क्या देश के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को आंदोलनकारियों की बड़ी जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए? ऐसे कई सवाल है– जिनका जवाब अलग-अलग कोण से तलाशने की कोशिश हो रही है ? लेकिन, अब बड़ा सवाल ये है कि छात्र जिन मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे थे – क्या वो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हो गया ? 2026 का छात्र आंदोलन अपने मकसद में कितना कामयाब हुआ? जब भी इस आंदोलन की चर्चा होगी–तब इस बात का जरूर जिक्र होगा कि कैसे सोशल मीडिया की ताकत से मजबूत हुए एक छात्र आंदोलन ने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया? ऐसे में जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन - आक्रोश और अंजाम के बीच ये समझना भी जरूरी है कि आजादी के बाद कब-कब छात्रों ने अपने आंदोलन से हुक्मरानों को हिलाया? इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया…जहां से बदलाव का नया रास्ता बना? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे इस खास एक्सक्लूसिव खबर में – छात्र क्रांति से कितना बदलाव?
छात्र ‘क्रांति’ आरंभ से अंत तक
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांग पूरी हो गयी … केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपने इस्तीफे में लिखा कि जंतर-मंतर पर और देश में जो स्थिति बनी है, इस स्थिति का राष्ट्र विरोधी ताकतें लाभ ना उठाएं, देश की एकता बनी रहे, भारत के एक भी विद्यार्थी का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में ना उलझे, हमारे बच्चे अपना समय पढ़ाई में लगाएं, करियर बनाने पर फोकस करें, इसी बात पर विचार करते हुए त्यागपत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेज दिया है . प्रधान के इस्तीफे को आंदोलनकारी छात्र अपनी बड़ी जीत बता रहे हैं..सरकार से बातचीत में CJP नेताओं ने जंतर-मंतर से उठने यानि आंदोलन खत्म करने का ऐलान कर दिया . ऐसे में ये समझना जरूरी है कि 2026 में किस तरह छात्र आंदोलन की शुरूआत हुई और इस आंदोलन को खत्म करने की स्क्रिप्ट कैसे तैयार हुई?
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12 साल में ऐसा पहली बार हुआ
दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 36 दिनों से डटे आंदोलनकारी छात्रों को पहली बड़ी जीत मिली … भारी दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया . पिछले 12 साल में ऐसा पहली बार हुआ- जब आंदोलनकारी छात्रों के दबाव की वजह से मोदी सरकार के किसी कैबिनेट मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा .
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20 जून से शुरू हुआ छात्र आंदोलन
पेपर लीक के मुद्दे पर आंदोलन कर रहे छात्रों की सबसे बड़ी मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा थी..20 जून से शुरू हुआ छात्र आंदोलन तेजी से एक ऐसी सुनामी में बदलता जा रहा था - जिसे कंट्रोल करना शायद सरकार के लिए मुश्किल हो रहा था . सरकार की डैमेज कंट्रोल और बातचीत के जरिए रास्ता निकालने की शुरुआती कोशिशों से आंदोनकारियों पर खास फर्क नहीं पड़ा . आंदोलनकारी अपनी मांगों पर चट्टान की तरह अड़े रहे - ऐसे में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दो पन्ने की एक चिट्ठी सोशल मीडिया पर शेयर किया … जिसमें कुल 575 शब्द थे . प्रधान ने अपनी चिट्ठी में लिखा, देश की युवाशक्ति को भ्रम के कुचक्र में फंसने नहीं देंगे, यही मेरा संकल्प है .
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इस्तीफे को आंदोलनकारी अपनी बड़ी जीत बता रहे
सरकार पर दबाव ऐसा बना कि मोदी सरकार के हाईप्रोफाइल और तेज-तर्रार मंत्री CJP के छात्र नेताओं से बातचीत के लिए आगे आए..साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार और छात्र नेताओं के बीच बातचीत में क्या-क्या हुआ सामने आया . CJP नेताओं जंतर-मंतर पर आंदोलन खत्म करने का ऐलान कर दिया . धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को आंदोलनकारी अपनी बड़ी जीत बता रहे हैं . वहीं, विरोधी पार्टियों के नेता जेन जी को बधाई दे रहे हैं और लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं .
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छात्रों का आंदोलन इतना बड़ा और असरदार कैसे बना?
अब सवाल उठ रहा है कि आखिर पिछले 36 दिनों में दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ-छात्रों का आंदोलन इतना बड़ा और असरदार कैसे बना … कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को प्रचंड बनाने में सोशल मीडिया ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई . आंदोनकारियों की आवाज दुनिया के हर हिस्से तक इंस्टाग्राम रील,यूट्यूब शॉट्स, फेसबुक पोस्ट, ट्वीट के रूप में पहुंचती रही..इससे छात्रों का ये आंदोलन सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहा..घर-घर में CJP के आंदोलन की चर्चा होने लगी…ऐसी स्थिति में सरकार ने डैमेज कंट्रोल के लिए आंदोलनकारी छात्र नेताओं से बातचीत शुरू की…पेपर लीक संशोधन बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दी … NEET (UG) परीक्षा का आयोजन करने वाली National Testing Agency के 47 अफसरों को बर्खास्त कर दिया गया. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो संदेश जारी किया . संभवत:, पहली बार पीएम मोदी ने जेन जी से उनके अंदाज में जुड़ने की कोशिश की…
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क्या ये छात्र आंदोलन का अंत है या नई शुरुआत
ये जेन जी के आंदोलन का अंदाज था . सोशल मीडिया की ताकत है- जिसमें बिना किसी बड़े नेता की मौजूदगी के छात्र आंदोलकारियों ने वो कर दिखाया - जो पिछले 12 वर्षों में विपक्षी दलों के नेता भी नहीं कर पाये . अब सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या ये छात्र आंदोलन का अंत है या नई शुरुआत .
आंदोलन का साइड इफेक्ट
जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन का साइड इफेक्ट ये रहा कि देश के कई शहरों में छात्र सड़कों पर निकल गए… पहले हुए छात्र आंदोलनों से बिल्कुल अलग अंदाज में … अगर पुलिस वाले हाथों में डंडा लिए आंदोलनकारी छात्रों की ओर बढ़ते – तो छात्र राष्ट्रगान गाने लगते हैं . आंदोलनकारी छात्र खुद पुलिस वालों से पूछते कि टीयर गैस,वाटर कैनन लेकर आए हैं क्या ? सोशल मीडिया के जरिए आंदोलन से जुड़ी एक-एक जानकारी समाज के हर वर्ग के स्मार्टफोन तक पहुंचती रही. कभी CJP के आंदोलन की तुलना 2011 के अन्ना हजारे के आंदोलन से हुई… तो कभी 1970 के दशक में हुए गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलन से .
देश, काल और हालात के मुताबिक…आंदोलन का स्वरूप बदलता रहता है . ऐसे में आजाद भारत में छात्र आंदोलनों के चरित्र को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना होगा . 1960 के दशक में दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी आंदोलन में छात्रों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया . लेकिन, उस आंदोलन का स्वरूप थोड़ा अलग था . ऐसे में दक्षिण में छात्रों के हिंदी विरोध आंदोलन की बात आज नहीं करेंगे . लेकिन, 1970 के दशक के शुरुआती दौर में समाज में एक अजीब थी उथल-पुथल थी . महंगाई ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा था . तब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इंदिरा गांधी थी . राज्यों में मुख्यमंत्री कांग्रेस आलाकमान के इशारे पर बदले जा रहे थे . शायद आम लोगों की कहीं सुनवाई नहीं थी .
वो साल 1973 का था . गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे – चिमनभाई पटेल . मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज और अहमदाबाद के एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल मेस की फीस करीब 30 फीसदी बढ़ा दी गई . हॉस्टल का खाना एकाएक बहुत महंगा हो गया… जिसकी बड़ी वजह थी, मूंगफली के तेल का महंगा होना … ऐसे में छात्रों के निशाने पर सीधे-सीधे आ गए - मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल . हॉस्टल मेस महंगा होने से शुरू हुआ छात्रों का यह आंदोलन तेजी से भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकार विरोधी अभियान में बदल गया . आंदोलनकारी छात्रों को महंगाई की मार से त्राहिमाम कर रहे आम आदमी का भी साथ मिला और चिमनभाई पटेल के इस्तीफे के बाद आंदोलन खत्म हुआ . आजाद भारत में यह पहला मौका था – जब छात्र आंदोलन से सीधे-सीधे किसी सूबे की सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया . गुजरात के बाद छात्र आंदोलन का दूसरा सीधा असर बिहार में दिखा .
छात्र आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री का इस्तीफा
वो साल था 1973 का…अहमदाबाद के एल.डी. कॉलेज में हॉस्टल का मेस बिल अचानक बढा दिया गया…वो भी पूरे 30 फीसदी की बढ़ोतरी. इससे आधे से अधिक छात्र सिर्फ एक वक्त का खाना खाने के लिए मजबूर हो गए…ऐसे में अहमदाबाद के भूखे छात्र भड़क गए … छात्रों का सिस्टम से गुस्सा सड़कों पर दिखने लगा..महंगाई की मार से आम आदमी पहले से ही बेहाल था… जो छात्र आंदोलन के साथ जुड़ता जा रहा था . छात्रों के निशाने पर थे - तब के गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल . देखते ही देखते गुजरात में बड़े आंदोलन के लिए जमीन तैयार हो गई और नाम दिया गया नवनिर्माण आंदोलन…
25 जनवरी, 1974 को आंदोलनकारियों ने गुजरात बंद का ऐलान किया…आलम ये रहा कि जब 26 जनवरी को तिरंगा फहराया जा रहा था, तो वहां के 60 से अधिक शहरों में कर्फ्यू लगा हुआ था . छात्रों ने जयप्रकाश नारायण यानि जेपी को गुजरात आने का निमंत्रण भेजा. उनके अहमदाबाद पहुंचने से पहले ही चिमनभाई पटेल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया …जेपी अहमदाबाद पहुंचे तो आंदोलन और बढ़ा विधानसभा भंग कर नया चुनाव कराने की मांग होने लगी . मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल का इस्तीफा आंदोलनकारी छात्रों की बड़ी जीत थी … जो करीब ढाई महीने चला .
बिहार में सड़कों पर करीब 50 हजार छात्र
गुजरात की तरह ही बिहार के लोग भी महंगाई से त्राहिमाम कर रहे थे . जब अहमदाबाद में छात्र सड़कों पर थे … उसी समय बिहार के छात्र भी नए सिरे से गोलबंद होने लगे . छात्रों ने बिहार विधानसभा के घेराव की रणनीति बनाई-तारीख तय हुई 18 मार्च, 1974…पटना की सड़कों पर करीब 50 हजार छात्र जमा हो चुके थे .
इसमें से तीन-चौथाई कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र और बाकी बेरोजगार थे . सचिवालय के तीनों दरवाजों पर छात्र जमे हुए थे…भीतर सीआरपी और पुलिस के जवान राइफल और डंडों के साथ अफसरों के इशारे का इंतजार कर रहे थे…जैसे ही छात्र आगे बढ़े पुलिस के जवानों ने लाठियों से जोर दिखाना शुरू कर दिया…
देखते ही देखते आंदोलनकारी छात्र बेकाबू हो गए… टेलीफोन एक्सचेंज और पूर्व शिक्षा मंत्री रामानंद सिंह के घर को भी आग के हवाले कर दिया…दोपहर दो बजते-बजते पूरा पटना संगीनों के साए में था … सरकार के लिए हालात संभालना मुश्किल हो गया . कई शहरों में कर्फ्यू लगाना पड़ा . लालू यादव, सुशील मोदी समेत हजारों छात्र जेल भेज दिए गए .
पटना में हो रहे आंदोलनकारियों के एक्शन प्लान और अपील की खबरें सूबे के दूसरे हिस्सों तक रेडियो या अखबार के जरिए अगले दिन पहुंचती थी. छात्र नेताओं की समझ में एक बात आ गयी कि अगर आंदोलन को बड़ा और असरदार बनाना है - तो किसी बड़े चेहरे को आगे करना होगा? ऐसे में छात्र नेताओं ने जयप्रकाश नारायण से आंदोलन की अगुवाई की अपील की…जेपी ने वही रास्ता अपनाया- जो उन्होंने गांधीजी से सीखा था. पटना की सड़कों मौन जुलूस निकला . पटना से छात्र आंदोलन की ऐसी आंधी चली - जिसने देश की सियासी धारा को बहुत हद तक बदल दिया .
पटना में आंदोलनकारी छात्रों ने सूबे की गफूर सरकार को हिला दिया . छात्रों का आक्रोश जब एक अनगाइडेड मिसाइल की तरह बन गया – तो उस छात्र आंदोलन का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण यानि जेपी ने किया . भारतीय राजनीति में जेपी की छवि एक ऐसे राजनीतिक संन्यासी की थी – जो सत्ता से दूर रहकर व्यवस्था में बदलाव की बात करते थे . ऐसे में जेपी के नेतृत्व में छात्र आंदोलन इस तरह आगे बढ़ा – जिसका असर ये रहा कि केंद्र में भी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का रास्ता बन गया . पटना से छात्र आंदोलन की नर्सरी से ही लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं का उदय हुआ . नये राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का श्रीगणेश हुआ .
इसी तरह 1970 के दशक से चल रहे असम के छात्र आंदोलन का जिक्र करना भी बहुत जरूरी है . असम में समय-समय पर स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा कभी ठंडा तो कभी गरम हो रहा था . All Assam Student Union यानी आसू और असमगण संग्राम परिषद के नेताओं ने विदेशियों के मुद्दे को जोर-शोर से उठाना शुरू किया…मुख्य मुद्दा था — अवैध घुसपैठ और मतदाता सूची से विदेशी नागरिकों के नाम हटाना . यह आंदोलन करीब छह वर्षों तक चला . कई बार हिंसा भी हुई और हजारों लोग प्रभावित हुए…1985 में असम समझौता हुआ.
वो साल 1979 का था. असम की मंगलदोई लोकसभा सीट पर उपचुनाव का ऐलान हुआ … छात्र नेता पहले से वोटर लिस्ट में विदेशियों का नाम जुड़ने का मुद्दा उठा रहे थे . चुनाव के दौरान वोटरों की संख्या में बड़ा इजाफा देखा गया..जांच में देखा गया कि वोटरों की संख्या में बढ़ोत्तरी की एक बड़ी वजह अवैध रुप से आए बांग्लादेशी शरणार्थी हैं . इससे असमिया समाज बुरी तरह भड़क गया…असमिया बनाम बाहरी की लड़ाई और तेज हो गयी . छात्र खुलकर सड़कों पर आ गए . Detect, Delete और Deport यानि अवैध प्रवासियों की पहचान करो, वोटर लिस्ट से नाम हटाओ, देश से बाहर भेजो की मांग करने लगे.
असम के ज्यादातर हिस्सों में छात्र आंदोलन शांतिपूर्ण रहा . लेकिन, कई स्थानों पर हिंसा भी हुई…उस दौर में 1983 के नेल्ली नरसंहार ने पूरे देश को हिला कर रख दिया … सैकड़ों लोग मारे गए…नरसंहार के बाद इंदिरा गांधी ने हिंसा की आग में जले इलाकों का दौरा किया और इसके लिए सीधे-सीधे छात्र संगठन और आंदोलनकारियों को जिम्मेदार ठहराया .
नेल्ली नरसंहार के बाद बाहरियों को असम से बाहर निकालने के लिए छात्र आंदोलन और तेज होता गया … इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे राजीव गांधी . असम समस्या से स्थाई समाधान के लिए राजीव सरकार ने आंदोलन में शामिल छात्र नेताओं और संगठनों को बातचीत की टेबल पर लाने की प्रक्रिया शुरू की .
15 अगस्त, 1985 को केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच एक समझौते पर दस्तखत हुआ … जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है. इस समझौते में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन की ओर से प्रफुल्ल कुमार महंत,भृगु कुमार फूकन और ऑल असम गण संग्राम परिषद की ओर से बिराज शर्मा शामिल हुए…केंद्र सरकार और असम के प्रतिनिधियों के साथ खुद राजीव गांधी भी समझौते पर दस्तखत के दौरान मौजूद रहे .
असम समझौते के तहत
- 1951 से 1961 के बीच असम आए लोगों को नागरिकता और मतदान का अधिकार मिला
2.1961 से 1971 के बीच असम आए लोगों को नागरिकता मिली, मतदान का अधिकार नहीं
3.25 मार्च, 1971 के बाद आए विदेशियों को वापस भेजने का फैसला हुआ
असम समझौते में आंदोलनकारियों की एक और बड़ी मांग मान ली गई - वो थी असम के मुख्यमंत्री का इस्तीफा और सूबे में नए सिरे से चुनाव… आंदोलन के बाद अब वोट की जमीन पर परीक्षा की बारी थी. ऐसे में युवा छात्र नेताओं ने असम गण परिषद नाम से एक राजनीतिक दल बनाया. असम के सियासी अखाड़े में अब कांग्रेस में मंझे महारथियों की टक्कर नई पार्टी के नौजवान नेताओं से थी…विधानसभा की 126 सीटों में से 92 पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने मैदान मार लिया … जिन्हें असम गण परिषद ने समर्थन दिया था . कांग्रेस 25 सीटों पर सिमट गयी. असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे प्रफुल्ल कुमार महंत..जिनकी उम्र थी सिर्फ 32 साल .
असम आंदोलन का नतीजा ये रहा कि छात्र नेता प्रफुल्ल कुमार महंत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे . कई आंदोलनकारी छात्र नेता विधानसभा पहुंचे और सत्ता में भागीदार बने . असम आंदोलन ने साबित कर दिया छात्र न सिर्फ सत्ता परिवर्तन की ताकत रखते हैं - बल्कि छात्र नेतृत्व लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति में भी एंट्री कर सकता है . 1990 जब विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किया, तो ओबीसी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिला . आरक्षण के समर्थन और विरोध में प्रचंड छात्र आंदोलन हुआ . बाद में यही आंदोलन भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय और पहचान की राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हुआ . साल 2011 में जब अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे – तो इस आंदोलन को भी युवाओं का पूरा समर्थन मिला. उस दौर में सिस्टम से त्रस्त लोग…मैं भी अन्ना लिखी टोपी लगाए घुमने लगे. अन्ना आंदोलन की गर्भनाल से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ…अरविंद केजरीवाल सत्ता में आए तो दिल्ली मॉडल को ड्राइविंग सीट पर रखते हुए पंजाब में भी आम आदमी पार्टी ने सरकार बना ली . वहीं, 2019–20 में नागरिकता संशोधन अधिनियम यानि CAA के विरोध में देशभर के कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्र बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे.
ये तस्वीर 19 सितंबर, 1990 की है . दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के विरोध में आत्मदाह की कोशिश की…तब OBC आरक्षण के समर्थन और विरोध में जमकर प्रदर्शन हुआ…लेकिन, बड़े और कड़े विरोध आंदोलन के बाद भी मंडल आयोग लागू रहा..इसी तरह सरकार द्वारा केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में OBC कोटा लागू करने के फैसले के खिलाफ भी बड़ा आंदोलन हुआ-मेडिकल के छात्र सड़कों पर उतरे..लेकिन केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण की व्यवस्था चलती रही .
साल 2012 में दिल्ली में निर्भया गैंग रेप और हत्याकांड के खिलाफ युवा सड़कों पर उतरे… बिना किसी राजनीतिक दल के नेतृत्व के युवा सोशल मीडिया के जरिए निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए जुड़े और सड़कों पर उतरे . पुलिस की लाठी, वाटर कैनन और टियर गैस की परवाह न करते हुए - इतना बड़ा आंदोलन खड़ा किया- जिसके दबाव में सरकार को कानून में बदलाव जैसा बड़ा फैसला भी लेना पड़ा. महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई संस्थागत सुधार हुआ .
संभवत: ये निर्भया को इंसाफ दिलाने के नाम पर जुटे युवाओं की ताकत और गुस्से का नतीजा रहा कि 2013 में दिल्ली की सत्ता से कांग्रेस का सफाया हुआ और 2014 में केंद्र की सत्ता से भी कांग्रेस आउट हो गयी .
नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी CAA और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानि NRC के खिलाफ 2019 में पूरे देश में बड़ा आंदोलन शुरू हुआ..छात्र फिर सड़कों पर थे .आंदोलन का एक बड़ा केंद्र बना दिल्ली का शाहीन बाग..चौतरफा दबाव के बाद सरकार की ओर से साफ किया गया कि फिलहाल पूरे देश में NRC लागू नहीं होगा… अभी NRC सिर्फ असम तक सीमित है. वहीं, मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने CAA पूरे देश में लागू कर दिया
CAA-NRC के खिलाफ छात्र आंदोलन के नतीजों के अलग-अलग लेंस से देखने-समझने की कोशिश होती है. दलील दी जाती है कि CAA-NRC के खिलाफ छात्र आंदोलन ने लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की आजादी और पुलिसिया कार्रवाई जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस को नया आकार दिया. लेकिन, 20 जून 2026 को जब छात्र जंतर-मंतर पर पहुंचे तो शायद किसी को भी अंदाजा नहीं रहा होगा – उनका आंदोलन एक बड़ी सुनामी में बदल जाएगा . इस सुनामी को देखते हुए खुद प्रधानमंत्री मोदी को वीडियो संदेश जारी करना पड़ा … छात्रों के दबाव में शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा . अब सवाल उठ रहा है कि ये सोशल मीडिया के दौर में छात्र आंदोलन की नई शुरुआत है या फिर अंत ? आज के इस एपिसोड में बस इतना हीं . फिर मिलेंगे किसी ऐसे मुद्दे के साथ – जिसे जानना और समझना हम सबके लिए जरूरी होगा .