अयोध्या फिर चर्चा में है . बहुत चर्चा में…शायद हमेशा चर्चा में बने रहना अयोध्या की नियति है . त्रेतायुग में जब श्रीराम का वनवास हुआ तब भी अयोध्या चर्चा में रही , जब श्रीराम अयोध्या के राजा बने, तब भी वहां से निकले आदर्श शासन सूत्र की पूरी दुनिया में चर्चा हुई , श्रीराम और रामराज्य में दुनिया ने अपना कल्याण देखा . सरयू किनारे बसी अयोध्या हजारों साल से सबको अपनी ओर सम्मोहित करती रही है . ये सिर्फ एक प्राचीन नगर या शहर भर नहीं है . सदियों से अयोध्या हर परिभाषा से ऊपर की चीज रही है . भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का बीज केंद्र की तरह रही है . चाहे हिंदू धर्म हो,बौद्ध धर्म हो,जैन धर्म हो या सिख धर्म,सबका अयोध्या से गहरा नाता है .
मैं अयोध्या हूं,
अयोध्या की कहानी कहां से शुरू की जाए,ये भी एक बहुत मुश्किल काम है . अयोध्या की जड़ें कितनी गहरी हैं और इस नगरी की शुरुआत कहां से होती है? प्राचीन ग्रंथों में अयोध्या का जगह-जगह जिक्र मिलता है. त्रेतायुग के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और उनके पिता दशरथ के दौर से भी बहुत पुराना माना जाता है- अयोध्या का इतिहास. मान्यता के मुताबिक, अयोध्या की स्थापना प्रथम पुरुष मनु ने की, जिनके पुत्र हुए इक्ष्वाकु. सूर्यवंश में कई प्रतापी राजा हुए, इसी वंश के 63वें शासक थे श्रीराम के पिता दशरथ. 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक वेदों की रचना हुई, अथर्ववेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया है और इसकी भव्यता की तुलना स्वर्ग से की गई है . अथर्ववेद में अयोध्या को 8 चक्रों और नौ द्वारों वाली नगरी बताया गया है,वहीं, स्कंदपुराण के मुताबिक अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है.
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अयोध्या के हर बदलाव की गवाह रही है - सरयू की कल-कल बहती धारा, सरयू की लहरों ने अयोध्या का प्राचीन वैभव भी देखा है,उस रामराज्य को भी देखा है, जिसे साकार करने का सपना दुनिया का हर सभ्य समाज देखता है . अयोध्या के नाम पर राजनीति की प्रचंड धारा देखी , तो भव्य-दिव्य राम मंदिर का निर्माण भी . इतिहास के हर कालखंड में अयोध्या चर्चा में रही - मानव सभ्यता के हर मोड़ पर लोगों ने आदर्श सामाजिक व्यवस्था का फलफला अयोध्या के जर्रें-जर्रें से सीखा..अयोध्या ने लोगों को मर्यादित होना सिखाया..अधिकार और कर्तव्य का मंत्र पढ़ाया . अब सवाल उठता है कि अयोध्या आखिर कितना प्राचीन नगर है, जिसकी मिट्टी पर श्रीराम पैदा हुए . अयोध्या की कहानी कहां से शुरू होती है .
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मान्यता के मुताबिक, विवस्वान यानी सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु ने अयोध्या की स्थापना की . वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे,जिसमें सबसे ज्यादा प्रतापी इक्ष्वाकु हुए, इक्ष्वाकु कुल का सबसे ज्यादा विस्तार हुआ और ये सूर्यवंशी कहलाए . इसी वंश में श्रीराम पैदा हुए, सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी अयोध्या थी,जिसके वैभव की तुलना स्वर्ग से की गयी है .
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अंतिम वेद अथर्ववेद ने अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है,इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई,अयोध्या को पवित्र सप्तपुरी कहा गया..जिसमें अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारका है . ज़ाहिर है अथर्ववेद के समय अयोध्या अस्तित्व में थी , इसी तरह वाल्मीकि रामायण के बालकांड में भी अयोध्या का वर्णन है . वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, अयोध्या 12 योजन लंबी और 3 योजन चौड़ी थी मतलब 96 मील में फैली हुई थी .
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श्रीराम के पिता दशरथ इक्ष्वाकु वंश के 63वें राजा थे, वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, राजा दशरथ ने अपनी अयोध्या को देव-लोक की राजधानी अमरावती की तरह सजाया था. अयोध्या में कोई गरीब था ही नहीं,बल्कि, कम धन वाले भी नहीं थे . चारों ओर खुशहाली और संपन्नता थी,आपसी सौहार्द और एक-दूसरे के प्रति सम्मान ने अयोध्या पुरी को धरती पर अलौकिक बना दिया था .
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त्रेतायुग से बौद्ध काल तक का सफर
वेद और रामायण के काफ़ी बाद पुराण लिखे गए, पुराणों में भी अयोध्या का ज़िक्र है,स्कंदपुराण के मुताबिक अयोध्या शब्द 'अ' कार ब्रह्मा, 'य' कार विष्णु है तथा 'ध' कार रुद्र का स्वरूप है . जो भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है यानी अयोध्या का अस्तित्व सनातन काल से है . इस बात से कोई इनकार नहीं है कि प्राचीन काल में अयोध्या नाम का शहर था ,जिसके राजा श्रीराम थे , कुछ विद्वानों प्राचीन भारतीय ग्रंथों के आधार पर अयोध्या की स्थापना का काल ईसा पूर्व 2200 के आसपास माना है.
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का जिक्र मिलता है. उनके सूर्यवंश की पताका चारों ओर फहरा रही थी. लेकिन, श्री राम के बैकुंठ धाम जाने के बाद अयोध्या साम्राज्य का क्या हुआ? इसे लेकर कई मान्यताएं हैं . एक मान्यता के मुताबिक, श्रीराम ने अयोध्या साम्राज्य को 8 हिस्सों में बांट दिया और अपने पुत्र लव को उत्तर कौशलपुरी का राजा बनाया..कुश को दक्षिण कौशल नगरी का. अपने भाइयों के पुत्रों के भी एक-एक क्षेत्र सौंप दिया. रामायण और महाभारत काल में भी अयोध्या का अस्तित्व था , ईसा पूर्व 322 से 185 तक यानी मौर्य काल तक अयोध्या का महत्व कायम रहा. त्रेतायुग के बाद द्वापर युग शुरू होता है,जिसमें श्रीकृष्ण पैदा हुए,जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं. ये वो दौर था - जिसमें भारत के नक्शे पर कई छोटे-बड़े राजवंशों का शासन था . इसी दौर में पांडवों और कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र में 18 दिनों का भीषण युद्ध चला , उस दौर में भारत के नक्शे पर दिख रहे राज्यों ने अपने हिसाब से पाला चुन रखा था. कहा जाता है कि महाभारत के बाद अयोध्या एक तरह से उजड़ गयी..लेकिन, श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व बना रहा. इतिहासकारों के मुताबिक, गौतम बुद्ध के दौर में जिसे साकेत कहा गया,वो अयोध्या नगरी ही थी .
ईसा पूर्व 5वीं सदी यानी गौतम बुद्ध के काल तक अयोध्या की स्थापना पवित्र तीर्थ के रूप में हो गई थी, लेकिन, मौर्य काल में राजनीतिक केंद्र के रूप में पाटलिपुत्र अहम था,मौर्य काल में सम्राट अशोक के बाद बौद्ध धर्म का अधिक ज़ोर रहा..अयोध्या भी बौद्ध धर्म के प्रभाव में रही .
विक्रमादित्य ने कराया मंदिर का निर्माण
बात करीब 2100 साल पुरानी है . उज्जैन के सिंहासन पर थे- चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य , एक दिन शिकार खेलते हुए विक्रमादित्य अयोध्या पहुंच गए, सरयू के किनारे . आसपास घना जंगल था . एक आम के पेड़ के नीचे अपनी सेना के साथ विक्रमादित्य आराम करने लगे,आसपास कोई बसावट नहीं . लेकिन, विक्रमादित्य को जमीन में कुछ चमत्कार जैसा लगा, कहा जाता है कि खोज शुरू हुई तो पता चला कि यह श्रीराम की अवध भूमि है . महाराज विक्रमादित्य के आदेश पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया.कहा जाता है कि श्रीराम जन्मभूमि पर 84 स्तंभों पर विशाल मंदिर का निर्माण हुआ..जिसकी भव्यता और दिव्य देखते ही बनती थी . विक्रमादित्य के बाद के राजाओं ने भी मंदिर की देख-रेख की .
हिंदू धर्म का उत्कर्ष मौर्य काल के बाद शुंग वंश में भी दिखता है,शुंग वंश के पहले राजा पुष्यमित्र ने भी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था,उस का एक शिलालेख अयोध्या से मिला था . कई अभिलेख और ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि गुप्तवंशीय चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय और उसके बाद अयोध्या गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी. इस दौर के महाकवि कालिदास ने अयोध्या का रघुवंश में कई बार जिक्र किया है . मतलब, गुप्त काल तक श्रीराम वाल्मिकी रामायण से निकलकर आमलोगों के बीच पहुंचने के लिए तैयार थे .
इतिहासकार हांस टी बेकर अपनी किताब अयोध्या में लिखते हैं कि दूसरी शताब्दी आते-आते अयोध्या अहम तीर्थ स्थान बन चुकी थी . सरयू नदी के मोड की वजह से वजह अयोध्या तीन तरफ पानी से घिरी थी,सरयू की लहरों से टकराते जमीन के केंद्र को राम कोट के नाम से जाना जाता था , 7 वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया,तब भारत पर प्रतापी राजा हर्षवर्धन का शासन था..ह्वेनसांग करीब 15 वर्षों तक भारत में रहा . भारत प्रवास के दौरान वो अयोध्या भी गया. उस दौर में अयोध्या बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र हुआ करता था , ह्वेनसांग ने अपने अनुभवों को सी-यू-की नाम की किताब में लिखा . इसे एक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज के तौर पर देखा जाता है . ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में अयोध्या के चार प्रमुख बौद्ध वनों यानी उत्तर कारू वन, अंजन वन, कालका राम वन और कंटकी वन के साथ-साथ कई मंदिरों का भी जिक्र किया. हर्षवर्धन के बाद छोटे-छोटे इलाकों पर राजपूत राजाओं का प्रभुत्व कायम हुआ, जिनके पूज्य थे- क्षत्रिय कुलश्रेष्ठ श्रीराम . राजाओं के आराध्य श्री राम आम लोगों में भी परम पूज्य हो गए,मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने तेजी से सामाजिक जीवन में जगह बनानी शुरू कर दी . 13वीं सदी में रामानंद संप्रदाय ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सामाजिक क्रांति का सूत्रधार बना दिया,बाद में इसी धारा से कबीर और तुलसीदास निकले .
एक ओर तुलसीदास की चौपाइयां हिंदू समाज में सांस्कृतिक जागरण का झंडा बुलंद कर रही थीं..दूसरी ओर, हिंदुस्तान की सरज़मीं पर पश्चिम से आए विदेशी आक्रमणकारियों का राज कायम हो रहा था,हिंदुओं के हाथों से सत्ता फिसल चुकी थी,हिंदू अब प्रजा थे और पश्चिमी से आए आक्रमणकारी राजा .
10वीं सदी तक हिंदुस्तान के नक्शे पर छोटे-छोटे हिंदू राजाओं का राज था, ये आपस में लड़ते रहते, मौर्य या गुप्त राजाओं की तरह कोई शक्तिशाली केंद्रीय ताकतें नहीं थीं , मुस्लिम आक्रमणकारियों को इसका फ़ायदा मिला ,ऐसी परिस्थिति में राम ने हिंदुओं के सांस्कृतिक एकीकरण में सीमेंट का रोल अदा किया, अयोध्या इसकी बुनियाद बनी . मध्यकाल से पहले ही हिंदू ग्रंथों में अयोध्या और श्रीराम की महिमा स्थापित हो चुकी थी, अयोध्या स्वर्ग सरीखी थी और मोक्ष नगरी के रूप में परिभाषित हो चुकी थी , मध्यकाल में अयोध्या से हिंदुओं की आस्था को गहरा करने पर ज़ोर था . कई आक्रमण और तूफानों को झेलते हुए अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर 14 वीं शताब्दी तक खड़ा रहा,कहा जाता है कि सिकंदर लोदी के शासनकाल के दौरान भी वहां मंदिर मौजूद था,16वीं शताब्दी में हिन्दुस्तान पर मुगलों का अधिकार हो गया . पूर्वी उत्तर प्रदेश में अयोध्या के वैभव और महत्व को बताने के लिए एक कहावत प्रचलित है .
गंगा बड़ी गोदावरी,
तीरथ बड़ो प्रयाग,
सबसे बड़ी अयोध्या नगरी,
जहँ राम लियो अवतार,
मध्यकाल में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने हिंदुओं के सांस्कृतिक एकीकरण में सीमेंट का रोल अदा किया , अयोध्या इसकी बुनियाद बनी,1206 ईस्वी में मोहम्मद गौरी की मौत के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के सिंहासन पर बैठा, भारत में पहली बार गुलाम वंश की स्थापना हुई . इतिहासकारों के मुताबिक, 1320 से 1414 ईस्वी के बीच तुगलक काल में अयोध्या का काफी महत्व था. इतिहास के कई पड़ावों से गुजरते हुए अयोध्या आगे बढ़ रही थी,लेकिन, इस प्राचीन नगरी के ताने-बाने में बड़ी हलचल 16वीं शताब्दी में बाबर के आने के बाद शुरू हुई . इतिहासकार लाला सीताराम भूप ने अपनी किताब अयोध्या का इतिहास में लिखा है कि1528 ईस्वी में मुगल शासक बाबर ने अयोध्या से कुछ दूरी पर पूर्व की ओर तंबू ताना . बाबर के साथ उसका सेनापति मीर बाकी ताशकंदी भी था,अयोध्या के पास बाबर 7 दिनों तक रुका . लेकिन, इतिहासकार इस बात पर एक मत नहीं है कि बाबर अयोध्या आया या नहीं .
मुगल काल और बाबरी मस्जिद
वो साल 1526 का था, महीना अप्रैल का,पानीपत की लड़ाई में बाबर की सेना जीत गयी,इसी के साथ हिंदुस्तान में मुगल साम्राज्य की नींव पड़ी , मुगल बादशाह बाबर तेजी से आगे बढ़ रहा था , पानीपत की लड़ाई के दो साल बाद 1528 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद बननी शुरू हुई,जिसे बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाया . इतिहासकार सीताराम भूप ने अपनी किताब - अयोध्या का इतिहास में लिखा है कि बाबर राम - जन्मभूमि मंदिर को नहीं तोड़ना चाहता था,लेकिन, फकीर बददुआ न दे दे . इस डर से उसने जन्म-स्थान पर बने मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया..इसी किताब में तारीख पारीना मदीनतुल औलिया के हवाले से लिखा गया है कि बाबर अपनी किशोरावस्था में एक बार हिंदुस्तान आया था और अयोध्या के मुसलमान फकीरों से मिला . एक फकीर थे- फजल अब्बास कलंदर और दूसरे का नाम था मूसा अशिकाम. बाबर ने दोनों फकीरों से हिंदुस्तान का बादशाह बनने का आशीर्वाद मांगा. दोनों फकीरों ने कहा कि अगर तुम जन्मस्थान के मंदिर को तोड़कर मस्ज़िद बनवाने की प्रतिज्ञा करो तो हम तुम्हारे लिए दुआ करेंगे . बाबर ने फ़कीरों की बात मान ली.
हालांकि, बाबर के बारे में इस कहानी पर इतिहासकारों को संदेह है. बाबरनामा में भी उसके अयोध्या जाने का कहीं जिक्र नहीं मिलता है , इस किताब में बाबर के युद्घ-अभियानों से लेकर हिंदुस्तान में मौसम के मिजाज तक का जिक्र है . खेती-बाड़ी के तौर-तरीकों से लेकर पके हुए कटहल के स्वाद तक का जिक्र किया गया है . लेकिन, इतिहासकारों का एक बड़ा तपका मानता है कि बाबर अयोध्या आया था .
इतिहासकारों और आर्कियोलॉजिस्ट के अध्ययन बताते हैं कि एक मंदिर के अवशेष पर विवादित ढांचे खड़ा किया गया ,लेकिन, इतिहास में कहीं इस बात का जिक्र नहीं मिलता कि अयोध्या का विवादित ढांचा मध्यकाल में मुस्लिमों के लिए कितना महत्वपूर्ण स्थान था .
मुगलकाल में बाबर के बाद अकबर के राज में अवध क्षेत्र का महत्व बहुत बढ़ गया,गंगा के उत्तरी भाग को पूर्वी क्षेत्रों और दिल्ली-आगरा को बंगाल से जोड़ने वाला रास्ता अयोध्या से होकर गुज़रता था , इसलिए अकबर ने जब 1580 ईस्वी में अपने साम्राज्य को 12 सूबों में बांटा तो उसने अवध को एक सूबा बनाया और उसकी राजधानी अयोध्या बनी . अकबर की जीवनी लिखने वाले अबुल फजल ने आईने अकबरी में लिखा है .
अयोध्या जिसे आमतौर पर अवध के नाम से जाना जाता है, जो पूरब में चालीस कोस और उत्तर में बीस कोस तक फैली है, इसे भूमि का एक पवित्र टुकड़ा माना जाता है . यह अवध देश के सबसे बड़े नगरों में से एक है और इसकी मान्यता सबसे प्राचीन शहरों में से एक है . यह त्रेतायुग में रामचंद्र जी का निवास था, जिन्हें उनके शासन और धर्मनिष्ठा के लिए आदर्श माना जाता है . अकबर ने हिंदुओं में श्रीराम की आस्था देखते हुए राम और सीता की आकृति वाली मोहरें जारी की थी .
अकबर के दौर में एक ओर तेजी से मुगल साम्राज्य का विस्तार हो रहा था, दूसरी ओर, इसी दौर में तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की,अवधी राम साहित्य की भाषा बन गयी..तुलसीदास के रामचरित मानस का घर-घर पाठ होने लगा . तुलसीदास ने अपने ग्रंथ राम चरितमानस में कहीं भी अयोध्या में बाबर के अत्याचार का जिक्र नहीं किया है , न ही बाबर के सेनापति मीरबाकी के मंदिर तोड़कर मस्ज़िद बनाने का वर्णन किया है .
अयोध्या का मतलब होता है – जिसके जीतने की संभावना न हो . इतिहास का पन्ना पलटता गया, सरयू की धारा गवाह है कि अब तक कोई अयोध्या को जीत नहीं पाया है. हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के केंद्र में अयोध्या रही, सभी धर्मों को मानने वाले लोगों ने अयोध्या को अपनी आस्था और अपने इष्ट देवता के हिसाब से देखा, समझा और स्वीकार किया .
मैं अयोध्या हूं,अंग्रेजी राज से भये प्रगट कृपाला तक
मुगल शासक अकबर के दौर में एक अहम सूबा था अवध, जिसकी राजधानी थी अयोध्या . भारतीय जनमानस के बीच खासकर उत्तर भारत में घर-घर रामचरित मानस की चौपाइयां सुनाई देने लगी. सामाजिक-धार्मिक जीवन में भगवान राम का महत्व बढ़ा, वैसे-वैसे अयोध्या भी एक हिंदू तीर्थ के तौर पर महत्वपूर्ण होती गयी . दूसरी ओर,भारत में औरंगजेब की मौत के बाद मुगल तेजी से कमजोर पड़ने लगे , साल 1731 में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह ने अवध को काबू करने की ज़िम्मेदारी अपने शिया दीवान-वज़ीर सआदत खां को सौंपी,इसके बाद अवध की कमान मुगल शासकों के हाथों से निकल कर नवाबों-वजीरों के हाथों में आ गयी . धीरे-धीरे अयोध्या में नई बहस आकार लेने लगी , मसलन, अयोध्या में मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गयी थी?
ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करनेवाला ब्रिटिश विलियम फिंच ने 1608 से 1611 के बीच भारत का दौरा किया . कारोबार की संभावना तलाशने के लिए हिंदुस्तान में जगह-जगह गया,अयोध्या के बारे में विलियम फिंच ने लिखा है भगवान राम से जुड़े भव्य भवन के अब सिर्फ अवशेष बचे हैं . इमारत के टूटे-फूटे हिस्से रह गए हैं, जहां हिंदू पुजारी श्रीराम की पूजा करते हैं . देश भर से हिंदू वहां पहुंचकर दर्शन करते हैं,इसे रामकोट कहा जाता है . मुगल बादशाह औरंगजेब की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा,इस दौर में अवध शक्तिशाली राज्य के तौर पर उभरा,नवाब शुजाउदौला के दौर में फैजाबाद यानी आज के अयोध्या ने गजब की तरक्की की,उस दौर की कई निशानियां आज भी मौजूद हैं .
ब्रिटिश हुकूमत और कानूनी लड़ाई की शुरुआत
बात 1775 की है . नवाब असफउद्दौला ने अपनी राजधानी फैजाबाद से बदलकर लखनऊ करने का फैसला किया..इसी के साथ प्राचीन नगर अयोध्या अपनी रंगत खोने लगी,अयोध्या अब सत्ता का केंद्र नहीं रही,लेकिन, हिंदुओं के लिए पहले की तरह ही पवित्र तीर्थ बनी रही, तुलसीदास के राम रचितमानस की चौपाईयों ने श्रीराम के चरित्र को जन-जन तक पहुंचा दिया .हिंदुओं के बीच एक नई चेतना का तेजी से संचार हुआ,इस दौर में अयोध्या में हिंदू और मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी थी . ऐसे में अयोध्या में अब मंदिर - मस्जिद के सुर तेज होने लगे,हिंदू-मुस्लिम आमने-सामने आने लगे .
अयोध्या में कदम-कदम पर मंदिर बने,मस्जिदें भी . मंदिर से घंटियों की आवाज और मस्जिद से अजान दोनों सुबह - शाम साथ-साथ निकलने लगी. अवध के नवाब खुद हनुमान जी के उपासकों में थे. कुछ कट्टरपंथियों को हिंदू-मुस्लिमों में भाई-चारा हजम नहीं हो रहा था,नए तरह की तिकड़ और साजिश अयोध्या की फिजाओं में आकार लेने लगी. उस दौर में सुन्नी फकीर शाह गुलाम हुसैन समेत कुछ मुसलमानों ने अफवाह उड़ा दी कि हनुमानगढ़ी में जहां मंदिर है , वहां औरंगजेब ने एक मस्जिद बनवाई थी . ये अफवाह फैलाने की कोशिश की गई कि मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाया गया,शाह गुलाम हुसैन ने ऐलान किया कि उसी जगह 28 जुलाई,1855 को नमाज पढ़ेंगे. इसके बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया .
बात करीब 170 साल पुरानी है . अयोध्या में कट्टरपंथियों का एक वर्ग तेजी से उभर रहा था - जिसकी अगुवाई कर रहा था सुन्नी फकीर शाह गुलाम हुसैन . कट्टरपंथियों के निशाने पर थी अयोध्या की हनुमानगढ़ी. कट्टरपंथियों ने अफवाह फैला दी कि मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाई गयी है,पूरे इलाके में तनाव फैल गया . नवाब वाजिद अली शाह ने इसकी जांच करवाई, नवाब की समझ में आ गया कि गुलाम हुसैन साजिश के तहत आग लगा रहा है . कट्टरपंथी भी अड़ गए,मामला इतना बढ़ा कि नवाब को शाही फौज को मोर्चा संभालना पड़ा, जिसमें 70 से अधिक मुसलमान मारे गए , नवाब की फौज तलवार की नोक पर मुस्लिम कट्टरपंथियों को शांत कर दिया .
1877 के 'गजेटियर ऑफ दि प्रोविंस ऑफ अवध' में पैट्रिक कारनेगी ने लिखा है, मुसलमानों ने हनुमानगढ़ी पर कब्जे की कोशिश की..इसमें उन्हें बड़ा खामियाजा उठाना पड़ा,वो तीसरी कोशिश में राम जन्मभूमि पर कब्जा करने में कामयाब हुए,बाबरी मस्जिद के गेट पर हुए संघर्ष में करीब 75 मुसलमान मारे गए और 11 हिंदुओं की जान गयी . इस वक्त तक हिंदू इसमें पूजा करते थे. कुछ साल बार फिर अयोध्या सुलगने लगा,ये बात है- 1859 की . अयोध्या में फिर तनाव बढ़ने लगा . विवादित जमीन पर कब्जे को लेकर अयोध्या में हिंदू - मुस्लिमों के बीच बड़ा दंगा हुआ, जिसका साफ-साफ असर आसपास के इलाकों में भी दिखा..सुलह करवाने के लिए अंग्रेजों ने दोनों पक्षों के जिम्मेदार लोगों को आमने-सामने बैठाकर मामले को खत्म कराने की कोशिश की .
1877 के 'गजेटियर ऑफ दि प्रोविंस ऑफ अवध' में लिखा गया है कि अयोध्या में बार-बार झगड़े से बचने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने बीच में लोहे की रेलिंग लगवा दी. जिसके अंदर मुसलमान इबादत कर सकते थे और रेलिंग के बाहर हिंदुओं ने एक प्लेटफॉर्म बनाया, जिस पर हिंदू पूजा करते थे . लेकिन, अंग्रेजी फॉर्मूले से भी अयोध्या का झगड़ा खत्म नहीं हुआ .
अंग्रेजों के आने से पहले अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी ढांचा विवाद की नींव पड़ चुकी थी , बाबरी ढांचा खड़ा होने के बाद भी हिंदुओं ने सीता रसोई और राम चबूतरे पर पूजा-अर्चना जारी रखी,अंग्रेजों के दौर में झगड़ा बढ़ा तो कंटीली बाड़ लगा कर विवादित जगह को दो हिस्सों में बांट दिया गया,लेकिन, भीतर जाने के लिए मुख्य गेट एक ही रहा. टकराव बढ़ता जा रहा था,वो साल था 1885 और महीना जनवरी . प्रचंड ठंड के मौसम में निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने अयोध्या विवाद में पहला केस फाइल किया और राम चबूतरे पर एक मंडप बनाने की इजाजत मांगी. इसके बाद एकाएक गर्मी बढ़ गयी, ये भी एक संयोग है कि यही वो साल था - जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई,फैजाबाद की जिला अदालत ने महंत रघुबर दास की याचिका खारिज कर दी .
बात 1883 की है,महीना अप्रैल का . होली के बाद से ही अयोध्या के साधु-संतों में हलचल तेज हो गयी थी,निर्मोही अखाड़ा ने डिप्टी कमिश्नर फ़ैज़ाबाद के सामने अर्ज़ी लगाकर मंदिर बनाने की इजाजत मांगी,लेकिन, मुस्लिम समुदाय की आपत्ति पर निर्मोही अखाड़े की अर्जी नामंजूर हो गयी .
29 जनवरी, 1885 में अयोध्या
निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने चबूतरे को राम जन्म स्थान बताते हुए सिविल कोर्ट में पहला मुक़दमा दायर कर दिया , 17X21 फीट के चबूतरे को श्रीराम का जन्मस्थान बताया गया और मंदिर बनाने की इजाजत मांगी गयी . इस मामले की सुनवाई कर रहे थे - सब जज पंडित हरिकिशन . दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद जज पंडित हरिकिशन ने अपने फैसले में लिखा चबूतरा और मस्जिद बिलकुल अग़ल-बग़ल हैं, दोनों के रास्ते एक हैं और मंदिर बनेगा तो शंख, घंटे वग़ैरह बजेंगे, जिससे दोनों समुदायों के बीच झगड़े होंगे,लोग मारे जाएंगे .
निर्मोही अखाड़े को चबूतरे पर मंदिर बनाने की इजाजत नहीं मिली . सालभर के भीतर ही निर्मोही अखाड़ा पहला मुकदमा हार गया,इसके बाद महंत रघुबर दास ने फैजाबाद के जिला जज कर्नल एफ. ई. ए. कैमियर की अदालत पहुंच गए . जज कमियर ने अपने फैसले ने कहा हिंदू जिस जगह को पवित्र मानते हैं वहां मस्जिद बनाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. यह घटना 356 साल पहले की है इसलिए अब इस शिकायत का समाधान करने के लिए बहुत देर हो गई है . ऐसे में सभी पक्ष पक्ष यथास्थिति बनाए रखें . निर्मोही अखाड़ा अवध के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग की अदालत पहुंच गया , लेकिन, यहां से भी कोई रास्ता नहीं निकला . तीनों अदालतों ने अपने फैसले में विवादित स्थल के बारे में हिंदुओं की आस्था, मान्यता और जनश्रुति का उल्लेख तो किया. लेकिन, फैसले का आधार मौजूदा सबूत और रिकॉर्ड को बनाया .अदालत का ध्यान शांति और तत्कालीन जरूरतों पर ज्यादा रहा .
वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा था . एक ओर पूरे देश में ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा था तो दूसरी ओर अयोध्या में तनाव बढ़ता जा रहा था . बात मार्च 1934 की है,.फैजाबाद के शाहजहांपुर में गोहत्या की घटना हुई,इसके विरोध में हिंसा शुरू हो गयी . इस हिंसा में बाबरी मस्जिद को नुकसान पहुंचा . अंग्रेजों ने किसी तरह से मामले को शांत करवाया और बाद में ब्रिटिश सरकार ने इसकी मरम्मत करवा दी . अयोध्या का मामला सुलझने की जगह लगातार उलझता जा रहा था,करीब दो साल बाद यानी 1936 ईस्वी में मुसलमानों में शिया और सुन्नी इस बात को लेकर उलझ गए कि मस्जिद किसकी है? इसके लिए अंग्रेजों ने जांच बैठा दी, मस्जिद के मुतवल्ली ने दावा किया कि मीर बाक़ी शिया था, इसलिए ये शिया समुदाय की मस्जिद हुई . जिला वक़्फ़ कमिश्रनर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मस्जिद का निर्माण करने वाला बादशाह सुन्नी था..इसलिए, सुन्नी समुदाय की मस्जिद हुई . मामला फिर अदालत में पहुंचा .
अंग्रेजी राज खत्म होने को आया तो हिंदुओं की ओर से फिर चबूतरे पर मंदिर निर्माण को लेकर हलचल तेज हो गयी..जिसके बाद फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेन ने एक आदेश जारी किया,आदेश में दोनों पक्षों यानी हिंदू और मुसलमान से यथास्थिति बहाल रखने के लिए कहा गया . लंबी लड़ाई के बाद भारत को अंग्रेजों से आजादी मिल गयी . लेकिन,अयोध्या का झगड़ा ज्यों का त्यों बना रहा,आजाद भारत में अयोध्या का झगड़ा धीरे-धीरे वोट की राजनीति में बदलने लगा , सियासतदां अयोध्या को एक नए मौके के तौर पर देखने लगे . बात 1948 की है,फैजाबाद विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए. समाजवादी आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ कांग्रेस ने हिंदू संत बाबा राघव दास को उम्मीदवार बनाया. तब उत्तर प्रदेश की कमान गोविंद वल्लभ पंत के हाथों में थी, इस चुनाव में पहली बार अयोध्या में मंदिर निर्माण अहम मुद्दा बना. मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने अपने चुनावी भाषणों ने बार-बार कहा कि आचार्य नरेंद्र देव श्रीराम को नहीं मानते . समाजवाद के झंडाबरदार आचार्य नरेंद्र देव करीब एक हजार वोट से चुनाव हार गए और बाबा राघव दास चुनाव जीत गए,इस तरह आजादी के साथ ही वोट बैंक पॉलिटिक्स में अयोध्या का श्रीगणेश हो गया . लेकिन, अयोध्या में मंदिर-मस्जिद झगड़े का टर्निंग प्वाइंट बना साल 1949,जब 23 दिसंबर को रात के अंधेरे में चमत्कारिक रूप से राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां बाबरी मस्जिद के भीतर पहुंच गई .
आजाद भारत और मूर्तियों का प्रकटीकरण
23 दिसंबर, 1949 को अयोध्या
रात के अंधेरे में बाबरी मस्जिद में कुछ हलचल हुई और मूर्तियां अवतरित हो गयीं . सुबह होते ही पूरे इलाके में आग की तरह ये खबर फैली कि अयोध्या में रामलला का जन्म हुआ है . इस रहस्यमयी रात ने अयोध्या की पूरी तस्वीर बदल दी,कुछ ने इसे चमत्कार माना,तो कुछ ने सोची समझी साजिश .
23 दिसंबर,1949 को ही एक FIR दर्ज हुई,जिसमें अयोध्या पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंचार्ज ने मुख्य रूप से तीन लोगों को नामजद किय- अभिराम दास, राम शक्ल दास और सुदर्शन दास . इन तीन नामों के साथ 50-60 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी दंगा भड़काने, अतिक्रमण जैसी कुछ दफाओं में केस दर्ज किया गया फैजाबाद के तत्कालीन डीएम केके नायर ने इसे विवादित संपत्ति घोषित कर ताला लगवा दिया,उन्होंने नगर पालिका अध्यक्ष प्रियदत्त राम को वहां का रिसीवर नियुक्त कर दिया,हिंदुओं को रामलला की पूजा की इजाजत दी गई . डीएम केके नायर अपने सीनियर अफसरों के निर्देश सुन तो रहे थे,लेकिन, कर अपने मन की रहे थे . यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने नायर को लिखित आदेश दिया कि अयोध्या में यथास्थिति बहाल की जाए यानी रामलला की मूर्ति को बाबरी मस्जिद से निकालकर राम चबूतरे पर रख दिया जाए. तब डीएम के के नायर ने जवाब में लिखा
रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से निकालकर राम चबूतरे पर ले जाना संभव नहीं है. ऐसा करने से अयोध्या, फैजाबाद और आसपास के गांवों-कस्बों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. जिला प्रशासन के अधिकारियों, यहां तक कि पुलिस वालों की जान की गारंटी भी नहीं दी जा सकती . डीएम नायर से दोबारा यथास्थिति बहाल करने के लिए कहा गया,तो जवाब में उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी . लगे हाथों एक मशवरा भी दे दिया . नायर ने 27 दिसंबर 1949 को अपने जवाब में लिखा,
विस्फोटक हालात को काबू में करने के लिए इस मसले को अदालत पर छोड़ा जा सकता है . अदालत का फैसला आने तक विवादित ढांचे के बाहर एक जालीनुमा गेट लगाया जा सकता है, जहां से श्रद्धालु रामलला के दर्शन तो कर सकें . लेकिन अंदर प्रवेश ना कर सकें . तब डीएम नायर का इस्तीफा तो यूपी की तत्कालीन गोविंद वल्लब पंत सरकार ने स्वीकार नहीं किया , लेकिन, उनके सुझावों को जरुर मान लिया . इसके बाद मस्जिद अपनी जगह पर रही और रामलला की मूर्ति अपनी जगह . लेकिन, 23 दिसंबर, 1949 की सुबह की घटना ने अयोध्या विवाद को बढ़ा दिया ,1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद कोर्ट से रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष अनुमति मांगी .
1959 में निर्मोही अखाड़ा बाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत पहुंच गए , एक ओर कोर्ट में अयोध्या पर तारीख पर तारीख मिल रही थी ,1952 में ही केके नायर ने रिटायमेंट ले लिया . उनका राजनीति में पहले से झुकाव था,वो भारतीय जनसंघ के टिकट पर बहराइच से लोकसभा पहुंच गए,बाद में उनकी पत्नी शकुंतला नायर भी तीन बार कैसरगंज लोकसभा सीट से चुनी गयी..पार्टी वही भारतीय जनसंघ . जिस विचाराधारा के दम पर जनसंघ कांग्रेस का विकल्प बनना चाहती थी,उसे शुरुआती वर्षों में कोई खास कमायाबी नहीं मिली .
1971 में पाकिस्तान को युद्ध में धूल चटाने के बाद इंदिरा गांधी देश में अपने उन विरोधियों के सामने बड़ी ताकत बन गई थीं, जो खुद को राष्ट्रवादी होने का तमगा देते थे. ये वही वक्त था जब इंदिरा गांधी के खिलाफ एकजुट हो रही ताकतों को कहीं ना कहीं संघ परिवार का समर्थन मिल रहा था . एक ओर अयोध्या का केस अदालत में था,दूसरी ओर, भारत में वोट बैंक पॉलिटिक्स भी तेजी से बदल रही थी. इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव जनता पार्टी और जनसंघ ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया,वो साल था 1977 का,आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई..लेकिन, आपसी मतभेद और कुर्सी के लिए खींचतान के बीच जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिन नहीं चल पायी . इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद संघ परिवार ने मंथन शुरू किया कि अगले चुनाव से पहले कैसे हिंदुओं को राजनीतिक रूप से एकजुट किया जाए.
इस बीच एक बड़ी घटना घटी,बात 1981 की है,तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में सामूहिक धर्मान्तरण ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया , सैकड़ों दलितों को सरेआम मुसलमान बनाया गया. तब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इंदिरा गांधी थी. इस घटना के बाद साल 1982 में विश्व हिंदू परिषद ने संस्कृति रक्षा अभियान शुरू किया,कहा जाता है कि उस दौर में VHP नेताओं के साथ इंदिरा गांधी की कई गोपनीय बैठकें हुईं,अयोध्या धीरे-धीरे राजनीति के केंद्र में आने लगी .