12वीं के बाद इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट या लॉ में दाखिला के लिए कोचिंग की मदद क्यों लेनी पड़ती है? स्कूली पढ़ाई के आधार पर ही नामी संस्थानों में दाखिला के लिए होने वाली परीक्षा क्यों नहीं क्रैक हो पाती ? स्कूल के सिलेबस में दिक्कत है या बच्चों की पढ़ाई के तौर-तरीके में ? प्रोफेशनल कोर्सेज में डिग्री के बाद भी पढ़ाई के हिसाब से नौकरी और तनख्वाह क्यों नहीं मिल पाती ? इंजीनियरिंग की डिग्री के बाद भी भविष्य को लेकर असमंजस क्यों बना रहता है ? आखिर हमारे देश के ज्यादातर ग्रेजुएट्स की डिग्रियां रद्दी के कागज जैसी क्यों महसूस की जाती हैं ? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे– अपनी खास खबर में शिक्षा का ‘रोजगार’ शास्त्र.

शिक्षा का ‘रोजगार’ शास्त्र

कभी सोचा है कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी के तीन चेहरों – अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका की बातों को लोग मीडिया और सोशल मीडिया पर क्यों सुन रहे हैं? आखिर, जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन को इतना समर्थन क्यों मिला? आखिर, देश के ज्यादातर शहरों में छात्र अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन के लिए सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं? क्योंकि, पढ़ाई हर घर से जुड़ा मसला है? पढ़ाई के दम पर ही कोई भी परिवार अपना भविष्य सुधारना और संवारना चाहता है. लेकिन, पढ़ाई के साथ जाने-अनजाने ऐसा खिलवाड़ हुआ, जिसमें देश की बड़ी युवा आबादी के हाथों में डिग्री तो आ गयी,लेकिन, रोजगार नहीं. अगर नौकरी मिली भी–तो पढ़ाई के हिसाब से नहीं.

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ये मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के बीच से निकला असंतोष है. अनिश्चिता है,जिसमें पटना की सड़कों पर प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच एक 6 साल का बच्चा भी पहुंच जाता है,जो अभी पहली क्लास में पढ़ता है. उसे भी पेपर लीक और अपने भविष्य को लेकर चिंता है. ऐसे में समझा जा सकता है कि ग्रेजुएट बेरोजगारों की स्थिति क्या होगी?

शिक्षा व्यवस्था पर उठता अविश्वास: सड़कों पर आक्रोश

इसी हफ्ते पटना में BPSC TRE-4 के बवाल के बीच 6 साल का आदित्य प्रदर्शन में पहुंचा और इंटरनेट पर वायरल हो गया.पहली क्लास के छात्र आदित्य का साफ-साफ कहना है कि वो टीवी पर न्यूज़ देखकर आंदोलन में पहुंचा था. किसी के कहने से आंदोलन में नहीं गया था. जरा सोचिए, मौजूदा शिक्षा व्यवस्था ने कॉलेज पासआउट और बेरोजगार तो दूर 6 साल के आदित्य जैसे मासूम के मन में भी अविश्वास पैदा तक दिया है. दिल्ली का जंतर-मंतर हो या पटना का गर्दनीबाग,झारखंड का रांची हो या राजस्थान का जयपुर,छात्रों का आक्रोश पूरी दुनिया ने देखा.
GEN Z के प्रचंड प्रदर्शन को देखते हुए NEET-UG पेपर लीक मामले में धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा. शहर-शहर छात्र स्कूल ठीक कराने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं. अब कॉकरोच जनता पार्टी पूरे देश में स्कूल ठीक कराने के मिशन के आगे बढ़ा रही है.

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सरकारी स्कूलों की जर्जर नींव और नीति आयोग के आंकड़े

देश में सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है. एक लाख से अधिक स्कूल एक टीचर के भरोसे चल रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले 5 वर्षों में 17 हजार सरकारी स्कूल कम हुए हैं. देश के जाने-माने अर्थशास्त्री और नीति आयोग के सदस्य अरविंद विरामनी ने न्यूज़24 के भारत निर्माण समिट में बताया कि हमारी शिक्षा व्यवस्था से किस तरह से छात्र निकल रहे हैं?

जब बुनियाद कमजोर हो - तो ऊंची तालीम किस तरह की होगी,अंदाजा लगाया जा सकता है. नीति आयोग की हाल में जारी एक रिपोर्ट साफ-साफ कहती है कि देश में सिर्फ 8.25% ग्रेजुएट्स ऐसे हैं - जिन्हें उनकी पढ़ाई के हिसाब से नौकरी मिली है, 91.75% युवा अच्छी नौकरी के लिए किसी न किसी तरह परेशान हैं. इनमें 15 से 29 साल उम्र समूह में 13% ग्रेजुएट बिल्कुल खाली हाथ हैं,50% से अधिक काम में लगे हैं, लेकिन डिग्री की तुलना में निचले स्तर का काम कर रहे हैं. देश के 34% छात्रों के पास स्किल्स यानी हुनर की भारी कमी है. Skills की कमी की वजह से हमारे डिग्रीधारी ज्यादातर युवा आज के दौर में कंपनियों के लिए खास उपयोगी साबित नहीं हो पा रहे हैं - लिहाजा नौकरी की रेस में पिछड़ जाते हैं.

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कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके का साफ-साफ कहना है कि किसी भी सरकार के लिए शिक्षा मंत्रालय कम अहमियत वाला महकमा माना जाता रहा है. शिक्षा जैसे गंभीर विषय को किसी भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया और शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर हमेशा किसी भी बैठाने की रस्म अदायगी होती रही. बजट में भी शिक्षा पर खर्च में कंजूसी दिखाई गयी. ऐसे में देश की शिक्षा व्यवस्था की हालत बिगड़ती रही.

स्किल इंडिया मिशन और वास्तविक रोजगार का अंतर

साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने – तो शिक्षा व्यवस्था में खामियों की वजह से डिग्रीधारी बेरोजगारों को Skilled और Reskilled करने के लिए Skill Development Ministry बना दी गयी. मकसद था - डिग्री होल्डर युवाओं को जॉब मार्केट के हिसाब से Skilled करना, पिछले 12 साल से ये मिनिस्ट्री काम कर रही है. कहा जाता है कि पिछले 12 वर्षों में इस मंत्रालय ने 6 करोड़ लोगों को अलग-अलग योजनाओं के तहत Skilled किया, सिर्फ प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत ही एक करोड़ 64 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी गयी. अब सवाल उठता है कि सरकार के Skill India Mission के तहत ट्रेंड युवाओं में से कितनों को नौकरी मिली ? ये समझना भी जरूरी है कि पिछले 12 वर्षों से ये मंत्रालय क्या कर रहा है और युवाओं को किस तरह की ट्रेनिंग दे रहा है?

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साल 2014 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद नरेंद्र मोदी ने महसूस किया कि तेजी से बदलती तकनीक और जॉब मार्केट के हिसाब से हमारे युवा Skilled नहीं हैं. उनकी पिछली पढ़ाई नौकरी दिलाने या नौकरी में बने रहने के लिए काफी नहीं है, ऐसे में कॉलेज पासआउट युवाओं को Skilled बनाने के लिए साल 2014 में खासतौर से एक मंत्रालय बनाया गया – जिसे नाम दिया गया Ministry of Skill Development and Entrepreneurship, इसके बाद सरकार ने Skill India Mission के तहत अलग-अलग योजनाओं के जरिए युवाओं की ट्रनिंग का काम शुरू हो गया. जिसमें प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, जन शिक्षण संस्थान, राष्ट्रीय शिक्षुता संवर्धन योजना, शिल्पकार प्रशिक्षण योजना के जरिए युवाओं को Skilled करने का काम शुरू हुआ.

Skill India Mission के तहत आईटी डिजिटल स्किल, इलेक्ट्रॉनिक्स, हेल्थकेयर, ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन, रिटेल, टेलीकॉम, लॉजिस्टिक्स, ब्यूटी एवं वेलनेस, पर्यटन-हॉस्पिटैलिटी, कृषि, बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे क्षेत्रों के कोर्स शामिल किए गये. मकसद था - युवाओं को ऐसी Skills सिखाना,जिससे उन्हें नौकरी मिल सके. Skill India Mission के तहत कितने लोगों को ट्रेनिंग दी गई और उसमें से कितनों को नौकरी मिली - इसे लेकर अलग-अलग आंकड़े और दावे हैं.

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प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत साल 2015-16 से 2021-22 के बीच 56.89 लाख लोगों को शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग दी गयी..जिसमें से 24.3 लाख उम्मीदवारों को नौकरी मिली यानि प्लेसमेंट रेट 42.8 रहा.

अब सवाल उठता है कि Skill India Mission के तहत ट्रेनिंग हासिल करने वाले बाकी उम्मीदवारों का क्या हुआ? दरअसल, कई ट्रेनिंग प्रोग्राम में Placement Tracking अनिवार्य नहीं थी..ऐसे में Skill India Mission के नतीजों को अलग-अलग एंगल से देखा जाता है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से सरकार का जोर खासतौर से Skilling और Re-Skilling पर रहा है.

आज की तारीख में Skill India Mission की असली चुनौती ये नहीं है कि कितने लोगों को ट्रेनिंग दी जाती है या Skilled बनाया जाता है - असली चुनौती ये है कि कितनों को टिकाऊ और अच्छी सैलरी वाली नौकरी मिलती है ?

साल 2026-27 में Ministry of Skill Development का बजट 9,885 करोड़ का है,इस मंत्रालय की एक और खास बात है- अब तक कोई भी मंत्री इसमें पांच साल नहीं टिक पाया है. फिलहाल, इस मंत्रालय की कमान जयंत चौधरी के हाथों में है,Skill India Mission के तहत ट्रेनिंग पाने-वाले कितने युवाओं को नौकरी मिली. इसे लेकर भी कई साफ आंकड़ा नहीं है. लेकिन, एकबात तय है कि अगर ये मंत्रालय अपने मकसद में पूरी तरह सफल रहा होता –तो शायद जेन जी आज सड़कों पर नहीं होता, कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म नहीं हुआ होता,अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास में हर बेरोजगार युवा अपना चेहरा नहीं देख रहा होता. नीति आयोग की Reimagining Skilling for Viksit Bharat @ 2047 रिपोर्ट यूनिवर्सिटी डिग्री पर सवाल खड़ी नहीं कर रही होती. रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया कि भारत में सिर्फ 8.25% ग्रेजुएट्स ही अपनी योग्यता या कहें डिग्री के हिसाब से नौकरी कर रहे हैं यानि 90 फीसदी से अधिक को डिग्री का खास फायदा नहीं मिला.

डिग्री के डिजाइन में खामी: पारंपरिक बनाम आधुनिक बाजार

नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि हमारे देश में अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम में करीब 3.4 करोड़ छात्र हैं – जिसमें से सिर्फ BA में 1 करोड़ 13 लाख छात्र हैं. बीए, बीएससी और बीकॉम को जोड़ दिया जाए – तो ग्रेजुएशन प्रोग्राम में छात्रों की संख्या 2 करोड़ के निशान को पार कर जाएगी.अब सवाल उठता है कि हमारे कॉलेज और यूनिवर्सिटी की डिग्री में खामी है या डिग्री के डिजाइन में? पिछले 100 साल में जितनी दुनिया नहीं बदली - उससे ज्यादा पिछले 10 वर्षों में बदली..जितनी पिछले 10 वर्षों में नहीं बदली उससे ज्यादा साल भर में बदल रही है. लेकिन, देश के ज्यादातर कॉलेजों के क्लासरूम में पढ़ाई का तौर-तरीका उस रफ्तार से नहीं बदला..आज भी पुराने ढर्रे पर कई कोर्स चल रहे हैं.

ऐसे में पढ़ाई और परीक्षा के बाद डिग्री तो मिल जाती है- लेकिन, कोई खास Skill नहीं. ऐसे में पारंपरिक ग्रेजुएशन डिग्री कोर्स में बदलाव की जरूरत है. साथ ही, हर कोर्स को Industry की जरूरतों के हिसाब से डिजाइन करने की जरूरत है. मतलब, हमारे एजुकेशन सिस्टम को Degree + Skill + Internship + Industry Exposure मॉडल में बदलने की जरूरत है.

हमारी शिक्षा-व्यवस्था में इस बात की ट्रेनिंग पर जोर कम रहा है कि सवाल कैसे करना है और सोचना कैसे है? लेकिन, एआई के दौर में इन दोनों Skill के बिना आगे बढ़ना मुश्किल है. ऐसे में एआई के दौर में किस तरह स्मार्ट तरीके से काम करना है - इसकी भी प्रैक्टिकल ट्रेनिंग स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई के दौरान जरूरी है. आज की तारीख में एक अरब 45 करोड़ आबादी वाले भारत की लेबरफोर्स में 65.4 करोड़ लोग शामिल हैं. इसमें सबसे ज्यादा लोग खेती में शामिल हैं - 29.2 करोड़. गैर-कृषि कामों में 34.2 करोड़ लोग जुड़े हैं - जिसमें मैन्यूफैक्चरिंग में 7.2 करोड़, कंस्ट्रक्शन में 7.6 करोड़ और सर्विसेज में 18.9 करोड़.

ये कहना गलत होगा कि सामान्य ग्रेजुएशन डिग्री की कोई वैन्यू नहीं है. क्योंकि, डिग्री नौकरी हासिल करने की बुनियादी जरूरतों में से एक है. लेकिन, डिग्री की वैल्यू और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए उसमें तकनीक और उद्योग में होते बदलावों के हिसाब से फेरबदल भी जरूरी है.

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के सर्वे के हवाले से लिखा है कि बिना स्किलिंग के सामान्य ग्रेजुएट डिग्री होल्डर की शुरुआती सैलरी 22 हजार रुपये महीना होती है. वहीं, सामान्य डिग्री के साथ खास स्किलिंग वाले युवाओं की शुरुआती सैलरी करीब 29 हजार होती है. मतलब, शुरुआत में ही 7 हजार का अंतर. मतलब, एक सामान्य ग्रेजुएट की तुलना में किसी खास कोर्स के साथ Skilled ग्रेजुएट की वैल्यू और सैलरी दोनों बढ़ जाती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कई ऐसे खिड़की-दरवाजे खोलने की कोशिश हुई है-जिसमें छात्र पढ़ाई के दौरान अलग-अलग कोर्स का चुनाव कर सकता है. ऐसे में हर डिग्री को रोजगार लायक बनाने की दिशा में धीरे-धीरे पहल होने लगी है.

आज की तारीख में पारंपरिक BA, BCom और BSc को skill-integrated करना जरूरी है, जिसमें Core Subject के साथ multidisciplinary skill development जोड़ा जा सके..तभी पारंपरिक कोर्स भी बचे रहेंगे और डिग्री होल्डर छात्रों को जॉब मार्केट में अच्छी नौकरी और तनख्वाह मिलेगी.

इंजीनियरिंग और प्रोफेशनल कोर्सेज से छात्रों का मोहभंग

हमारे एजुकेशन सिस्टम ने पिछले कुछ दशकों में ज्यादातर सर्टिफाइड या डिग्रीधारी युवा तैयार किए हैं, जिनसे पास सिर्फ डिग्री है – कोई खास स्किल नहीं, जिसके आधार पर जॉब मार्केट में नौकरी मिल सके. अगर इंजीनियरिंग की बात करें तो हमारे देश में हर साल करीब 15 लाख इंजीनियरिंग ग्रेजुएट तैयार होते हैं – जिसमें 10 से 20 फीसदी फ्रेशर्स को ही डिग्री के हिसाब से मनचाही नौकरी मिल पाती है. अब सवाल उठता है – ऐसा क्यों ? इसकी एक बड़ी वजह है – तकनीक में तेजी से आते बदलावों के हिसाब से कोर्स का नहीं बदलना. मसलन, इंजीनियरिंग की कम्यूटर साइंस कोर कोर्स में जिस तरह कोडिंग सिखाई जाती है – उस तरह की सामान्य कोडिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से कुछ देर में की जा सकती है. ऐसे में भला कोडिंग करनेवाले सामान्य इंजीनियर को कोई नौकरी पर क्यों रखेगा?

दूसरी ब्रांच के साथ भी कमोवेश ऐसी ही स्थिति है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारे इंजीनियरिंग कोर्स तेजी से बदलावों के हिसाब से अपडेट या अपग्रेड हो रहे हैं ? क्या छात्रों को पढ़ाई के दौरान तकनीक में आते बदलावों के हिसाब से Reskill करने की ट्रेनिंग दी जा रही है ? क्या उन्हें ये सिखाया जा रहा है कि आपको नई समस्याओं के साथ नए इनोवेशन की आदत अभी से डालनी होगी ? संभवत:, बहुत कम. ऐसे में हायर एजुकेशन को रोजगार लायक बनाने के लिए पहली शर्त है – डायनमिक बनाए रखना.

स्कूली पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की खाई

एक ओर ओर देश के नामी प्रोफेशनल कोर्सेज में एडमिशन के लिए मारामारी रहती है. दूसरी ओर, All India Council for Technical Education के आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में साढ़े आठ लाख से अधिक सीटें खाली रह गयीं. इसमें होटल मैनेजमेंट से लेकर इंजीनयरिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्स शामिल हैं. इंजीनियरिंग में भी चार लाख से अधिक सीटें खाली रह गयी,

तमिलनाडु में इंजीनियरिंग में दाखिला के लिए तीसरे राउंड की काउंसिलिंग तक 24 कॉलेजों में एक भी छात्र ने एडमिशन नहीं लिया, जबकी 64 कॉलेजों में 10 से कम छात्रों ने एडमिशन लिया. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि प्रोफेशनल कोर्सेज से भी छात्रों का मोहभंग क्यों हो रहा है ? दरअसल, हमारे देश में हर साल 15 लाख इंजीनियरिंग ग्रेजुएट पासआउट होते हैं, जिसमें से मुश्किल से 10 से 20 फीसदी को ही उनकी कोर पढ़ाई के आधार पर नौकरी मिल पाती है.

भारत के नक्शे में दिख रहे ज्यादातर इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाई का स्तर संभवत: वैसा नहीं है- जो बीटेक डिग्री धारकों को उनकी Skill के हिसाब से नौकरी दिला सके..कमोवेश यही स्थिति मैनेजमेंट की पढ़ाई की भी है. प्रोफेशनल कोर्स कराने वाले संस्थानों के सामने पहली चुनौती-पुराने सिलेबस से बेकार की चीजों को हटाने की है. दूसरी चुनौती-छात्रों के नया प्रयोग करने और सोचने के लिए तैयार करने की है. तीसरी चुनौती - दुनिया में तकनीकी बदलावों के हिसाब से नई चीजें जोड़ने की है.

इंजीनियरिंग कॉलेजों को थ्यौरी से अधिक प्रैक्टिकल अनुभव पर अधिक फोकस करना होगा..भविष्य के इंजीनियरों को इस तरह तैयार करना होगा - जिससे रूटीन काम तकनीक की मदद से करें और खुद मुश्किल समस्याओं के समाधान और इनोवेशन पर फोकस करें. भविष्य में ऐसे इंजीनियरों की ज्यादा डिमांड बढ़ने के चांस हैं - जो AI System बनाने, Maintain करने और Secure करने में माहिर होंगे,जो Industry Demand + AI Compatibility+ Human Skills का कॉम्बो होंगे..जो इंडस्ट्री की रियल टाइम समस्याओं को सुलझाने वाली भूमिका में रहेंगे,ऐसे में प्रोफेशनल कोर्सेज कराने वाले संस्थान अगर खुद को नहीं बदलेंगे-तो ताला लगने की नौबत आनी तय है?

शिक्षा व्यवस्था में जरूरी 5 सुधार

ये भी हैरानी की बात है कि तकनीक ने पूरी दुनिया का शक्ति संतुलन, मैदान–ए-जंग में लड़ाई के तौर-तरीकों को बदल दिया है. लेकिन, हमारी शिक्षा व्यवस्था उस रफ्तार से नहीं बदल रही है. शिक्षा नीति में बदलाव 34 साल बाद हुआ. अगर शिक्षा नीति और सिलेबस इसी रफ्तार से बदलेंगे – तो हमारे शिक्षा संस्थानों से पासआउट छात्रों का भविष्य कैसा होगा? वो दौर गया – जब शिक्षा नीति 10 या 15 साल की सोच के साथ तैयार की जाती थी. लेकिन, अब शिक्षा नीति में हर तीन-चार साल में बदलाव समय की मांग है. थ्योरी से अधिक प्रैक्टिकल पर जोर होना चाहिए,कॉलेज में प्रैक्टिकल से अधिक इंडस्ट्री में इंटर्नशीप पर ज्यादा जोर होना चाहिए,जिससे छात्र रियलटाइम समस्याओं को सुलझाने में अपने दिमाग का इस्तेमाल कर सकें. हमारी स्कूली शिक्षा और हायर एजुकेशन में दाखिला के लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षा के बीच भी बहुत अंतर है.

स्कूल में जो पढ़ाई होती है– उसके दम पर NEET या JEE को क्रैक करना आसान नहीं है. ऐसे में बच्चों को महंगी कोचिंग की मदद लेनी पड़ती है. खुद प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को लाल किला की प्राचीर से गरीब और मध्यमवर्गीय बच्चों के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग का ऐलान किया. अब बड़ा सवाल ये है कि स्कूली पढ़ाई के बाद कंपीटिशन क्रैक करने के लिए आखिर कोचिंग की जरूरत क्यों पड़ रही है ? क्या स्कूली पढ़ाई और हायर एजुकेशन के लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच की खाई को पाटा नहीं जा सकता है ?

प्रधानमंत्री मोदी लाल किला की प्राचीर से ऐलान कर चुके हैं कि युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की व्यवस्था की जाएगी. मतलब, पीएम मोदी भी मानते हैं कि इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए JEE और मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली NEET परीक्षा में अच्छी रैंकिंग के लिए कोचिंग की जरूरत है. इसकी एक बड़ी वजह है स्कूल की पढ़ाई और Competitive Examination के Nature में फासला.

हाल में आई एक सरकारी पैनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूली सिलेबस और JEE-NEET परीक्षाओं के लेवल में बहुत अंतर है. शायद इसीलिए छात्रों को JEE-NEET में अच्छी रैंक हासिल करने के लिए कोचिंग लेनी पड़ती है.

सरकारी पैनल ने स्कूली पढ़ाई बोर्ड के सिलेबस और JEE-NEET जैसे एंट्रेंस एग्जाम के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की सिफारिश की है. साथ ही, पैनल ने स्कूल के बोर्ड एग्जाम और एंट्रेंस टेस्ट के बीच कम से कम छह महीने का अंतर रखने की सलाह भी दी है.

पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा को लेकर सरकारों का जो तौर-तरीका रहा है – उसमें सरकारी शिक्षण संस्थानों की जगह प्राइवेट शिक्षण संस्थानों के फलने-फूलने का मौका मिला है. स्कूल से प्रोफेशनल कोर्सेज तक पढ़ाई तेजी से महंगी होती जा रही है या कहें मिडिल क्लास की पहुंच से दूर होती जा रही है. इतिहास गवाह है कि आज की तारीख में किसी भी देश की असली पूंजी तकनीक और वहां की Highly Skilled Workforce है, जिसमें भारत बहुत पीछे है. साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने डिग्रीधारी बेरोजगारों को Skilled बनाने के लिए Skill development and entrepreneurship Ministry बनाई,लेकिन, ये मंत्रालय भी कुछ खास नहीं कर पाया. अगर ये मंत्रालय अपने मकसद में पूरी तरह सफल रहा होता – तो शायद जेन जी आज सड़कों पर नहीं होता. अगर सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बेहतर होता – तो लोअर मिडिल क्लास परिवार अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा प्राइवेट स्कूलों की फीस और कोचिंग में नहीं खर्च कर रहा होता.

ये भी हैरानी की बात है कि एक ओर युवा शक्ति के दम पर 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने की बात हो रही है,लेकिन, देश के कुल बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी करीब ढ़ाई फीसदी के आसपास है. ऐसे में शिक्षा पर केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों को खर्च बढ़ाना होगा – शिक्षा मंत्रालय को कम अहमियत वाला नहीं बल्कि देश का वर्तमान और भविष्य तैयार करने वाले मंत्रालय के तौर पर देखना होगा ? ऐसे में विकसित भारत बनाने और उसमें युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है. पहला, स्कूल की पढ़ाई और हायर एजुकेशन के लिए होनेवाली प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच के गैप को खत्म करना जरूरी है.

दूसरा, पुराने BA, B.Sc, B.Com जैसे कोर्स में रोजगार लायक Skill जोड़ना बहुत जरूरी है. तीसरा, तीन या चार साल की डिग्री में कम से कम एक साल की Internship अनिवार्य होना चाहिए. चौथा, तकनीक और उद्योग की जरूरत से हिसाब से सिलेबस में हर साल बदलाव होना चाहिए. पांचवां, English, Computer और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को Additional Skill की जगह बेसिक स्किल के तौर पर देखना होगा,ऐसे में समस्या डिग्री से अधिक डिग्री के डिजाइन में है,अगर डिग्री को प्रासंगिक बनाए रखना है तो डिग्री की परिभाषा में बदलाव करना पड़ेगा. आज बस इतना ही,फिर मिलेंगे किसी ऐसे मुद्दे के साथ, जिसे जानना और समझना आपके लिए बहुत जरूरी होगा.