके थी, दूसरी ओर एमजीआर की अगुवाई वाली AIADMK. दोनों पार्टियों की वैचारिक जमीन भी एक जैसी ही थी. लेकिन, करुणानिधि की तुलना में एमजीआर की सोच थोड़ी उदार थी. द्रविड़ आंदोलन के नायक रामास्वामी पेरियार के लिए भी उनका सम्मान कभी कम नहीं हुआ. जिस तमिलनाडु में पचास के दशक में व्यक्ति पूजा के खिलाफ बड़ा आंदोलन चला. उसी सूबे में MGR की शख्सियत इतनी बड़ी बन गयी, जो उनके समर्थकों के लिए किसी देवता से कम नहीं थी. साल 1977 से लेकर 1987 तक तीन बार सूबे के मुख्यमंत्री बने. गरीबों के हक-हुकूक की आवाज़ पूरी जिंदगी बुलंद करने वाले MGR ने 24 दिसंबर 1987 को आखिरी सांस ली. तो शोक में उनके करोड़ों चाहने वालों की आंखों से आंसूओं का समंदर बहने लगा. चेन्नई में एमजीआर के अंतिम संस्कार में 10 लाख से ज्यादा लोग शरीक हुए. उसके बाद तमिल राजनीति में एक तेज-तर्रार ब्राह्मण बाला की एंट्री हुई - जिन्हें दुनिया ने जयललिता के नाम से जाना. जो कभी फिल्मों में MGR की हीरोईन हुआ करती थीं.

1987 में जब एमजी रामचंद्रन को श्रद्धांजलि देने के लिए जयललिता उनके घर पहुंचीं तो दरवाजे बंद कर दिए गए. उनके साथ धक्कामुक्की भी हुई. उस अपमान की आग ने उन्हें आयरन लेडी बना दिया. जयललिता खुद को MGR की राजनीतिक विरासत की दावेदार बता रही थीं. पर जयललिता को विरोधियों ने MG रामचंद्रन की पत्नी जानकी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया. जो सिर्फ 27 दिन ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रह पाईं. 1989 के चुनाव में AIADMK बुरी तरह हार गयी. ऐसे में विरोधियों को मजबूरी में जयललिता को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाना पड़ा.

जयललिता न कभी हार से विचलित हुईं और न अपमान से. साल 1991 में तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस से गठबंधन किया, जिसका उन्हें फायदा मिला. AIADMK को चुनावों में जीत मिली और जयललिता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैंठी. पूरे पांच साल अपने हिसाब से तमिलनाडु को चलाया. कई कड़े और बड़े फैसले लेकर अपने करीबियों को संदेश दे दिया कि पार्टी हो या सरकार वहीं सब कुछ हैं.

1996 में जयललिता विधानसभा चुनाव हार गयीं. DMK सत्ता में आई और करुणानिधि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे. जयललिता के खिलाफ पुरानी फाइलें खुलने लगीं. भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए. जयललिता पर दबाव बढ़ता जा रहा था. ऐसे में सियासत की चतुर खिलाड़ी जयललिता अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाले NDA के जहाज पर सवार हो गयीं. जयललिता अपने हिसाब से सियासी गोटियां आगे बढ़ाती रही. कैलेंडर पलटा और मार्च 1999 में एक चाय पार्टी में सोनिया गांधी और जयललिता की मुलाकात हुई. इस मुलाकात में जयललिता ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला किया, अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गयी. जयललिता ने साबित कर दिया कि वो अपनी शर्तों पर राजनीति करेंगी और अपने हिसाब से करेंगी.

2001 के तमिलनाडु विधानसभा में AIADMK को बहुमत मिला और फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं जयललिता. लेकिन, 130 दिन बाद ही भ्रष्टाचार के आरोप में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी. तो उन्होंने अपने करीबी ओ पन्नीरसेल्वम को सूबे की जिम्मेदारी सौंपी. लेकिन, ये भी तमिल राजनीति का एक अलहदा अंदाज है कि जिस सूबे में व्यक्ति पूजा के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन चला हो. वहां पन्नीरसेल्वम ने मुख्यमंत्री वाली कुर्सी पर बैठने की जगह जयललिता की तस्वीर रखकर शासन चलाया. कभी जयललिता बतौर मुख्यमंत्री जिस कुर्सी पर बैठती थीं. उस पर बैठे नहीं. हमेशा उनकी तस्वीर सामने रखकर कैबिनेट की मीटिंग की. कभी उनकी गाड़ी पर भी नहीं बैठे. पार्टी के भीतर और सरकार में जयललिता ही सब कुछ बन चुकी थी.

जयललिता की राजनीति और विवाद दोनों साथ-साथ आगे बढ़े. लोगों के दिलों पर राज करने की हर अदा उन्हें अच्छी तरह आती थी.

तमिलनाडु की राजनीति जयललिता और करुणानिधि की परिक्रमा करने लगी. राष्ट्रीय पार्टियों ने भी तमिलनाडु के साधने के लिए अपनी सहूलियत के हिसाब से गठबंधन किया. ये भी तमिल राजनीति का तिलिस्म ही है, जिसे अब तक न कांग्रेस तोड़ पायी है और न बीजेपी. आज भी तमिल राजनीति DMK और AIADMK की परिक्रमा कर रही है. हालांकि, बीजेपी ने तेजी से तमिलनाडु में विस्तार किया है. अपनी वोट-बैंक की जमीन को मजबूत किया है. लेकिन, हाल के दशकों में तमिल राजनीति के मूल तत्व धीरे-धीरे अदृश्य होते जा रहे हैं. तमिल राजनीति में अब न ब्राह्मण वर्चस्व का विरोध रहा. न हिंदी विरोध आंदोलन में प्रचंडता बची. न ही वंशवाद के खिलाफ मुखर आवाज. वोट बैंक में चुंबक लगाने के लिए सियासी पार्टियां लोगों को मुफ्त की रेबड़ियों का सब्जबाग दिखा रही हैं.

आज बस इतना ही. अगली बार बात होगी तमिलनाडु के चुनावी अखाड़े में खड़े नए महारथियों की. बात होगी क्या स्टालिन अपना किला बचा पाएंगे. AIADMK को आगे कर BJP तमिलनाडु की सत्ता में आ पाएगी? क्या सुपर स्टार थलापति विजय की सीटी लोगों को सम्मोहित करेगी?

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