ऐसा लग रहा है कि पूरी दुनिया बारूद को ढेर पर बैठी है . दुनिया के ज्यादातर देशों के हुक्मरान एक खास तरह की सनक के शिकार हैं . पिछले दो हफ्तों से मिडिल ईस्ट युद्ध की आग में जल रहा है . इस बीच उत्तर कोरिया ने जापान की ओर 10 बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं – जापान में इमरजेंसी अलर्ट किया गया है . उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइलें ऐसे समय में दागी हैं – जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया की सेनाएं मिलिट्री एक्सरसाइज कर रही हैं. दूसरी ओर, ईरान ने तेल अवीव पर क्लस्टर बम, ड्रोन और मिसाइलों से प्रचंड हमला किया है, तो अमेरिका ने ईरान के खार्ग द्वीप पर सैन्य ठिकाने को तबाह करने का दावा किया है . खार्ग द्वीप को ईरान की लाइफलाइन कहा जाता है . मिडिल-ईस्ट में जारी युद्ध की लपटें कम होने की जगह लगातार ऊंची हो रही हैं . ऐसे में सवाल उठता है कि दुनियाभर के देशों को इस युद्ध की कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी? दो हफ्तों के युद्ध में ही भारत के शहर-शहर LPG यानी रसोई गैस की किल्लत महसूस की जाने लगी है . गैस की कमी की वजह से रेस्टोरेंट बंद होने लगे हैं . गैस की कीमतों का हवाला देते हुए दुकानदारों ने चाय-समोसा की कीमतें बढ़ा दी. दुनिया की सुरक्षित जगहों में से एक दुबई के लोग मिसाइलों के खौफ में हैं और कम कीमत पर अपना घर बेचने के लिए ग्राहक खोज रहे हैं . खाड़ी देशों में रहने वाले ज्यादातर लोग खौफ के साए में जी रहे हैं . लेकिन, ये स्थिति कैसे और क्यों आयी ? आखिर अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ युद्ध क्यों छेड़ा ? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी कीमत पर अपने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन एजेंडा को आगे बढ़ाना चाहते हैं . इसके लिए वो World energy order पर अमेरिका का पूरी तरह वर्चस्व चाहते हैं . उनके इस मिशन में ईरान एक बड़े स्पीड ब्रेकर की तरह था . मिडिल ईस्ट को युद्ध की आग में झोंक कर अमेरिका ने एक तरह से दुनिया में Oil Production, Oil Supply Chain, Oil Market तीनों को प्रभावित करने की कोशिश की है . इतिहास गवाह रहा है कि तेल ने पूरी दुनिया में बदलाव की स्क्रिप्ट तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई है . ऐसे में आज मैं आपको बताने की कोशिश करूंगी कि तेल ने किस तरह समय-समय पर युद्ध की आग को भड़काया ? तेल की बुनियाद पर किस तरह कूटनीति रिश्ते बने और टूटे? किस तरह इतिहास और भूगोल बदलने की कोशिश हुई. तेल के खेल में दुनिया की महाशक्तियों ने किस तरह खुद को ताकतवर बनाया और दूसरों को उलझाया ?

1960 के दशक में जब कनाडा के दार्शनिक Marshall McLuhan ने पहली बात Global Village का विचार दुनिया के सामने रखा. शुरुआती दौर में इसका मतलब लोगों को समझ में नहीं आया . Globalization और Internet के विस्तार के साथ धीरे-धीरे लोगों को Global Village का मतलब समझ में आने लगा . लेकिन, अब दुनिया के किसी भी हिस्से में कुछ होता है – उसका Direct or Indirect असर ज्यादातर हिस्से में पड़ता है . रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-हमास के बीच जंग…पाकिस्तान-अफगानिस्तान में टेंशन हो या अमेरिका और ईरान के बीच जंग . दुनिया के किसी भी हिस्से में युद्ध हो… निर्णायक जीत किसी की नहीं होती है – युद्ध की सबसे ज्यादा कीमत आम आदमी चुकाता है . फरवरी का कैलेंडर पलटने से पहले अमेरिका-इजरायल ने ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया है . दनादन मिसाइलों की मार और पलटवार के बीच पूरा मिडिल ईस्ट टेंशन में है . भारत टेंशन में है . चीन टेंशन में है . एशिया के छोटे-बड़े कई देश इस बात को लेकर टेंशन में हैं कि अगर Oil Supply कम हुई या रुकी तो क्या होगा ? ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने ऐलान किया है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद रहेगा . हालांकि, तेहरान ने होर्मुज स्ट्रेट से भारत के लिए दो LPG टैंकरों के गुजरने की इजाजत दी है . दुनिया का 20 फीसदी तेल इसी रास्ते से गुजरता है…ऐसे में सबसे पहले ये समझते हैं कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने किस तरह से दुनिया की एनर्जी सप्लाई चेन को बुरी तरह से प्रभावित किया है? अगर ये संकट और लंबा चला तो क्या होगा?

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सोशल मीडिया पर वायरल ये तस्वीर UAE के फुजेराह पोर्ट की बताई जा रही है . ईरान की ओर से ड्रोन अटैक के बाद फुजेराह पोर्ट से धुआं उठते देखा गया. फुजैराह बंदरगाह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाहर ओमान की खाड़ी के किनारे और होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर स्थित है . यह ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद रणनीतिक प्वाइंट माना जाता है. जहां तेल स्टोरेज से लेकर लोडिंग और सामान्य कार्गों जैसी सुविधाएं हैं . ऐसे में फुजेरा पोर्ट तक युद्ध की आग पहुंचने का मतलब है- एनर्जी सप्लाई चेन पर असर . अब जरा इस नक्शे को देखिए . स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते दुनिया का 20 फीसदी कच्चा तेल गुजरता है… इस रूट को दुनिया का सबसे अहम ऑयल चेक प्वाइंट माना जाता है . एक स्टडी के मुताबिक, एशियाई बाजारों में होर्मुज स्ट्रेट से 89% कच्चा तेल पहुंचता है. इसलिए, होर्मुज के बंद होने का सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ता है … हालांकि, भारत के लिए कच्चा तेल लेकर निकले टैंकर होर्मुज के रास्ते आगे बढ़ रहे हैं .

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भारत के कुल तेल आयात में से सिर्फ 30 फीसदी हिस्सा ही होर्मुज के रास्ते गुजरता है . ऐसे में माना जा रहा था कि भारत की एनर्जी सप्लाई सुरक्षित बनी हुई है . लेकिन, फुजेराह पोर्ट पर ईरान के ड्रोन हमले ने चिंता बढ़ा दी है . 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की शुरुआत के साथ पूरे मिडिल-ईस्ट में युद्ध की आग भड़कने लगी … दोनों ओर से मिसाइल और ड्रोन से प्रचंड प्रहार जारी है . मिडिल ईस्ट में तेल रिफ़ाइनरी और तेल भंडार टैंक को निशाना बनाया जा रहा है . अमेरिका ने ईरान की लाइफलाइन माने-जाने वाले खार्ग द्वीप पर सैन्य ठिकानों को तबाह करने का दावा किया . अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर लिखा, 'मेरे आदेश पर अमेरिकी सेंट्रल कमान ने मध्य पूर्व के इतिहास के सबसे शक्तिशाली हवाई हमलों में से एक को अंज़ाम दिया और खार्ग द्वीप पर मौजूद सभी सैन्य ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर दिया है. खार्ग द्वीप को ईरान की सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में से एक माना जाता है.'

खार्ग द्वीप ईरान के तेल निर्यात का बहुत महत्वपूर्ण टर्मिनल है. ईरान लगातार मिसाइल और ड्रोन से पलटवार कर रहा है. जिसमें मिडिल ईस्ट में अमेरिका और उसके दोस्तों के मिलिट्री बेस निशाने पर हैं . ऐसे में खासतौर से अरब वर्ल्ड के उन देशों की सांसें फूली हुई हैं - जो युद्ध नहीं चाहते . लेकिन, युद्ध की आग उनतक पहुंच रही है . इजरायल के तेल अवीव पर क्लस्टर बम, ड्रोन और मिसाइलों से हमले जारी हैं . ईरान की रणनीति कुछ इस तरह है - जिससे अमेरिकी और इजरायली एयर डिफेंस सिस्टम को चमका देते हुए हमले को अंजाम दिया जा सके . अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग कब खत्म होगी? कैसे खत्म होगी … इसका किसी के पास ठीक जवाब नहीं है . अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध लंबा चला तो इसकी कीमत एशियाई देशों को सबसे ज्यादा चुकानी होगी? क्योंकि, ऑयल और गैस की जरूरतें पूरी करने में मिडिल-ईस्ट के देश और रूट अहम भूमिका निभाते हैं . इस क्षेत्र के डिस्टर्ब रहने का मतलब है… यूरोप और अमेरिका आने-जाने का हवाई रूट लंबा होना. मिडिल ईस्ट में युद्ध लंबा खींचन का मतलब है - वहां रहने वाले 89 लाख लोगों के जान-माल, रोजी-रोटी पर संकट और उनकी सुरक्षित स्वदेश वापसी कराना .

ये अमेरिका-ईरान युद्ध का साइड इफेक्ट है कि भारत में रसोई गैस के लिए लंबी लाइन देखने को मिल रही है. एकाएक इंडक्शन चूल्हा की डिमांड बढ़ गयी . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट से कोई देश अछूता नहीं है और सरकार देश की ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही है . भारत अपनी कुल कच्चे तेल जरूरतों का 80 फीसदी से अधिक आयात करता है . हो सकता है कि आने वाले दिनों में दिल्ली और तेहरान के बीच कोई ऐसी डील हो जाए. जिसमें भारत के लिए निकले टैंकर्स को होर्मुज स्ट्रेट में निशाना न बनाया जाए . लेकिन, अगर ये रूट जाम हो जाए तो भारत क्या करेगा? भारत के कच्चे तेल आयात का 70% हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के बाहर से गुजरते हुए आता है. वहीं, भारत अपनी LPG खपत का 60 फीसदी आयात करता है – जिसका करीब 90 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर पहुंचता है . ऐसे में घरेलू गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है . अब ये समझना जरूरी है कि आखिर अमेरिका इस क्षेत्र में चाहता क्या है? दरअसल, अमेरिका किसी कीमत पर दुनिया में अपना वर्चस्व कम होने नहीं देना चाहता है . लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में कूटनीति जिस तरह आगे बढ़ी – उसमें अमेरिका को अपने लिए खतरा महसूस हो रहा है . इसकी तीन वजह हो सकती है - पहली, OPEC यानी Organization of the Petroleum Exporting Countries का मजबूत होना . अमेरिका तेल का सबसे बड़ा उत्पादक तो है . लेकिन, तेल की सप्लाई चेन और मार्केट पर OPEC का पलड़ा भारी है . दूसरी, भारत और चीन तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं . तेल उत्पादक देशों में चाइना लंबे समय से दखल बढ़ाने की कोशिश कर रहा है – जिससे पेट्रोल डॉलर कमजोर हुआ . ऐसे में मध्य-पूर्व में चीन के विस्तार को रोकने के लिए ईरान को ध्वस्त करना राष्ट्रपति ट्रंप शायद जरूरी समझ रहे थे . तीसरा, ग्रीन एनर्जी की ओर दुनिया का बढ़ना . दरअसल, भविष्य की ग्रीन एनर्जी यानी सोलर और विंड पूरी दुनिया को मिलती है . ग्रीन एनर्जी की सप्लाई चेन में अमेरिका का कोई खास दखल नहीं है . इसमें चाइना बहुत आगे है . ऐसे में अमेरिका ने ईरान पर हमला कर एक ऐसा दांव चला –जिसकी चपेट में पूरा मिडिल ईस्ट आ गया. Oil Production, Oil Supply और Oil Market तीनों प्रभावित हुआ .

दुनिया की तरक्की में तेल ने अहम भूमिका निभाई है. खाड़ी देशों में एक ऐसी साझी व्यवस्था बनी…जिसमें खाड़ी देशों ने सबको तेल बेचा. इसका सबको फायदा हुआ..कभी ब्रिटेन की नौसेना ने समुद्री रास्तों की रक्षा की..फिर इस क्षेत्र में अमेरिका की एंट्री हुई . अमेरिका ने खाड़ी देशों में अपने सैन्य अड्डे बनाए…सुरक्षा का भरोसा दिया . ये सिस्टम करीब 5 दशकों तक चला..पिछले कुछ दशकों में ईरान जिस रास्ते बढ़ा-उसमें अमेरिका को अपना सिस्टम हिलता दिखा…अमेरिका की खाड़ी देशों में पकड़ धीरे -धीरे कमजोर पड़ रही थी . वहीं, ईरान लगातार अमेरिका को चुनौती दे रहा था .

अमेरिका-इजरायल ने ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की शुरुआत कर पूरे मिडिल-ईस्ट के सिस्टम को इधर-उधर कर दिया . ईरान की मिसाइल और ड्रोन अरब वर्ल्ड के उन देशों में भी गिर रही हैं - जिनके बीच रिश्तें सुधरने लगे थे . दुबई जैसी सुरक्षित जगह भी ईरान की मिसाइल और ड्रोन की रेंज में है. दुनिया का व्यस्तम समुद्री रूट होर्मुज डिस्टर्ब है . अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कह रहे हैं कि जरूरत पड़ने में अमेरिकी नौसेना तेल टैंकरों को एस्कार्ट करेगी . इसका एक मतलब ये निकाला जा सकता है कि दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रूट में अमेरिका अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहता है .

दुनिया में तेल उत्पादन में अमेरिका टॉप पर है . लेकिन, तेल की कीमत और बाजार तय करने में Organization of the Petroleum Exporting Countries बड़ी भूमिका निभा रहे हैं . सऊदी अरब के साथ अमेरिका की साझेदारी पुरानी है, लेकिन, तेल के खेल और बाजार को बनाने-बिगाड़ने में रूस बड़ी भूमिका निभा रहा है . ईरान भी इसमें बड़ा खिलाड़ी है . ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप एक ऐसा दांव चलते दिख रहे हैं - जिसमें वेनेजुएला में कठपुतली सरकार बनाने के बाद ईरान पर भी अपनी मर्जी चला सके . तेल के खेल के नियमों को अपने हिसाब से परिभाषित कर सकें .

संभवत: राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि मध्य-पूर्व आपस में बंट जाए और इसके साथ ही तेल का बाजार भी बंट जाए. इससे भविष्य में तेल की मांग बनी रहेगी और बढ़ती भी रहेगी . ट्रंप पारंपरिक ऊर्जा यानी तेल-गैस के प्रोडक्शन, सप्लाई सिस्टम और मार्केट तीनों को इस तरह चलाना चाहते हैं…जिससे USA को अधिक से अधिक फायदा हो . ट्रंप के ईरान प्लान की एक वजह चीन को कमजोर करना भी है और मिडिल ईस्ट में उसके प्रभाव को बढ़ाने में मददगार अहम सहयोगी को ध्वस्त करना भी .

युद्ध दुनिया के Energy Order में हनक बनाए रखने की है . जंग समुद्री रास्तों पर कब्जे की है . लड़ाई दुनिया के सबसे व्यस्त कारोबारी समुद्री रास्ते का दारोगा बनने की है . संभवत: , ये तेल और गैस की प्यास ही है . जिसमें भूगोल बदलने की कोशिश हो रही है . इतिहास गवाह रहा है कि दुनिया को बदलने में तेल ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. जिस देश ने तेल की अहमियत को जितनी जल्दी समझा, उसने उतनी ही तेजी से तरक्की की . वैसे तो तेल का इतिहास करीब 200 साल पुराना है…साल 1829 में रूस के बाकू में तेल मिला. वहां कारखाना लगा, लेकिन, रूसियों को इस बेशकीमती चीज की अहमियत समझ में नहीं आई . वहीं, अमेरिका ने तेल की अहमियत को बहुत अच्छी तरह समझा . भारत में साल 1857 में जब कंपनी राज से आजादी के लिए संग्राम चल रहा था, उस दौर में अमेरिका में तेल क्रांति आकार ले रही थी . वहां के पेंसिल्वेनिया में प्रांत में तेल के लिए ड्रिलिंग हुई.तेल कारोबार में कई दिग्गजों ने हाथ आजमाया - लेकिन, जॉन विलियम डी. रॉकफेलर ने इस धंधे में सबको पीछे छोड़ दिया . रूस को तेल की वैल्यू बाद में समझ आई… फ्रांस के एक कारोबारी थे - रोथशिल्ड . जो यहूदी थे… तब रूस के लोग यहूदियों को देखते ही नाक-मुंह सिकोड़ने लगते थे . लेकिन, तेल के लिए रूस ने रोथशिल्ड का दोनों हाथ खोलकर स्वागत किया, तो साल 1917 की रूस की क्रांति की बड़ी वजहों में से एक तेल भी था, क्योंकि, बाकू-बाटुम के तेल कुओं में काम करने वाले मजदूरों के शोषण के खिलाफ आवाज व्लादिमीर लेनिन ने बुलंद की .

जोसेफ स्टालिन का भी तेल युद्ध से गहरा नाता रहा. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद महाशक्तियों ने उन क्षेत्रों की ओर खासतौर से फोकस किया. जहां की जमीन के नीचे तेल का अकूत भंडार दबा पड़ा था . प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी हुक्मरानों की समझ में एकबात अच्छी तरह आ गई कि भविष्य में वहीं ताकतवर होगा - जिसका तेल पर कब्जा होगा . वो दशक 1930 का था . अमेरिका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर थे Franklin D. Roosevelt…साल 1933 में स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया नाम से एक कंपनी बनी…जिसने सऊदी अरब के साथ तेल रियायत को लेकर समझौते पर दस्तखत किए…जिससे तेल की खोज की छूट मिली . इसके बाद अमेबियन अमेरिकन ऑयल कंपनी यानी अरामको का जन्म हुआ.

प्रथम विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो खाड़ी देशों में मौजूद तेल के लिए ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका के बीच अनबन शुरू हो गई . तब सिर्फ ईरान में ही तेल का एक कुआं था. ब्रिटेन और फ्रांस ने तेल क्षेत्र का आपस में बंटवारा कर लिया था. अमेरिका को ये बात हजम नहीं हुई . बंटवारे में बगदाद और बसरा ब्रिटेन के हिस्से आया तो फ्रांस को मोसुल यानी सीरिया मिला. इसी को तोड़कर लेबनान बनाया गया…न ब्रिटेन के पास तेल था और ना ही फ्रांस के पास…ऐसे में तेल के लिए इन दोनों ही यूरोपीय ताकतों की नज़र खाड़ी देशों पर जमी हुई थी .

खाड़ी देशों में तेल की खोज शुरू हुई…साल 1923 में सऊदी अरब, बहरीन में तेल के भंडारों का पता चला..जिस पर ब्रिटिश पेट्रोलियम की नजर थीं . अमेरिका भी इस क्षेत्र को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था. ऐसे में अमेरिका अपने मुल्क की कंपनी के साथ मजबूती से खड़ा हो गया.सऊदी अरब में दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार मिला..अमेरिका से सऊदी अरब के रिश्तों का आधार भी तेल ही बना. साल 1933 में सऊदी अरब और कैलिफोर्नियां की स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी के बीच एक करार पर दस्तखत हुआ और शुरू हुई तेल की खोज . शुरुआती दौर में कई कोशिशें नाकाम रहीं . लेकिन, साल 1938 में दम्माम नंबर 7 से जब Commercial Oil का Production शुरू हुआ. इसके बाद कंपनी की किस्मत चमकने लगी . साल 1944 में कंपनी का नाम बदल कर अरामको कर दिया गया..जिसने सऊदी अरब को Global Energy Map पर एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया .

ओटोमन साम्राज्य के विघटन के बाद तुर्की ने जो राह दिखाई थी. उसमें अरब वर्ल्ड के कई देश भी पश्चिमी मुल्कों के करीब आने लगे और पश्चिमी संस्कृति की छाप भी मुस्लिम देशों के शहरी इलाकों धीरे-धीरे दिखने लगी थी . पश्चिमी देशों ने बड़ी चतुराई से अरब देशों के तेल भंडारों को सीक्रेट तरीके से बांटते हुए अपने-अपने मुल्कों की आर्थिक तरक्की का रास्ता बनाते रहे.
अरब देशों की मजबूरी ये थी कि उनके पास तेल के भंडार तो थे…लेकिन, तेल निकालने की तकनीक नहीं थी . तेल बेचने के लिए बाजार नहीं थे. जिसका फायदा अमेरिका समेत दूसरे पश्चिमी देशों ने जमकर उठाया .

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया का शक्ति समीकरण पूरी तरह बदल गया . यूरोपीय देश आर्थिक और सैन्य रूप से बहुत कमजोर पड़ चुके थे और अमेरिका सबसे ताकतवर बन चुका था…वहीं, दूसरी बड़ी ताकत था – USSR…पूरी दुनिया अमेरिका और रूस के बीच जारी Cold War में दो हिस्सों में तेजी से बंटती जा रही थी. अमेरिका की नज़र अरब वर्ल्ड के देशों पर थी. अमेरिका के पास तेल निकालने की तकनीक थी. बाजार था. वहीं, अरब देशों की जमीन के नीचे दबा तेल का विशाल भंडार था…ऐसे में अमेरिका ने सऊदी अरब को डॉलर में तेल का कारोबार करने के लिए तैयार कर लिया और धीरे-धीरे इस क्षेत्र के दूसरे देशों में भी घुसने लगा. अमेरिका ने ऐसा खेल किया कि ईरान वॉशिंगटन के करीब पहुंच गया. लेकिन, तेल और डॉलर की चमक की वजह से ईरान के समाज में गरीब-अमीर के बीच चौड़ी खाई पैदा हो गई. जिससे ईरान में साल 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई . इसका असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ा…इतिहास गवाह रहा है कि तेल कुओं पर कब्जे के लिए इराक और कुवैत के बीच जंग हुई…ये इराक के तेल कुओं से होने वाली कमाई ही थी -जिससे ISIS जैसे खूंखार आतंकी संगठन को वर्षों दाना-पानी मिला . तेल ने दुनिया के शक्ति संतुलन को कई बार बदला है…इस पर कब्जे की चाह ने कई बार दुनिया को युद्ध की आग में झोंका है ?

ईरान सरकार ने तेल कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया तो अंग्रेजों ने विरोध किया और कहा कि यह हमारी कंपनी है. ईरानियों ने जवाब दिया यह हमारा तेल है . ये बात ब्रिटेन को हजम नहीं हुई. अमेरिका को लगा कि कहीं कम्युनिस्ट ईरान में दाखिल न हो जाएं . ऐसे में अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में तख्ता पलट की साजिश रची और शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को ईरान का शासन बना दिया . ईरान के कुओं से निकले तेल की धार और डॉलर की चमक तेहरान समेत मुल्क के शहरी क्षेत्र में साफ-साफ महसूस की जाने लगी…इसी तरह स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण भी उस दौर की एक बड़ी घटना थी . ये नहर मिस्र के बीच भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है. जिससे बडे पैमाने पर तेल की आवाजाही होती थी . स्वेज नहर की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 1956 में इजराइली सेना ने स्वेज नहर पर कब्जे के इरादे से सिनाई रेगिस्तान पर हमला कर दिया…बाद में ब्रिटेन और फ्रांस भी इस युद्ध में कूद पड़े . लेकिन, अमेरिका ने किसी तरह इजराइल, ब्रिटेन और फ्रांस को स्वेज नहर पर कब्जे से रोका था…ये हमला मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के फैसले के तीन महीने 10 दिन बाद हुआ था .

अरब देशों के तेल कुओं पर अलग-अलग तरीके से खासतौर से अमेरिका का कब्जा हो गया… बदले में अमेरिका ने अरब देशों को सुरक्षा की गारंटी और डॉलर में तेल का कारोबार करने के लिए तैयार कर लिया . अमेरिका ने तेल को लेकर एक ऐसी अघोषित वैश्विक व्यवस्था बना दी-जिससे एनर्जी सप्लाई पर अमेरिका का वर्चस्व हो गया. पेट्रोल डॉलर के मजबूत होने से अमेरिका बहुत तेजी से आर्थिक तरक्की की सबसे ऊंची सीढ़ी पर पहुंच गया .

तब के USSR की बाकू के तेल कुओं से ईरान की सरहद करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर थी. रूस की नजर ईरान पर थी…जहां तेल की चमक में दो वर्ग तैयार हो चुके थे-एक शहरी और दूसरा ग्रामीण..शहरी वर्ग पर पश्चिम की छाप थी..वहीं, ग्रामीण समाज गरीबी में जीवन काट रहा था…असंतोष और विद्रोह के बीच ईरान में इस्लामिक क्रांति की जमीन तैयार हुई … साल 1979 की ईरान क्रांति का साइड इफेक्ट पड़ोसी देशों पर भी पड़ा .

ये तेल के कुओं से तरक्की का ईंधन निकालने वाली सोच ही थी, जिसमें अमेरिका ने मुस्लिम देशों में सैन्य तानाशाहों को खड़ा किया…ये तेल और प्राकृतिक गैस भंडारों पर कब्जे की सोच ही थी, जिसमें तानाशाहों को मिट्टी में मिलाने की साजिश रची गई. ये तेल कुओं की मदद से दुनिया पर राज करने वाली सोच ही थी…जिसमें ISIS ने कभी इराक और सीरिया के बड़े हिस्से में आतंक का साम्राज्य खड़ा किया .

ये प्राकृतिक गैस और तेल की ताकत ही हैं - जिसमें ईरान ने मिसाइलों का इतना बड़ा जखीरा तैयार कर लिया…अमेरिका- इजरायल समेत पश्चिमी देशों के ठिकानों को अपनी मिसाइलों से लगातार निशाना बना रहा है . फ्रांस, इटली और तुर्किए के ठिकानों पर ईरान हमला कर चुका है . ईरान ने अमेरिकी एयर क्राफ्ट कैरियर अब्राहम लिंकन पर भी हमले का दावा किया है .
ईरान अभी लंबी लड़ाई लड़ने के मूड में दिख रहा है .

ईरान पिछले कई दशकों से अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुनौती देता रहा है. ये तेल से कमाई दौलत थी-जिससे हमास, हिजबुल्ला और हूती जैसे हथियारबंद संगठनों की ईरान मदद कर रहा था . ये दुनिया के नक्शे पर ईरान का सामरिक महत्व है - जिसमें चीन बड़ा निवेश करता है . एशिया में एक मजबूत स्तंभ और सहयोगी की तरह देखता है . ये तेल की ताकत है जिसमें धूर विरोधी भी आपस में हाथ मिला लेते हैं…आज की तारीख में वैश्विक संबंधों को तय करने में तेल और प्राकृतिक गैस बहुत अहम भूमिका निभा रहा है .

दुनिया के इतिहास को पिछले 100 साल में कई बार लहूलुहान करने में तेल की बड़ी भूमिका रही है. भले ही ग्लोब पर कई युद्धों का ट्रिगर प्वाइंट कुछ और बताया जाता रहा हो . लेकिन, इसके पीछे एक मंशा तेल और गैस पर कब्जे की भी रही है. अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की तरक्की में तेल और प्राकृतिक गैस इंजन की भूमिका में रहा है . ऐसे में पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के दूसरे विकल्पों की ओर बहुत गंभीरता से विचार हो रहा है . दरअसल, दुनिया जिस तरह से आगे बढ़ रही है – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ह्यूमनॉइड रोबोट इंसानों की जगह लेते जा रहे हैं . चाहे कारखाना हो या युद्ध का मैदान … असली ताकत उसी के पास होगी, जिसका कंट्रोल एनर्जी पर होगा . दुनिया की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में फिलहाल Oil, Coal और Natural Gas की हिस्सेदारी 80 फीसदी से अधिक है … सोलर और विंड एनर्जी का हिस्सा 6 से 7 फीसदी है . लेकिन, दुनिया तेजी से Solar और Wind Energy Generation की ओर बढ़ रही है . भारत की ऊर्जा जरूरतों के पूरा करने में Renewable Energy की हिस्सेदारी 15 से 18 फीसदी के बीच है . वहीं, चाइना के Energy Generation में Renewable Energy की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी तक पहुंच गयी है…तो Electricity Consumption में भागीदारी 40 फीसदी है . ऐसे में तेल-गैस को दो बड़े खरीददार यानी भारत और चीन का पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से Clean Energy की ओर शिफ्ट होना…पेट्रोल डॉलर का कमजोर होना…शायद अमेरिका को पसंद नहीं आ रहा है . ऐसे में मिडिल ईस्ट में जंग की आग को भड़का कर राष्ट्रपति ट्रंप ने World Energy Order को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की है – जिससे उनके मुल्क को अधिक से अधिक फायदा मिल सके .

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