ममता बनर्जी पिछले 15 साल से पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं, वो 34 साल पुराने वामपंथी किले को ध्वस्त कर मुख्यमंत्री बनी थीं. तृणमूल कांग्रेस चौथी बार ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए हैं . बीजेपी अबकी बार दीदी को बंगाल की सत्ता से आउट करने के लिए आक्रामक तरीके से मैदान में है. लेकिन, बंगाल के लोगों के मन में क्या चल रहा है? वो किस सोच के साथ EVM पर बटन दबाएंगे? सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या बंगाल में दीदी का जादू बरकरार है? क्या बीजेपी अपनी रणनीति के दम पर दीदी को सत्ता में आने से रोक पाएगी? क्या इस बार बंगाल में बीजेपी का मुख्यमंत्री शपथ लेगा ? बंगाल पॉलिटिक्स में दशकों राज करने वाली लेफ्ट और कांग्रेस कहां हैं? क्या हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी की जोड़ी पश्चिम बंगाल में पूरा खेल पलट देगी? बंगाल की 294 सीटों के लिए दो चरणों में मतदान होना है. 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग है और नतीजे 4 मई को आएंगे. बंगाल की लड़ाई दूर से जितनी सरल और सपाट दिख रही है . वैसी, जमीन पर बिल्कुल नहीं है. बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में जब आप लोगों को टटोलना शुरू करेंगे – तो कुछ क्षेत्रों में TMC आगे लग सकती हैं. लेकिन, BJP भी बहुत पीछे नहीं लगेगी. Close Fight की स्थिति में कई सीटों पर तीसरी ताकत खेल बनाती-बिगाड़ती दिख रही है. लेफ्ट और कांग्रेस चुनावी अखाड़े में तो हैं– लेकिन, लोगों के बीच बहुत चर्चा में नहीं हैं. बंगाल में अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए हर तरह के दांव आजमाए जा रहे हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में ममता बनर्जी यानी TMC के खिलाफ चार्जशीट जारी किया. जिसमें कटमनी से घुसपैठियों को संरक्षण और भ्रष्टाचार से तृष्टिकरम के मुद्दे को धार दी गई है. इसी तरह, ममता बनर्जी भी अटैक इज बेस्ट डिफेंस की रणनीति पर आगे बढ़ रही हैं. वो अपनी सरकार की लोककल्याणकारी योजनाओं और बंगाली अस्मिता के मुद्दे पर सत्ता में वापसी की स्क्रिप्ट आगे बढ़ा रही हैं . ऐसे में आज समझने की कोशिश करेंगे कि बंगाल को लेकर बीजेपी इतनी कॉन्फिडेंट क्यों है? बंगाल की चुनावी जमीन में बीजेपी रणनीतिकार आखिर कौन सा खाद-पानी मिला रहे हैं – जिससे प्रचंड बहुमत से कमल खिल सके ? ममता की चौथी पारी वाली राह में कहां-कहां स्पीड ब्रेकर्स हैं? फाइटर दीदी के सामने अबकी बार कितनी कड़ी फाइट है? मुस्लिम वोट एकतरफा जाएगा या फिर बंटेगा ? बंगाल की राजनीति से लेफ्ट कैसे हुआ आउट और दीदी के हाथों में कैसे आई सत्ता?
पश्चिम बंगाल में सरकार बनाना बीजेपी का बहुत पुराना सपना रहा है . भारतीय जनसंघ के जमाने का…डॉक्टर श्मामा प्रसाद मुखर्जी के जमाने का…पश्चिम बंगाल की सियासी जमीन और वहां का सामाजिक ताना-बाना हिंदुत्वादी बिग्रेड को बहुत सूट करता था . आजादी के बाद बंगाल के पहले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ को 9 सीटों पर कामयाबी मिली. पहले कांग्रेस…उसके बाद लेफ्ट…फिर टीएमसी. बंगाल की जमीन पर हिंदुत्ववादी ब्रिगेड कुछ खास नहीं कर पायी. लेकिन, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और अमित शाह के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद बंगाल बीजेपी की प्राथमिकता सूची में टॉप पर आ गया…अमित शाह ने बंगाल की जमीन में कमल के लिए खाद-पानी मिलाना शुरू किया . नतीजा ये रहा कि 2011 के बंगाल चुनाव में जिस बीजेपी का खाता तक नहीं खुल पाया…वो बीजेपी 2016 में 6 सीटों पर पहुंची और 2021 में 77 सीटों पर कमल खिल गया . बीजेपी रणनीतिकारों का अनुमान है कि अबकी बार बंगाल की जमीन पर प्रचंड बहुमत से कमल खिलेगा . दरअसल, बीजेपी को हिंदुत्व + विकास + एंटी इनकंबेंसी की वजह से अपने लिए उम्मीद दिख रही है . उत्तरी बंगाल में बीजेपी की राजनीतिक जमीन मजबूत मानी जा रही है..बीजेपी नेता लोगों को डबल इंजन सरकार के फायदे गिना रहे हैं . लेकिन, चुनौतियां भी कम नहीं हैं . ऐसे में अमित शाह ने कोलकाता से साफ कर दिया कि बीजेपी किस तरह से TMC को घेरेगी?
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जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल में वोटिंग की तारीख नजदीक आती जा रही है - चुनावी तापमान बढ़ता जा रहा है . टीएमसी और बीजेपी के महारथी एक-दूसरे पर प्रहार के लिए तरकश से नए-नए तीर निकाल रहे हैं . कोलकाता की जमीन से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने TMC सरकार के खिलाफ चार्जशीट जारी की..इस अभियोगनामा के जरिए बीजेपी सूबे की ममता सरकार के 15 साल के शासन के तौर-तरीकों पर सवाल खड़ा कर रही है .
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चार्जशीट पॉलिटिक्स के जरिए बीजेपी बंगाल के लोगों से पूछ रही है कि भय को चुनना है या भरोसे को … बीजेपी की नई रणनीति ने बैटल ऑफ बंगाल को बहुत दिलचस्प बना दिया है. अक्सर कहा जाता है कि इश्क और जंग में सब जायज है . बीजेपी महारथियों को लग रहा है कि बंगाल में चुनावी हवा उनके पक्ष में है . बीजेपी खासतौर से शहरी मध्यम वर्ग, उत्तर बंगाल, गैर-बंगाली वोटर और
हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही है . बंगाल में बीजेपी नेताओं के कॉन्फिडेंस की कई वजहें हैं … पार्टी रणनीतिकारों की सोच है कि महिलाएं और युवा बदलाव चाहते हैं. कानून-व्यवस्था के मुद्दे का फायदा मिलेगा, पहले की तुलना में संगठन मजबूत हुआ है, आक्रामक कैंपेन रणनीति से लोग बीजेपी के साथ जुड़ेंगे .
बीजेपी अगर आक्रामक प्रचार रणनीति के सहारे TMC को घेरने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए है…तो ममता बनर्जी भी अपने चिर-परिचित अंदाज में पलटवार कर रही हैं . राजनीति की मंझी खिलाड़ी ममता बनर्जी खतरे को अच्छी तरह समझ रही हैं..वो भी जानती हैं कि चुनाव में कुछ भी नामुमकिन नहीं है . ममता बनर्जी को अंदाजा है कि बंगाल की राजनीति में पिछले 10 वर्षों में बीजेपी किस रफ्तार से मजबूत हुई और उन्हें सीधी चुनौती दे रही है…2016 के बंगाल चुनाव में बीजेपी को 6 सीटों पर कामयाबी मिली…वहीं, 2021 में बीजेपी की सीटें बढ़कर 77 पर पहुंच गयीं .
बीजेपी रणनीतिकार बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और काम पर वोट मांग रहे हैं…स्थानीय नेतृत्व के नाम पर BJP के पास बंगाल में शुभेंदु अधिकारी, दिलीप घोष, सुकांत मजूमदार, लॉकेट बनर्जी … सामिक भट्टाचार्य जैसे नेता हैं . लेकिन, बंगाल पॉलिटिक्स में इसमें से कोई भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की लोकप्रियता और शख्सियत के सामने टिकता नहीं दिख रहा है…ऐसे में बंगाली मानुष के बीच ये भी चर्चा हो रही है ममता बनर्जी की टक्कर में बीजेपी से कौन? TMC ठोस रणनीति के साथ बीजेपी को बंगाली अस्मिता के मुद्दे पर घेर रही है और बीजेपी को बाहरी बताने में जुटी है. ग्रामीण क्षेत्रों बीजेपी की पकड़ उस तरह की नहीं है…जैसी TMC की मानी जाती है. ऐसे में बीजेपी आक्रमक प्रचार के जरिए एक ऐसी रणनीति पर बढ़ती दिख रही है –जिससें वोटों के ध्रुवीकरण के लिए खिड़की-दरवाजे खुल जाएं . वहीं, ममता बनर्जी भी चौथी बार अपनी जीत को लेकर बहुत कॉन्फिडेंट हैं . उन्हें लग रहा है कि उनका वेलफेयर मॉडल और बंगाली अस्मिता कार्ड बीजेपी के हर दांव को फेल कर देगा. TMC कार्यकर्ता प्रचार कर रहे हैं कि बीजेपी सत्ता में आई तो बंगाली मानुष को जबरन वेजिटेरियन यानी शाकाहारी बना देगी…बंगाल में माछ-भात सामान्य खानपान है . बंगाल में नवरात्रि में पशु बलि की परंपरा है . ऐसे में उत्तर भारत से बंगाल का मिजाज थोड़ा अलहदा है . टीएमसी ने सूबे की बड़ी आबादी को अपने साथ जोड़े रखने के लिए लक्ष्मी भंडार स्कीम का ऐलान किया है, इसके तहत सामान्य महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये और SC/ST को 1700 रुपये देने की बात कही गई है. वहीं, बेरोजगार युवाओं को हर महीने डेढ़ हजार रुपये पॉकेट मनी का वादा भी किया गया है .
बंगाल के लोगों के दिल में उतरने का हुनर ममता बनर्जी को बहुत अच्छी तरह आता है…शायद यही वजह है कि चुनाव दर चुनाव विधानसभा में उनकी सीटें बढ़ती गईं . टीएमसी को साल 2011 में 184 सीटें मिलीं, साल 2016 में सीटें बढ़कर 211 हो गईं, वहीं, 2021 में सूबे में बीजेपी के ग्राफ में बड़े उछाल के बाद भी टीएमसी की सीटें 215 पर पहुंच गयीं… मतलब, विधानसभा चुनाव में दीदी का जादू बरकरार रहा . टीएमसी ने बंगाल की सत्ता में चौथी पारी के लिए कई लुभावने वादों के चुंबक से वोट खींचने की रणनीति को आगे बढ़ाया है, जिसमें-
- लक्ष्मी योजना के जरिए महिलाओं के लिए हर महीने कैश
- युवा साथी योजना के तहत बेरोजगार युवाओं के लिए हर महीने पॉकेट मनी
- 30 हजार करोड़ से किसानों और खेती को मदद
- हर परिवार को पक्का घर
- हर घर में पीने का साफ पानी
- स्वास्थ्य सुविधाओं और सरकारी स्कूलों में सुधार
- सात नए जिले बनाने का वादा किया है .
बंगाल में बीजेपी को रोकने के लिए ममता बनर्जी बड़ी चुतराई से एक ओर SIR के मुद्दे को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रही हैं…दूसरी ओर, बंगाली अस्मिता को ड्राइविंग सीट पर ला तक बीजेपी को बाहरी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं . यही वजह है कि बंगाल चुनावी मछली भी बड़ा मुद्दा बन गयी है . ममता बनर्जी जानती है कि 15 वर्षों का शासन कम नहीं होता है . ऐसे में जिन लोगों के सपने पूरे नहीं हुए..जिन क्षेत्रों में लोगों के दुख-दर्द कम नहीं हुए… वहां लोगों की नाराजगी स्वभाविक है . ऐसे में ममता बनर्जी ने एंटी इनकंबेंसी से निपटने के लिए TMC के एक तिहाई सीटिंग विधायकों का टिकट काटने में भी हिचक नहीं दिखाई .
बंगाल की 294 सीटों के लिए ममता बनर्जी की टीएमसी खासतौर से महिला + मुस्लिम वोट + ग्रामीण गरीब + बंगाली अस्मिता से जुड़े मुद्दे को आगे कर चौथी बार सत्ता में आने के लिए तूफानी रणनीति के साथ आगे बढ़ रही हैं. ममता बनर्जी के सामने बड़ी चुनौती ये है कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए..कानून-व्यवस्था भी सवालों में आईं . बीजेपी टीएमसी की इस कमजोर नस पर लगातार प्रहार कर रही है . वहीं, बंगाल के मौजूदा समीकरणों में TMC को इस बार वोटों के बंटने का डर भी सता रहा है .
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की छवि एक फाइटर की है . 15 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी उनके रहन-सहन और तेवर में कोई खास बदलाव नहीं दिखता . लेकिन, उनके शासन में बंगाल में कई घोटाले भी सामने आए … ऐसे में बीजेपी बंगाल चुनाव में भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है . ममता बनर्जी अपने किले को बचाए रखने के लिए एक साथ कई समीकरणों को साधने की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही हैं…जिसमें महिला+मुस्लिम वोट+बेरोजगार युवा+ग्रामीण गरीब शामिल हैं. एंटी इनकंबेंसी के खतरे को शायद ममता भी कुछ हद तक महसूस कर चुकी हैं. यही वजह है कि टीएमसी ने 75 सीटिंग विधायकों का टिकट काटा है..लेकिन, बंगाल में TMC के सामने बड़ी चुनौती असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और हुमायूं कबीर की AJUP यानी आम जनता उन्नयन पार्टी के बीच गठबंधन से पैदा हुआ है. ये गठबंधन 182 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है. पश्चिम बंगाल की आबादी में मुस्लिम वोटरों की हिस्सेदारी करीब 27 फीसदी है… सूबे की करीब 100 से 110 सीटों पर जीत-हार का फैसला करने में मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में हैं…2021 के बंगाल चुनाव में 25 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाली सीटों में से 80 फीसदी पर TMC उम्मीदवार जीते … इस बार असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर की पार्टी के हाथ मिलाने के बाद मुस्लिम वोट के बंटने का खतरा पैदा हो गया है…हिसाब लगाया जा रहा है कि मुस्लिम वोटों के बंटने की स्थिति में किसे फायदा और किसे नुकसान हो सकता है.
बैटल ऑफ बंगाल में असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर की पार्टी के बीच गठबंधन से मुस्लिम वोटरों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गयी हैं..पिछले 15 साल से मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी की पार्टी TMC के खाते में जाता था .लेकिन, अब मुस्लिम वोटों के बंटने का चांस बढ़ गए हैं. पश्चिम बंगाल में हर तीसरा वोटर मुस्लिम समुदाय से है. मुर्शिदाबाद में 66%, मालदा में 51%, उत्तर दिनाजपुर में 50%, बीरभूम में 37%, दक्षिण 24 परगना में 35%, नादिया में 27% मुस्लिम वोटरों की हिस्सेदारी है . एक स्टडी के मुताबिक, 2021 के बंगाल चुनाव में 25% से अधिक हिस्सेदारी वाले मुस्लिम बहुत क्षेत्रों में से 80% पर टीएमसी उम्मीदवार चुनाव जीते .
मसलन, मुर्शिदाबाद की 20 सीटों में से 18 टीएमसी के खाते में गईं और 2 बीजेपी के खाते में … मालदा की 12 सीटों में से 8 TMC को मिली और 4 पर कमल खिला. उत्तर दिनाजपुर की 9 सीटों में से 7 पर TMC उम्मीदवार जीते… वहीं, 2 पर बीजेपी उम्मीदवारों को कामयाबी मिली . बीरभूम की 11 सीटों में से 10 टीएमसी के खाते में गईं तो एक पर कमल खिला . मतलब, मुस्लिम बहुल सीटों पर TMC का स्ट्राइक रेट बहुत बेहतर रहा है. लेकिन, इसबार असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और हुमायूं कबीर की AJUP के मिलकर चुनावी अखाड़े में उतरने से मुस्लिम वोटों का बंटना तय माना जा रहा है. हुमायूं कबीर बाबरी मस्जिद के जरिए मुस्लिमों को साधने की जुगत में हैं. मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में पहले ही वो इसकी नींव रख चुके हैं. ऐसे में मुस्लिम वोटों के बंटने पर TMC को नुकसान पहुंच सकता है .
नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट भी अपना गणित लगा रही है. कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां भी अलग-अलग बंगाल में किस्मत आजमा रही हैं. ये दोनों पार्टियां भी मुस्लिम वोटबैंक में दावेदार रही हैं … ममता बनर्जी ने टीएमसी के टिकट से 47 मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा है . माना जा रहा है कि इस बार बैटल ऑफ बंगाल में मुस्लिम वोट के कई दावेदार एक साथ मैदान में हैं- ऐसे में काटें की टक्कर वाली सीटों पर मुस्लिम वोट में बिखराव सत्ता समीकरण इधर-उधर कर सकता है .
बीजेपी जोरशोर से घुसपैठियों का मुद्दा उठा रही है…तो ममता बनर्जी ने SIR यानी Special Intensive Revision के मुद्दे को बहुत जोर-शोर से उठाया . अब तक जांच के दायरे में आए 32 लाख नामों में से 13 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं…चुनाव आयोग के मुताबिक, 60 लाख से अधिक नाम अंडर एडजुडिकेशन डाले गए थे… जिसमें 32 लाख मामलों का निपटारा हुआ है . वहीं, करीब 28 लाख मामले अभी पेंडिंग हैं…SIR में नाम कटने का असर भी बंगाल के चुनावी नतीजों पर दिख सकता है . साल 2011 के बंगाल चुनाव से TMC और BJP की सीटें लगातार बढ़ी हैं . लेकिन, ये भी हैरानी की बात है कि 2021 के बंगाल चुनाव में लेफ्ट और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला..इस बार दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं…सवाल उठता है कि अबकी बार लेफ्ट और कांग्रेस का क्या होगा? इस यक्ष प्रश्न का जवाब तो 4 मई को चुनाव के नतीजों के साथ मिलेगा. लेकिन, बंगाल में ममता बनर्जी किस तरह सत्ता में आईं और वहां की राजनीति का चरित्र कैसा रहा है? इसे भी समझना जरूरी है .
आजादी के साथ बंगाल दो हिस्सों में बंटा- पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान को मिला और पश्चिम हिस्सा भारत के पास रहा . मालदा, मुर्शिदाबाद और नादिया जैसे मुस्लिम बहुत इलाकों को पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया… लाखों की तादाद में पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थी भागकर सरहदी इलाकों में पहुंचे. उस दौर में बंगाल में तीन सियासी धाराएं एक साथ चल रही थीं कांग्रेस…मध्यमार्गी यानी बीच का रास्ता लेते हुए पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज थी . हिंदू महासभा…दक्षिणपंथी, हिंदुत्व के नाम पर लोगों को अपने साथजोड़ने में पूरी शिद्दत से लगी हुई थी . भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी…वामपंथी, गरीबोंके हक और हुकूक के नाम पर क्रांति का सपना दिखा रही थी .
आजादी के बाद बंगाल में हुए पहले चुनाव में 150 पर कांग्रेस को कामयाबी मिली. सीपीआई को 28 तो भारतीय जनसंघ के 9 सीटें मिलीं. सूबे कमान मिली बिधान चंद्र रॉय को…लेकिन, कम्युनिस्ट भी बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करते रहे..1962 में बिधान चंद्र राय के निधन के बाद बंगाल कांग्रेस में अंदरुनी खटपट खुलकर सामने आने लगी…आंदोलन के मिजाज वाले बंगाल में अलग-अलग क्षेत्रों में लोग आवाज बुलंद करने लगे . नक्सलबाड़ी से चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने बंदूक के दम पर संघर्ष का रास्ता चुना . दूसरी ओर, कांग्रेस से टूटकर बांग्ला कांग्रेस बनाने वाले अजॉय मुखर्जी ने कम्युनिस्टों के साथ मिलकर सरकार बनाई..जिसमें ज्योति बासु उप-मुख्यमंत्री बने .
साल 1977 में पश्चिम बंगाल में वामपंथी अपने दम पर सत्ता में आ गए … मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे वामपंथ का सम्य चेहरा ज्योति बासु… उन्होंने बंदूक के दम पर क्रांति की जगह बांग्ला, बंगालियत और लोगों की रोजी-रोटी से जुड़े मुद्दों को पार्टी के एजेंडे में जोड़ा..ऐसे में लोगों ने लेफ्टफ्रंट को जमकर वोट दिया. बंगाल की बदली आबोहवा में लेफ्ट फ्रंट सरकार ने दो बड़ी जमात तैयार कर दी … एक वो किसान जिन्हें ऑपरेशन बर्गा के तहत जमीन का मालिकाना हक मिला … दूसरा, ऐसे लोग जिन्हें पंचायतों के जरिए सत्तामें प्रतिनिधित्व मिला . सरकार और समाज पर मजबूत पकड़ बना चुके कम्युनिस्ट सूबे की हर समस्या को अपने चश्मे से देखने लगे . कामरेड ज्योति बसु के हाथों में 23 वर्षों तक बंगाल की कमान रही…उनके इस्तीफे के बाद बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे बुद्धदेव भट्टाचार्य . उन्होंने New Left का नारा दिया और बंगाल को नंबर वन बनाने के लिए उद्योगों की एंट्री का रास्ता खोलने की चाह चुनी.
बंगाल में ममता बनर्जी लंबे समय से लेफ्ट से लोहा ले रही थी . वो तृणमूल कांग्रेस बना चुकी थी…टाटा मोटर्स की लखटकिया कार नैनो के कारखाने के लिए सिंगूर में जमीन अधिग्रहण शुरू हुआ तो ममता बनर्जी किसानों के साथ खड़ी हो गईं…बुद्धदेव सरकार बंगाल के नक्शे पर एक साथ कई स्पेशल इकॉनॉमिक जोन का सपना देख रही थी..विरोध की वजह से नंदीग्राम और सिंगूर में जमीन अधिग्रहण बड़ी चुनौती बन गया … नतीजा ये निकला की TMC दिनों-दिन मजबूत होती गई . मां-माटी और मानुष का नारा देते हुए ममता बनर्जी 2011 में बंगाल की सत्ता में आईं और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं . उसके बाद से ममता अपने चिर-परिचित अंदाज में बंगाल को चला रही है और वहां की सत्ता में बनी हुई हैं . आजादी के बाद बंगाल को कांग्रेस ने अपने तरीके से आगे बढ़ाया . हिंदुत्वादी ब्रिगेड को भी बंगाल में अपने लिए संभावना शुरुआती दौर से दिख रही थी…बंगाल पॉलिटिक्स से डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय फलक पर पहुंचे…भारतीय जनसंघ की स्थापना की. आंदोलन और आक्रोश बंगालियों के DNA में है…नक्सलबाड़ी में किसानों ने जमींदारों के खिलाफ हथियार उठाया … कामरेड ज्योति बसु की अगुवाई में बंगाल का मिजाज भी दुनिया ने देखा . मजदूरों के हक-हकूक की बातें इतनी जोर-शोर से हुईं कि फैक्ट्री और कारखानों के शटर गिरने लगे . आर्थिक तरक्की की दौड़ में पिछड़ते बंगाल के दर्द को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने समझा . लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी थी . सिंगूर और नंदीग्राम की जमीन से ममता बनर्जी ने ऐसा आंदोलन छेड़ा कि लेफ्ट को सत्ता के उखाड़ कर दम दिया . बंगाल की राजनीति का एक मिजाज ये भी है कि लोग चुपचाप वोट कर खेल पलट देते हैं. बंगाल के लोगों के जेहन में क्या चल रहा है? इसे न तो ठीक से TMC रणनीतिकार पढ़ पा रहे हैं और ना बीजेपी के महारथी . अभी तो सिर्फ वोटों के गणित पर काम चल रहा है…लेकिन, वोटिंग से पहले कौन सा रसायन किस तरह का रिएक्शन पैदा कर देगा. भविष्यवाणी करना मुश्किल है. आंदोलन,आक्रोश और हड़ताल से इतर भी बंगाल का एक मिजाज है . बंगाल बुद्धिजीवियों की जमीन रही है . कोलकाता ने देश को चार नोबेल पुरस्कार विजेता दिए . इसी शहर में पले-बढ़े रविंद्र नाथ टैगोर को साहित्य का…कोलकाता को कर्मभूमि बनाने वाली मदर टेरेसा को शांति का..वहां की आबोहवा से निकले अमर्त्य सेन और अभिजीत बनर्जी को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला. कहा जाता है कि बंगाल जो आज सोचता है, वो पूरा भारत बाद में सोचता है.अब पूरे देश की नजरें इस ओर हैं अबकी बार किसकी सरकार बनवाने के लिए बंगाल के लोग सोच रहे हैं?