हर क्षण अनगिनत लोग धरती पर पैदा होते हैं. अपना किरदार निभाते हैं और पंचतत्व में विलीन हो जाते हैं . लेकिन, ऐसे बहुत कम हैं–जो अपने धरती पर पैदा होने से लेकर प्राण निकलने तक के क्षण को अमर कर देते हैं. ऐसी ही एक तारीख है-23 मार्च, 1931. इसी दिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को लाहौर सेंट्रल जेल से तय समय से एक दिन पहले ही फांसी पर लटका दिया गया . ऐसे में आज मैंने इतिहास से 95 साल पुराने पन्ने को पलटने का फैसला किया है…दरअसल, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत में हमारे देश की परंपरा, संघर्ष और बिना क्रेडिट मातृभूमि की सेवा का फलसफा है . समाज में शांति और सबकी तरक्की का रास्ता है. एक ऐसे समाज के निर्माण की सोच रही है–जिसमें नफरत के लिए कोई जगह नहीं..जिसमें धर्म के नाम पर अंधभक्ति के लिए कोई जगह नहीं…जिसमें जात-पात के नाम पर बंटवारे के लिए कोई जगह नहीं… जो फांसी से ठीक पहले अपने वैचारिक प्रतिद्वंदी को धन्यवाद कहना नहीं भूलते… ऐसे नायकों की शहादत और सोच को इतिहास के पन्नों से निकाल कर युवा पीढ़ी को रू-ब-रू कराना जरूरी है… जिसे भविष्य के भारत के लिए रौशनी ले सकें . शहीद भगत सिंह एक ऐसा नाम हैं – जिनकी 23 साल 176 दिन की जिंदगी, उनकी सोच और तौर-तरीकों को लेकर लोगों के बीच मंथन चलता रहता है. ऐसे में आज समझने की कोशिश करेंगे कि भगत सिंह की एक जेब में किताब और दूसरी जेब में पिस्तौल क्यों हुआ करती थी ? भगत सिंह जानबूझ कर सांडर्स मर्डर टीम का हिस्सा क्यों बने? सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद नहीं भागना किस तरह की रणनीति का हिस्सा था ? कोर्ट में भगत सिंह की जिरह ने किस तरह देश के दिग्गज वकीलों और स्वतंत्रता सेनानियों को नया रास्ता दिखाया? शहीद-ए-आजम किस तरह के भारत का सपना लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटक गए… उनके द्वारा जेल से लिखी गई चिट्ठियां उनकी शख्सियत, सोच और सरोकार के किस पक्ष से दुनिया का साक्षात्कार कराती हैं.
भगत सिंह खुद को नास्तिक बताते थे. वो नास्तिक क्यों हैं–इस मुद्दे पर उन्होंने जेल में रहते एक लेख लिखा था…जो 27 सितंबर, 1931 को लाहौर के एक अखबार द पीपल में प्रकाशित हुआ. मतलब, उन्हें फांसी पर लटकाए जाने के करीब 6 महीने बाद . इसके पीछे उन्होंने जोरदार दलील दी है. लेकिन, शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जिंदगी का हर लम्हा और खून का हर कतरा भारत को समर्पित रहा … उनकी आस्था सिर्फ और सिर्फ भारत और यहां के लोगों में थी. जरा सोचिए … 23 साल की उम्र. जेल की एक तंग कोठरी में बंद नौजवान को कुछ घंटे बाद फांसी दी जानी हो…तब उसके जेहन में क्या चल रहा होगा या क्या चलना चाहिए? लाहौर सेंट्रल जेल की कोठरी नंबर-14 में भगत सिंह बंद थे…फांसी से करीब दो घंटे पहले उनके वकील प्राणनाथ मेहता मिलने जेल पहुंचे…उन्हें देखते ही भगत सिंह ने पूछा किताब लाए हैं क्या ? दरअसल, उन्होंने मेहता से रूस के महान क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी मांगी थी…जैसे ही मेहता ने किताब आगे बढ़ाया . भगत सिंह तुरंत किताब के पन्नों में खो गए . बहुत आश्चर्य के साथ मेहता ने भरी आवाज में पूछा क्या देश के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे … बिना किताब से नजर हटाए भगत सिंह ने कहा – साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और इंकलाब जिंदाबाद . ऐसे में भगत सिंह के एक पत्र का जिक्र करना जरूरी है – जो उन्होंने फांसी से एक दिन पहले यानी 22 मार्च, 1931 को जेल से लिखा था . लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया गया…हंसते-हंसते वतन पर कुर्बान हो गए तीन क्रांतिकारी . भगत सिंह अक्सर कहा करते थे, 'वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन वे मेरे विचारों को नहीं मार सकते. वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं,लेकिन वे मेरी आत्मा को कुचल नहीं पाएंगे .'
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आखिर भगत सिंह किस मिट्टी से बने थे . उनकी सोच किस सांचे में ढलकर दुनिया के सामने आईं…उनके भीतर सर्वोच्च बलिदान की भावना कहां से आईं … वो किस तरह के भारत का सपना आंखों में संजोए हुए थे . इसे समझने के लिए उस खत को पढ़ाना हो … जो उन्होंने अपनी फांसी से ठीक एक दिन पहले अपने साथियों के नाम लिखा था. स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता . लेकिन मैं एक शर्त पर ज़िन्दा रह सकता हूँ कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता . मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है, इतना ऊँचा कि जीवित रहकर इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.
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आज मेरी कमजोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फांसी से बच गया, तो वे ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिह्न मद्धिम पड़ जाएगा या सम्भवतः मिट ही जाए . लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी पर चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रान्ति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.
हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतन्त्र, ज़िन्दा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता . इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया . मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा ? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह
भगत सिंह के परिवार के हर सदस्य की रगों में देशभक्ति का लहू दौड़ रहा था.. जिस दिन उनका आज के पाकिस्तान के लायलपुर के बंगा गांव में जन्म हुआ…उसी दिन चाचा सरदार अजीत सिंह का निर्वासन खत्म होने की खबर आई…उसी दिन पिता सरदार किशन सिंह और छोटे चाचा सरदार स्वर्ण सिंह जेल से रिहा हुए . अमृतसर के जलियांवाला नरसंहार ने भगत सिंह के भीतर की चिंगारी को धधकती आग में बदल दिया . क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथी जानते थे कि वो जिस रास्ते भारत को आजाद कराना चाहते हैं - उसका अंजाम क्या होगा? इसलिए क्रांतिकारी अपने लिए मौत भी ऐसी चाहते थे - जो भारत के हर आदमी को झकझोकर दे . भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने फांसी से तीन दिन पहले पंजाब के गवर्नर के नाम पत्र लिखा…उसमें साफ-साफ लिखा गया. हम आपसे केवल यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है. इस स्थिति में हम युद्धबंदी हैं, अत: इस आधार पर हम आपसे मांग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबंदियों जैसा ही व्यवहार किया जाए और हमें फांसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाए .
भारत भक्ति में भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने के विकल्प को चुना . जिस ब्रिटिश अफसर सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा हुई. उसकी मूल FIR में भगत सिंह का नाम नहीं था . लाहौर के अनारकली थाने में 17 दिसंबर, 1928 की शाम करीब साढ़े चार बजे उर्दू में FIR दर्ज की गई. जिसमें दो अज्ञात लोगों का जिक्र था. कहा जाता है कि भगत सिंह एक खास रणनीति के तहत सांडर्स की हत्या वाले प्लान का हिस्सा बने . इसी तरह दिल्ली असेंबली में बम फेंकने के बाद मौके से नहीं भागना भगत सिंह की रणनीति का बड़ा हिस्सा था … क्रांतिकारियों ने जेल जाकर, अदालत में दमदार जिरह के जरिए भारत के आम आदमी को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जगाया. फांसी के फंदे पर हंसते - हंसते लटकते हुए आम आदमी के भीतर से ब्रिटिश पुलिस, जेल और मौत के भय से मुक्त करने में अहम किरदार निभाया
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की मीटिंग में तय हुआ कि पब्लिक सेफ्टी बिल के विरोध में दिल्ली असेंबली में बम फेंका जाएगा . जिम्मेदारी सौंपी गई बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को…योजना बनी कि बम फेंकने के बाद बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह भाग जाएंगे … लेकिन, भगत सिंह ने बम फेंककर भागने का विरोध किया … उनकी दलील थी कि बम कांड का मुकदमा चलेगा…तो उससे देश के नौजवानों को क्रांतिकारियों के मिशन का पता चलेगा . इसी तारीख को पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के विरोध में बम फेंकने की योजना बनी. असेंबली में कौन कहां बैठता है- ये देखने के लिए दो दिन पहले ही बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह असेंबली गए थे…बम इतनी हल्की क्षमता के बनाए गए थे, जिससे किसी को नुकसान न पहुंचे . बम के साथ असेंबली में फेंके गए पर्चे में लिखा गया था कि बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है . साथ ही ये भी साफ-साफ लिखा गया, 'हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ और ‘औद्योगिक विवाद’ के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं.'
युवा क्रांतिकारियों का मकसद साफ है . वो सिर्फ पिस्तौल और बम चलाना ही नहीं जानते थे … उनका किताब और दुनिया में चल रही हर तरह की हलचल से भी वास्ता था . क्रांतिकारियों की हर एक्शन के पीछे अपनी दमदार दलील थी…यही, वजह है कोर्ट में अपनी दलीलों के जरिए तब के स्वतंत्रता सेनानियों, वकीलों और देश की आम आदमी को प्रभावित कर रहे थे . इसी तरह लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज करने वाले अंग्रेज़ अफ़सर जॉन सांडर्स को मारकर बदला ले लिया…भले ही लाहौर कॉन्सपिरेसी केस की मूल FIR में भले ही भगत सिंह का नाम नहीं था … लेकिन, क्रांतिकारियों ने अदालत में अपना बचाव नहीं किया . क्योंकि, जेल और अदालत में रहते क्रांतिकारी अपने मकसद को आगे बढ़ता देख रहे थे .
भगत सिंह की किताबों से इतनी गहरी दोस्ती थी…वो लाहौर जेल के भीतर से अपने के दोस्त जयदेव को पत्र लिखकर लाइब्रेरी से किताबें मंगवाया करते थे. भगत सिंह की परवरिश ऐसी हुई कि जेल में अपने साथियों से पत्र लिखकर किताब मांगते थे . अपने पिता को पत्र लिखकर कहते थे कि मेरी जिंदगी के लिए किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए…फांसी से 20 दिन पहले अपने छोटे भाई को चिट्ठी लिखकर कहते हैं–तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर दुख हुआ … हिम्मत से पढ़ाई करना . जब फांसी की घड़ी आई तो जिस तरह भगत सिंह गुनगुना रहे थे - दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त…मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी. फांसी के फंदे के करीब खड़े भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के दमकते चेहरे को देखकर वहां मौजूद अंग्रेज अफसर सन्न था…क्योंकि, फांसी से पहले तीनों क्रांतिकारियों के चेहरे ढके नहीं गए थे . ऐसे में अंग्रेज अफसर के मन में उठ रहे तूफान को भगत सिंह समझ गए और उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा –Well Mr. Magistrate…You are fortunate to be able today to see how Indian revolutionaries can embrace death with pleasure for the sake of their supreme ideal…मतलब, मजिस्ट्रेट साहब आप किस्मत वाले हैं कि आज आप अपनी आंखों से यह देखने का मौका पा रहे हैं कि भारत के क्रांतिकारी किस तरह हंसते हुए अपने सर्वोच्च आदर्श के लिए मृत्यु का आलिंगन कर सकते हैं… कुछ ऐसी ही थी भगत सिंह और उनके साथियों की सोच…अक्सर कहा जाता है कि महात्मा गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुक सकती थी. इसे भी समय-समय पर अलग-अलग लेंस से देखने की कोशिश होती है.भले ही महात्मा गांधी और भगत सिंह का मकसद एक था- लेकिन, रास्ता अलग. ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव किस तरह के भारत के सपने को लेकर आगे बढ़ रहे थे .
वो साल 1929 का था . महीना अक्टूबर का . पंजाब छात्र संघ लाहौर के दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे थे - नेताजी सुभाष चंद्र बोस . जिसमें जेल से भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा भेजा गया पत्र पढ़कर सुनाया गया…जिसमें लिखा था, 'इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठाएं . आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम है . आने वाले लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस देश की आजादी के लिए जबरदस्त लड़ाई की घोषणा करने वाली है. राष्ट्रीय इतिहास के इन कठिन क्षणों में नौजवानों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ेगी.' भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का मकसद एक था- लेकिन, तरीका अलग . छात्रों के उसी संबोधन वाले पत्र में भगत सिंह आगे कहते हैं-
नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचाना है, फैक्ट्री-कारखानों के क्षेत्रों में गंदी बस्तियों और गांवों में और जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असंभव हो जाएगा. भले ही भगत सिंह की उम्र कम थी. लेकिन, दुनिया और समाज को लेकर उनकी समझ बहुत गहरी और दूर की थी… 23 साल की उम्र में भगत सिंह अच्छी तरह समझ गए थे कि सही मायनों में आजादी के लिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत है. इसलिए, क्रांतिकारी भगत सिंह की सोच के केंद्र में असमानता और भेदभाव में आजादी भी है..देश के करोड़ों गरीब, किसान, मजदूर,पिछले सभी वर्ग के सर्वेदय के लिए क्रांतिकारी सोच भी. वो सबको शिक्षा हासिल करने पर जोर देते हैं . इसलिए अपनी फांसी से 20 दिन पहले अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को एक पत्र में कहते हैं, 'अजीज कुलतार बरखुरदार, हिम्मत से तालीम हासिल करना और सेहत का ख्याल रखना . हौसला रखना और क्या कहूं!'
भगत सिंह किन संस्कारों के बीच पले थे-इसे एक और घटना के जरिए समझा जा सकता है . भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जब लाहौर जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम रहे थे…वहां से कुछ दूरी पर जमा गुस्साई भीड़ को भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह शांत करा रहे थे.. जैसे ही फांसी की खबर मिली उन्होंने भीड़ से कहा, 'खबर मिली है कि भगत सिंह को फांसी दे दी गई है . मैं खबर या लाश लेने जेल जा रहा हूं. आप सब अपनी जगह पर बैठे रहें. मैं कहता हूं, कोई जेल की तरफ न जाए . ऐसा न हो कि हम एक भगत सिंह को लेने जाएं और सैकड़ों भगत सिंह देकर आएं.' ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों लगा कि उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी पर लटका कर उन्हें खत्म कर दिया है.लेकिन, उन्होंने भगत सिंह को हमेशा के लिए इतिहास में अमर कर दिया .
लाहौर की जिस सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई…उसे 1961 में गिराकर एक आवासीय कॉलोनी में बदल दिया गया . जेल कैंपस में जहां फांसी घर हुआ करता था – उस जगह को आज की तारीख में शादमान चौक के नाम से जाना जाता है . पाकिस्तान में सक्रिय भगत सिंह फाउंडेशन लंबे समय से शादमान चौक का नाम बदल कर भगत सिंह चौक करने की मांग कर रहा है . भगत सिंह रूसी क्रांति से प्रभावित थे और भगत सिंह से देश की आजादी की लड़ाई से जुड़े ज्यादातर बड़े नेता प्रभावित थे . इसमें सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव का नाम भी शामिल है..शहीद भगत सिंह की लोकप्रियता का ग्राफ हमेशा बहुत चमकदार रहा है तो उनकी स्वीकार्यता भी कमोबेश सभी विचारधाराओं में है. क्रांतिकारी भगत सिंह की सोच के केंद्र में पहले नंबर पर देश की आजादी… दूसरे नंबर पर सबकी तरक्की का रास्ता खोलना था. सांप्रदायिकता और नफरत के लिए उनके सपनों के भारत में कोई जगह नहीं थी. ऐसे में आज की तारीख में नेताओं और युवाओं दोनों के लिए भगत सिंह की जिंदगी से कई पैगाम निकल रहे हैं . भगत सिंह के लेख और पत्रों से उनके सपनों के भारत की जो तस्वीर निकलती दिख रही है - उसके मुताबिक भगत सिंह एक ऐसा भारत बनाना चाहते थे जिसमें सबके लिए समता और सामाजिक न्याय, शोषण मुक्त समाज, धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशील विचारों पर आधारित समाज बने, वर्ग चेतना विकसित हो, जिससे आपस में लोग न लड़ें, पूंजीपतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाए, सांप्रदायिकता और जातिवाद से मुक्त समाज हो . लेकिन, हमारी मौजूदा वोट बैंक पॉलिटिक्स न तो जात-पात की दीवार गिरने देना चाहती है…ना मजहब के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण में कोई कसर दिख रही है … खुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में इतिहास की भी नई व्याख्या का चलन तेजी से आगे बढ़ रहा है…वहीं, क्रांतिकारी भगत सिंह के सामने एक ओर देश को आजाद कराने जैसे लक्ष्य है . दूसरी ओर, आजाद भारत में समाज के आखिरी पायदान पर खड़े लोगों के सर्वोदय का रास्ता भी .
क्रांतिकारी भगत सिंह अपने विचारों और बलिदान के जरिए आज की राजनीतिज्ञों को खुद के लिए नहीं,दूसरों के लिए जीने का रास्ता दिखाते हैं . भगत सिंह के संघर्ष में मकसद बड़ा है - व्यक्ति नहीं . इतिहास पलटने की सोच नहीं… इतिहास बनाने की सोच है . आज की युवा पीढ़ी अपना अधिक समय वर्चुअल वर्ल्ड में बिता रही है. उसी में अपने नायक और जिंदगी का तौर-तरीका भी खोज रही है…साइड इफेक्ट ये है कि ज्यादातर युवाओं में त्याग, सहनशीलता और संघर्ष वाली सोच घटती जा रही है. युवाओं का पूरा फोकस खुद पर सिमटता जा रहा है … ऐसे युवाओं को हमारे रियल हीरो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव त्याग,बलिदान और देश के लिए फना होने का फलसफा सिखा रहे हैं .
भगत सिंह भी एक ऐसा भारत बनाना चाहते थे – जिसमें जनता का राज हो . लेकिन, उन्होंने शायद ही कभी ऐसे सिस्टम की कल्पना नहीं की होगी…जिसमें राजनीतिक दलों का सबसे बड़ा मकसद चुनाव जीतना और सत्ता में बने रहना हो जाए . शहीद-ए-आजम खुद को नास्तिक कहा कहते थे … क्योंकि वो धर्म की आड़ में अपनी कमजोरियों को छिपाने में यकीन नहीं करते थे . इन दिनों इतिहास को नए लेंस से देखने की परंपरा तेजी से आगे बढ़ी है – लेकिन, हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारी हमारे इतिहास को और समृद्ध बनाने वाले कोहिनूर हैं . हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये भगत सिंह की 96 साल पहले की सोच है – जो उन्होंने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम के साथ फेंके गए पर्चे में कहा था - हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं . हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं–जिसमें प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का उपयोग करेगा. हम मानव रक्त बहाने के लिए अपनी विवशता पर दुखी हैं…परन्तु क्रांति के लिए मनुष्यों का बलिदान आवश्यक है. मतलब, भगत सिंह ने एक ऐसे भारत का सपना देखा –जिसमें व्यक्ति के जीवन की गरिमा सबसे ऊपर रही…जिसमें सबको तरक्की के लिए बराबर का मौका मिले…समाज से शांति हो और हर शख्स अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर सके . हिंसा और खून-खराबा के लिए कोई जगह नहीं थी . ऐसे में आज की राजनीति को कम से कम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव से त्याग की शिक्षा लेनी चाहिए..दूसरों को मिटाने वाली सोच की जगह इतिहास के नायकों के योगदान को स्वीकार कुबूल हुए लकीक आगे बढ़ाने वाली सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए .