अब तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने एक्शन से पूरी दुनिया को हैरान करते रहे हैं. लेकिन, उनकी डिनर पार्टी में फायरिंग की ख़बर ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है. आखिर ये हुआ कैसे ? हमलावर वहां पहुंचा कैसे ? हालांकि, 31 साल के हमलावर टोमस एलन को गिरफ्तार कर लिया गया है . अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, हमलावर दक्षिणी कैलिफोर्निया में एक टीचर और वीडियो गेम डेवलपर था…उसने 2024 में कमला हैरिस के चुनावी कैंपेन में 25 डॉलर का चंदा भी दिया था . अब अमेरिकी जांच एजेंसियां ये जानने में जुटी हैं कि हमलावर टोमस एलन इतनी सुरक्षित जगह हथियार के साथ पहुंचा कैसे? उसके निशाने पर कौन-कौन था? उसने फायरिंग के लिए व्हाइट हाउस कॉरस्पॉन्डेंट डिनर को क्यों चुना ? क्या टोमस एलन बड़ी साजिश का एक छोटा हिस्सा भर था ? ऐसे कई सवालों के जवाब हर एंगल से तलाशने की कोशिश हो रही है . लेकिन, एक बड़ा सच ये भी है कि अपनी दूसरी पारी में राष्ट्रपति ट्रंप जिस आक्रामकता के साथ दुनिया से डील कर रहे हैं – उसमें उन्होंने अपने दुश्मनों की संख्या बहुत बढ़ा ली है . शायद अमेरिका के भीतर भी उनके दुश्मनों की संख्या कम नहीं है . 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया…ईरान ने भी तगड़ा पलटवार किया . इस जंग से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल सप्लाई प्रभावित हुई . मिसाइलों की रेंज में दुनिया के वो मुस्लिम देश भी आए – जिन्हें दुनिया की सबसे सुरक्षित जगहों में से एक माना जाता था . कभी दुनिया के झगड़ों को निपटने में मध्यस्थ की भूमिका अमेरिका निभाया करता था…उसी अमेरिका के प्रतिनिधि ईरान से बातचीत के लिए पाकिस्तान की धरती पर पहुंचे . यूरोप की अपनी समस्या है . राष्ट्रपति बार-बार NATO से निकलने की धमकी दे रहे हैं . अपनी बात नहीं मानने वालों को धमका रहे हैं – दूसरे मुल्कों की संप्रभुता में सेंधमारी कर रहे हैं . ऐसे में आज समझने की कोशिश करते हैं कि अमेरिका के दुश्मनों की संख्या किस तरह बढ़ रही है? राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों से अमेरिका को फायदा हो रहा है या नुकसान? राष्ट्रपति ट्रंप के दुश्मनों की संख्या किस रफ्तार से बढ़ रही है. आज ऐसे ही सुलगते सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे – अपने खास कार्यक्रम में - ट्रंप के कितने दुश्मन ?
पूरी दुनिया में अमेरिकी राष्ट्रपति के सुरक्षा ताम-झाम की दुहाई दी जाती है . एक अनुमान के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा पर सालाना एक अरब डॉलर से अधिक खर्चा होता है . अगर आप राष्ट्रपति ट्रंप की किसी चुनावी रैली में भी जाते हैं – कार्यक्रम रात 9 बजे का है . ऐसे में सुबह 9 बजे से ही कार्यक्रम स्थल पर आने-जाने वालों की कड़ी चेकिंग शुरू हो जाती है . ऐसे में सवाल यही उठ रहा है कि आखिर कहां चूक हुई कि हमलावर हथियार के साथ राष्ट्रपति ट्रंप के डिनर भोज तक पहुंचने में कामयाब हो गया? सबसे पहले ये समझते हैं कि डिनर में गोलीकांड के बाद आखिर अमेरिका में चल क्या रहा है?
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वॉशिंगटन के हिल्टन होटल में सब कुछ प्लानिंग के मुताबिक चल रहा था. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप..फर्स्ट लेडी मिलानिया ट्रंप, उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा सचिव पीट हेगसेथ, FBI डॉयरेक्टर काश पटेल, नेशनल इंटेलिजेंस डायरेटक्टर तुलसी गब्बाड जैसी दिग्गज हस्तियां वहां मौजूद थीं . सुरक्षा के बहुत कड़े इंतजाम किए गए थे . व्हाइट हाउट कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में करीब ढाई हजार मेहमान मौजूद थे..बस इंतजार हो रहा था - राष्ट्रपति ट्रंप के भाषण का .
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अचानक फायरिंग की आवाज आने लगी … डिनर में शामिल मेहमानों में से कुछ जान बचाने के लिए टेबल के नीचे छिप गए..तो कुछ इधर-उधर भागने लगे . हमलावर ने होटल के बॉलरूम के बाहर फायरिंग की…जबकी राष्ट्रपति ट्रंप और दूसरे मेहमान बॉलरूम के अंदर मौजूद थे .
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गोलियों का आवाज के साथ सीक्रेट सर्विस के सुरक्षाकर्मयों ने मोर्चा संभाल लिया . राष्ट्रपति ट्रंप को सुरक्षा घेरा में होटल से सुरक्षित बाहर निकाला गया … दूसरे मेहमानों को भी सुरक्षित जगह पहुंचा दिया गया. उस डिनर भोज में वरिष्ठ पत्रकार रीना भारद्वाज भी मौजूद थीं . ये सब उनकी आंखों के सामने हुआ .
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कुछ मिनटो के भीतर ही सुरक्षाकर्मियों ने हमलावर को जिंदा पकड़ लिया गया . उसके पास एक शॉटगन और कई चाकू मिलने की बात साम ने आ रही है…हमलावर की पहचान कोल थोमस एलन के रूप में हुई…जो कैलिफोर्निया का रहनेवाला है. पेशे से एक पार्ट टाइम टीचर और वीडियो गेम डेवलपर बताया जा रहा है. अमेरिकी मीडिया के मुताबिक,हमलावर उसी होटल में मेहमान था - जहां सालाना व्हाइट हाउस कॉरस्पॉन्डेंट डिनर का आयोजन किया गया था. ऐसे में सवाल उठता है कि भला एक पार्ट टाइम टीचर की अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से क्या दुश्मनी हो सकती है?
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राष्ट्रपति ट्रंप ने इस गोलीकांड को अमेरिकी संविधान पर हमला बताया… तो हमलावर एलन को सनकी . हमलावर एलन का एक सियासी कनेक्शन भी निकलता दिख रहा है . कहा जा रहा है कि एलन ने साल 2024 में डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ राष्ट्रपति उम्मीदवार कमला हैरिस के चुनावी कैंपेन में 25 डॉलर का चंदा भी दिया था . अब सवाल उठ रहा है कि क्या हमलावर कोल थोमस एलन अकेला था…या फिर उसके पीछे और भी लोग थे? कोल थोमस एलन किसी सनक का शिकार था या किसी बड़ी साजिश का छोटा हिस्सा? हमलावर इतना मजबूत सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए वहां तक पहुंचा कैसे ? सवाल ये भी उठ रहा है कि आखिर बार-बार राष्ट्रपति ट्रंप पर हमला क्यों हो रहा है?
गोलीकांड के बाद राष्ट्रपति ट्रंप मीडिया से मुखातिब हुए और इसे अमेरिकी संविधान पर हमला करार दिया . उन्होंने साफ-साफ कहा कि सीक्रेट सर्विस ने मेरी जान बचाई और सुरक्षा कर्मियों ने बहादुरी से काम किया . वो सुरक्षित है . इससे पहले भी दो बार राष्ट्रपति ट्रंप पर हमले की कोशिश हो चुकी है . सितंबर, 2024 में जब ट्रंप फ्लोरिडा में गोल्फ कोर्स से बाहर निकल रहे थे –तब भी ताबड़तोड़ फायरिंग हुई थी . राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिमी पेंसिल्वेनिया में एक चुनावी रैली के दौरान प्रेसिडेंट ट्रंप पर जानलेवा हमला हुआ – जिसमें गोली उनकी कान को छूते हुए निकल गयी . राष्ट्रपति ट्रंप को भी किस्मत का धनी कहा जाएगा – जिसमें हर हमले में वो बच जाते हैं . लेकिन, कूटनीति के मोर्चे पर जिस तरह ट्रंप आगे बढ़ रहे हैं – उसमें उनके दुश्मनों की संख्या लगातार बढ़ रही है . अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने पूरी दुनिया की सांसें फूल रखी है . बातचीत की कोशिशें भी शून्य बट्टा सन्नाटे में जाती दिख रही हैं . राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान में ईरान युद्ध पर होने वाली अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बैठक रद्द कर दी है . ये फैसला आखिरी वक्त में लिया गया . तो ईरान के विदेश मंत्री खास संदेश के साथ पहले ही पाकिस्तान पहुंच चुके थे
28 फरवरी को जब अमेरिका-इजरायल ने मिल कर ईरान पर हमला किया तो शायद राष्ट्रपति ट्रंप को अंदाजा नहीं रहा होगा.. जंग इतनी लंबी खींचेगी? उन्हें शायद ये भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला अली खामेनेई के खात्मे के बाद ईरानी मिसाइलों से इतना कड़ा जवाब मिलेगा? राष्ट्रपति ट्रंप को शायद ये भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनके लिए होर्मुज स्ट्रेट खुलवाना इतना मुश्किल काम होगा?
दुनिया में कारोबार और कूटनीति के हर नियम अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपनी सहूलियत के हिसाब से गढ़ना चाहते हैं . युद्ध की शुरुआत और अंत के नियम और शर्तों भी राष्ट्रपति ट्रंप अपने हिसाब से करना चाहते हैं. लेकिन, वो शायद वेनेजुएला और ईरान के बीच फर्क नहीं समझ पाते हैं और एक ऐसी जंग में उलझ जाते हैं - जिससे सम्मानजनक तरीके से निकलने का रास्ता शायद उन्हें दिखाई नहीं दे रहा है . ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप कभी सीजफायर का ऐलान करते हैं…तो कभी सीजफायर की डेडलाइन बढ़ाते हैं…कभी ईरान के साथ बातचीत के लिए उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की अगुवाई में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को पाकिस्तान भेजते हैं . लेकिन, कामयाबी नहीं मिलती . उसके बाद सीजफायर वार्ता के दूसरे दौर की तैयारी होती है . ईरान के साथ बातचीत के लिए अमेरिकी दूत स्वीव विटकॉफ और अपने दामाद जारेड कुशनर की पाकिस्तान यात्रा को आखिरी वक्त में टाल देते हैं…इस दलील के साथ कि 18 घंटे जहाज में बैठकर बेकार की बात करने नहीं जाना . राष्ट्रपति ट्रंप होर्मुज स्ट्रेट खोलने के लिए ईरान को तीन बार अल्टीमेटम दे चुके हैं. वहीं, ईरान का साफ-साफ कहना है कि अमेरिका पहले होर्मुज स्ट्रेट से नाकाबंदी हटाए…तब आगे की बात होगी.
शायद ट्रंप प्रशासन ये तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर ईरान में किससे बात की जाय . ईरान में आखिर किसकी चल रही है…
ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की तबीयत बहुत ही ज्यादा खराब बताई जा रही है. इस बीच, एक सीक्रेट लेटर की भी बहुत चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि ईरान के कुछ बड़े नेताओं ने मोजतबा खामेनेई को पत्र लिखा है कि मुल्क की बिगड़ती आर्थिक सेहत को देखते हुए परमाणु मुद्दे पर अमेरिका के साथ बातचीत का विकल्प ही बचा है .
सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की तबीयत खराब है…वो हमले में बुरी तरह जख्मी हो गए थे. दूसरी ओर, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान नाकाबंदी जारी रहने तक अमेरिका के साथ किसी भी बातचीत से इनकार कर रहे हैं…वहीं, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने इस्लामाबाद में पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम शहबाज़ शरीफ़ और पाकिस्तानी आर्मी चीफ फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाक़ात की…दरअसल, बातचीत के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आने वाला था..वहीं, Islamic Revolutionary Guard Corps अमेरिका और इजरायल के हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की बात कर रहा है .
ईरान अबतक खुले रूप से एकजुट और एकसुर का संदेश देता रहा है . लेकिन, भीतरखाने कई तरह के सुरों के संकेत मिल रहे हैं… ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान की उथल-पुथल के बीच क्या राष्ट्रपति ट्रंप के दुश्मनों की संख्या और बढ़ रही है?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की दलील है कि ईरान के नेतृत्व में भारी भ्रम की स्थिति है . मतलब, आज की तारीख में अमेरिका ये समझ नहीं पा रहा है कि ईरान से बातचीत करें तो किसके साथ करें ? ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से बातचीत करें या वहां के राष्ट्रपति पेजेश्कियान से . आखिर ईरान की असली ताकत किसके हाथों में है? क्या युद्ध और उथल-पुथल के बीच IRGC यानी Islamic Revolutionary Guard Corps और मजबूत हुआ है. खाड़ी देशों का भी अमेरिका को लेकर भीतर खाने अविश्वास बढ़ा है . क्योंकि, अमेरिका-इजरायल ने जिस तरह ईरान पर हमला किया, उसकी कुछ कीमत अरब देशों को चुकानी पड़ी . क्योंकि, ईरान की मिसाइलों के निशाने पर सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश भी रहे .
अमेरिका और इजरायल के हमले के जवाब में ईरानी मिसाइलों ने अरब वर्ल्ड के उन देशों को चुन-चुन कर निशाना बनना शुरू किया…जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं. ईरान ने बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की ओर मिसाइलें दागी . दुबई जैसे दुनिया के सबसे सुरक्षित जगहें भी ईरानी मिसाइलों की रेंज में आ गए..अमेरिका और अरब देशों के बीच दशकों से रिश्तों का आधार सुरक्षा का भरोसा रहा है . अमेरिका ने अरब वर्ल्ड के अपने सहयोगी देशों को सुरक्षा की गारंटी दी थी. लेकिन, भरोसे की ये दीवार ईरान की मिसाइलें गिरने के साथ टूट गयी .
राष्ट्रपति ट्रंप की दूसरी पारी में जिस रास्ते अमेरिका आगे बढ़ा और ईरान पर हमले के बाद जिस तरह रिश्तों को उलझाने की कोशिश हुई…उसमें भीतरखाने अरब वर्ल्ड के देशों का मन भी अमेरिका से खट्टा हुआ है .
मिडिल ईस्ट में युद्ध और तनाव की सबसे ज्यादा कीमत खाड़ी देशों को चुकानी पड़ रही है.नए तरह के रिश्ते आकार ले रहे हैं, जिसमें भीतरखाने किसी को तेल के बदले हथियार और डॉलर मिल रहा है… तो कभी समुद्र में रास्ता देने के बदले मोटा टोल वसूला रहा है . ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में रिश्तों का रीसेट बटन दबा दिया है .
राष्ट्रपति ट्रंप किसी भी कीमत पर हॉर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका का दबदबा चाहते हैं . इस समुद्री रास्ते पर कब्जे का मतलब है तेल सप्लाई के सबसे अहम रूट पर दबदबा…स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर फिलहाल ईरान का दबदबा बरकार है . अमेरिका मिडिल ईस्ट में तेल सप्लाई के अहम प्वाइंट पर कब्जे की रणनीति पर गुना-भाग कर रहा है . ऐसे में अरब वर्ल्ड के देशों को डर सता रहा है कि अगर उनकी जमीन से अमेरिका ने फिर हमला किया…तो उनके मुल्क का बड़ा नुकसान तय है .
अमेरिका इजरायल के कंधे पर बंदूक रख कर अरब और यूरोपीय देशों में अपने हित साधता रहा है . इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी अच्छी तरह समझ रहे होंगे कि उनका मुल्क जंग की कितनी बड़ी कीमत चुका रहा है . अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की हर बात में हां में हां मिलाने वाले बेंजामिन नेतन्याहू के सुर भी पिछले कुछ दिनों से नरम पड़ते दिख रहे हैं . शायद वो हिसाब लगा रहे होंगे कि अमेरिका के इशारे पर युद्ध में ताल ठोकने वाले यूक्रेन का अंजाम क्या हुआ? अमेरिका के रूख से इतर जाने वाले वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अंजाम क्या हुआ ? ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का अंजाम क्या हुआ? यूरोपीय देशों की भी चिंता कम नहीं है . अमेरिकी की अगुवाई वाले सुरक्षा तंत्र NATO से यूरोपीय देशों का भरोसा उठता जा रहा है . खुद राष्ट्रपति ट्रंप NATO को कागजी शेर बता चुके हैं और कई बार कह चुके हैं कि अमेरिका NATO से बाहर निकलने पर गंभीरता से विचार कर रहा है .
राष्ट्रपति ट्रंप किसी की ना नहीं सुनना चाहते…वो अपने हर फैसले पर दुनिया के सभी देशों को अपने साथ सुर मिलाता देखना चाहते हैं…राष्ट्रपति ट्रंप शायद भूल जाते हैं कि वो सिर्फ अमेरिका के राष्ट्रपति हैं…पूरी दुनिया के नहीं . इसके लिए वो कभी भारी-भरकम टैरिफ का दांव चलते हैं..तो कभी युद्ध की धमकी देते हैं . यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यूरोपीय देशों का अमेरिका पर भरोसा पहले ही हिला हुआ था . ईरान पर हमले के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट खोलने के लिए जिस तरह राष्ट्रपति ट्रंप ने NATO के सदस्य देशों से सहयोग मांगा और जवाब ना में आने लगा…उससे राष्ट्रपति ट्रंप कुछ यूरोपीय देशों से उखड़े हुए हैं .
सबसे पहले स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले को अवैध और अन्यायपूर्ण बताया…अपने मुल्क के एयरबेस के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी और एयरस्पेस भी बंद कर दिया. फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने अमेरिकी विमानों को हथियार लेकर इजरायल जाने के लिए रास्ता देने से इनकार कर दिया . इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी अपने मुल्क के सिगोनेला एयरबेस पर अमेरिकी लड़ाकू विमानों को लैंडिंग की इजाजत देने से साफ मना कर दिया .
दरअसल, यूरोपीय देशों को लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप खुद को NATO का सुप्रीम कमांडर समझते हैं और बिना सदस्य देशों से राय-मशवरा के युद्ध में उतर जाते हैं . ईरान युद्ध के बाद यूरोपीय देशों को लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप उन्हें जबरन युद्ध में खींचना चाहते हैं .
राष्ट्रपति ट्रंप भी NATO को कागजी शेर बता चुके हैं और इससे अमेरिका के निकलने की बात कई बार दोहरा चुके हैं .
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बने नाटो सैन्य गठबंधन में अमेरिका सबसे प्रमुख और शक्तिशाली सदस्य है. 1949 में स्थापित, यह उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच एक सुरक्षा का गठबंधन है . ईरान युद्ध में कुछ NATO सदस्य देशों के रूख से राष्ट्रपति ट्रंप बहुत नाराज हैं . वहीं, NATO सदस्य कुछ यूरोपीय देशों को लगता है कि वो अमेरिका के झगड़े में क्यों पड़ें?
NATO के जिन सदस्य देशों ने ईरान युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं दिया…उन्हें सबक सिखाने यानी सजा देने की राह भी राष्ट्रपति ट्रंप गुना-भाग करते दिख सकते हैं . ऐसे देशों से राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिकी सैनिकों की तैनाती हटा या घटा सकते हैं …ऐसे देशों को अत्याधुनिक हथियार और सैन्य तकनीक देने पर प्रतिबंध लगा सकते हैं. हालांकि,एक सच ये भी है कि आज की तारीख में कई यूरोपीय देश अमेरिका से हथियार खरीदने के पक्षधर नहीं हैं . ना अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के हर फैसले के पीछे खड़े होना चाहते हैं-यूरोपीय देशों अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से फैसला ले रहे हैं - जिससे उनकी संप्रभुता सुरक्षित रहे .
अक्सर कहा जाता है कि अमेरिका से दुश्मनी मोल लेना खतरनाक है और दोस्ती घातक . आज की तारीख में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जिस रास्ते आगे बढ़ रहे हैं – उसमें कहा जा रहा है कि अमेरिकी तंत्र एक ऐसी लिस्ट तैयार कर रहा है, जिसमें ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका का साथ देने वाले दोस्तों को इनाम दिया जाएगा और पीछे हटने वाले देशों को दंड . राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों ने पूरी दुनिया का शक्ति संतुलन और अर्थ-व्यवहार पूरी तरह बदल दिया है . उनके Tariff Terrorism की वजह से पहले ही पूरी दुनिया में उथल-पुथल है . ऐसे में कारोबारी मिजाज वाले राष्ट्रपति ट्रंप अपने मुल्क के मामूली फायदे के लिए दुनिया के बड़े खतरे में डालने में भी हिचक नहीं दिखा रहे हैं . ईरान को घुटनों पर लाकर वो पूरी दुनिया को संदेश देना चाह रहे हैं कि उनकी बात नहीं मानने का अंजाम क्या हो सकता है? साथ ही होमुर्ज स्ट्रेट को कंट्रोल में कर दुनिया की तेल सप्लाई चेन पर अमेरिकी वर्चस्व को स्थापित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं . राष्ट्रपति ट्रंप Make America Great Again एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए दुश्मन बढ़ाने में जरा भी हिचक नहीं दिखा रहे हैं…