अमेरिका-इजरायल और ईरान पिछले तीन हफ्ते से जंग लड़ रहे हैं . तेल-गैस ठिकानों पर लगातार हमले जारी हैं . इससे पूरी दुनिया में एनर्जी सप्लाई का सिस्टम गड़बड़ा गया है. ऐसे में हिसाब लगाया जा रहा है कि अगर जंग और लंबी खींची तो कहां और कितना असर पड़ेगा? भारत में युद्ध के बाद लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा का मुद्दा चुनाव है . असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव के लिए रणभूमि सज चुकी है. असम, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में 9 अप्रैल को चुनाव होंगे. असम का नाम जेहन में आते हीं सुबह-शाम लोगों को तरोताजा करने वाली दुनियाभर में मशहूर वहां की चाय का ख्याल आता है … वहां के खूबसूरत चायबगानों का ख्याल आता है . असम के चाय की तरह वहां की राजनीति के भी कई रंग हैं. अलग-अलग स्वाद है. खौलते चाय की तरह वहां की सियासत भी उबलती रहती है . परिसीमन यानी Delimitation की वजह से 40 से अधिक सीटों का हिसाब-किताब बहुत हद तक बदल चुका है. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने हाल में एक इंटरव्यू में कहा की प्रदेश के मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं देंगे, वो 12 जिलों में घुस नहीं सकते हैं. लेकिन, 10 साल बाद स्थिति बदल जाएगी . हाल में कांग्रेस के दो बड़े नेता भूपेन बोरा और प्रद्युत बोरदोलोई बीजेपी के रथ पर सवार हो गए. चुनाव से ठीक पहले असम में कांग्रेस के लिए इसे बड़े झटके की तरह देखा जा रहा है. असम की राजनीति का मिजाज कुछ ऐसा है कि 1 फीसदी वोटों का अंतर 25 सीटों के नतीजों को प्रभावित कर देता है. ऐसे में सवाल उठता है कि असम चुनाव में जीत-हार तय करने में कौन सा फैक्टर अहम भूमिका निभाएगा ? गठबंधन, परिसीमन, ध्रुवीकरण या वोट काटने की रणनीति. आखिर, असम पॉलिटिक्स में इतना हिंदू-मुसलमान क्यों हो रहा है? स्थानीय बाहरी की बातें क्यों हो रही है? असम के लोग आखिर किस सोच के साथ EVM पर बटन दबाएंगे ? स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा इतना क्यों छाया रहता है? हिमंता बिस्वा सरमा की रणनीति काम करेगी या कांग्रेस बाजी मार ले जाएगी?

असम विधानसभा चुनाव में तस्वीर तेजी से बदल रही है . चुनावी वैतरणी पार करने के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों गठबंधन के सहारे आगे बढ़ रहे हैं. राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 89 पर बीजेपी चुनाव लड़ेगी. गठबंधन में साझीदार असम गण परिषद 26 सीटों पर तो बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट यानी BPF 11 सीटों पर किस्मत आजमाएगा . पिछले विधानसभा चुनाव में BPF कांग्रेस के साथ थी . BPF का बीजेपी के साथ आने का मतलब है आदिवासी इलाकों में आधार मजबूत होना . इसी तरह कांग्रेस भी गठबंधन के सहारे असम की सत्ता में वापसी के लिए जोर लगा रही है. असम की राजनीति में तीन गोगोई की चर्चा बहुत हो रही है . एक, कांग्रेस के गौरव गोगोई . दूसरे, रायजोर दल के अखिल गोगोई और तीसरे असम जातीय परिषद के लुरिनज्योति गोगोई . तीनों ने बीजेपी को हराने के लिए हाथ मिलाया है. सीटों के बंटवारे का फॉर्मूला करीब-करीब तय है. हालांकि, कांग्रेस का कुछ दलों के साथ भी गठबंधन है . असम की कुछ सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा की भी नजर है . भीतरखाने गठबंधन के लिए बातचीत चल रही है . तृणमूल कांग्रेस ने भी अपने दम पर असम में चुनाव लड़ने का ऐलान किया है . हालांकि, ये भी कहा गया है कि असम में TMC सरकार बनाने के लिए नहीं लड़ रही है. कभी असम पॉलिटिक्स में बदरुद्दीन अजमल को किंगमेकर माना जाता था…लेकिन, इस चुनाव में उनकी पार्टी AIUDF एक तरह से वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रही है . ऐसे में सबसे पहले समझते है कि असम के चुनावी अखाड़े में किस तरह का खेल चल रहा है?

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असम में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी है . हर उस दांव को आजमाया जा रहा है - जिससे अधिक से अधिक वोट हासिल किया जा सके. गठबंधन के जरिए एक-एक वोट जोड़ने की जुगत बहुत बारीकी से की जा रही है. ये असम की चुनावी राजनीति में गठबंधन के गणित की अहमियत ही है कि बीजेपी इस बार पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में कम सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है. 37 सीटें अपने गठबंधन साझीदारों को दी है . सूबे की 126 सीटों में से बीजेपी 89 सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है…तो गठबंधन साझीदार असम गण परिषद 26 और बीपीएफ 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी .

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उम्मीदवारों की फाइनल लिस्ट से नामांकन दाखिल करने तक की प्रक्रिया असम में तेजी से आगे बढ़ रही है . चुनाव में जीत-हार तय करने में गठबंधन बड़ी भूमिका निभाता है…खासकर बोडोलैंड जैसे क्षेत्रों में…जहां क्षेत्रीय दलों का खासा प्रभाव है . BJP की तरह कांग्रेस भी गठबंधन के गणित से असम जीतने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है . असम में बीजेपी को रोकने के लिए तीन गोगोई यानी गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिनजोत गोगोई ने हाथ मिला लिया है . 126 सीटों में से कांग्रेस खुद 101 सींटो पर लड़ रही है. अखिल गोगोई के रायजोर दल को 11, लुरिनजोत गोगोई के असम जातीय परिषद को 10, सीपीएम और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस को 2-2 सीटें दी गई हैं .

असम का राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहा है . हाल में कांग्रेस के दो बड़े नेता भूपेन बोरा और प्रद्युत बारोदोलोई पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हो गए. इसे चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए बड़े झटके के दौर पर देखा गया. हालांकि, लेफ्ट के कुछ दलों के साथ रायजोर दल के साथ आने से समीकरण थोड़े बदले माने जा रहे हैं. दरअसल, CAA विरोधी प्रदर्शनों के बीच अखिल गोगोई एक बड़ा चेहरा बनकर उभरे थे. लोकप्रियता ऐसी की जेल से भी चुनाव जीतने में कामयाब रहे. TMC ने भी असम विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है…टीएमसी की आक्रामक एंट्री से कई सीटों पर कड़ा और त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है. झारखंड मुक्ति मोर्चा की नजर भी असम के चाय बगान वाले करीब 30 विधानसभा सीटों पर नजर है .

बदरुद्दीन अजमल के AIUDF की चुनावी अखाड़े में मौजूदगी भी किसी के लिए राहत तो किसी के लिए आफत का सबब बन सकती है . दरअसल, असम में जीत-हार तय करने में तीसरे और चौथे प्लेयर अहम भूमिका निभाते हैं… ऐसे खिलाड़ी भले ही खुद चुनाव न जीते . लेकिन, दूसरों की जीत-हार तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं . इतिहास गवाह है कि 2021 के असम चुनाव में सत्ताधारी NDA और विपक्षी महाजोत के बीच वोटों का अंतर सिर्फ 1 फीसदी था…लेकिन, सीटों का अंतर 25 का रहा . NDA को जहां 75 सीटें मिलीं. वहीं, विपक्षी महाजोत को सिर्फ 50 सीटें यानी एक फीसदी वोट से 25 सीटों का अंतर . एक स्टडी के मुताबिक, सूबे में 19 सीटें ऐसी रही - जहां जीत 5 फीसदी से भी कम वोटों से तय हुई…तो 22 सीटें ऐसी रहीं जहां जीत-हार के बीच फासला 5 से 10 फीसदी वोटों का रहा.

ऐसे में माना जाता है कि असम में जीत-हार का असली फैसला गठबंधन के गणित और छोटे-दलों की एंट्री से होनेवाले एक्शन-रिएक्शन से तय होता है . साल 2021 के असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सहयोगियों के साथ मिलकर 75 सीटें जीती . वहीं, कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं . लेकिन, परिसीमन के बाद असम में विधानसभा सीटों का राजनीतिक भूगोल बहुत हद तक बदल गया है . माना जा रहा है कि 40 से 45 सीटों पर इसका कम या ज्यादा पड़ना तय है . ऐसी 20 से अधिक सीटें बताई जा रही हैं – जहां चुनावी नतीजे पूरी तरह नए समीकरणों पर निर्भर करेंगे . ज्यादातर विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों का सामना नए वोटरों से होगा. ऐसे में असम के वोट युद्ध में खड़े महारथी सियासी भूगोल में बदलाव की वजह से होने वाले नफा-नुकसान का हिसाब लगा रहे हैं. वोट कटने और बंटने की स्थितियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं. असम में सत्ता की चाबी महिला, मुसलमान और युवा वोटरों के हाथों में मानी जा रही है. असम के ढाई करोड़ वोटरों में 18 से 29 साल के बीच के मतदाताओं की संख्या 72.83 लाख है. सूबे की आबादी में मुस्लिमों की संख्या 34 फीसदी से अधिक है. अब सवाल उठता है कि अबकी बार असम में सरकार तय करने में निर्णायक भूमिका किस फैक्टर की रहेगी?

असम में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए बीजेपी जिस मुद्दे को सबसे ज्यादा धार दे रही है - वो किसी से छिपा नहीं है . असम की आबादी में करीब 62 फीसदी हिंदू हैं…वहीं, मुस्लिमों की संख्या 34 फीसदी के आसपास है . असम मुख्यरूप से तीन राजनीतिक हिस्सों में बंटा है- ब्रह्मपुत्र घाटी, बोडोलैंड और बराक घाटी. असम की हुकूमत कौन संभालेगा - ये ब्रह्मपुत्र घाटी से तय होता है . लोअर और अपर असम को मिलाकर कुल 111 सीटें हैं…साल 2021 में अपर असम में NDA का पलड़ा भारी रहा…वहीं, लोअर असम में कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन का पलड़ा भारी रहा . यहां असमिया बनाम बाहरी का मुद्दा सबसे ऊपर रहता है . इस क्षेत्र को साधने के लिए चुनावों में तल्ख सुर अक्सर सुनाई देते हैं . बराक घाटी में कुल 15 विधानसभा सीटें हैं. इस क्षेत्र में बीजेपी बनाम कांग्रेस मुकाबला रहता है. इस बार बदरुद्दीन अजमल की AIDUF कांग्रेस के साथ गठबंधन में नहीं है. बांग्लाभाषी बहुल इस क्षेत्र में टीएमसी ने भी कई सीटों पर उम्मीदवार उतारकर समीकरण उलझा दिया है . इस क्षेत्र को साधने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी है .

बराक घाटी में बीजेपी का बेस मजबूत माना जाता है . लेकिन, इस क्षेत्र में विपक्ष यानी कांग्रेस की स्थिति भी ठीक है. बराक घाटी का मिजाज बहुत हद तक ब्रह्मपुत्र घाटी का उल्टा है. अगर ब्रह्मपुत्र घाटी में CAA का विरोध होता है-तो बराक घाटी में समर्थन लेकिन, बंगाली हिंदू और मुस्लिम वोटों के बीच ध्रुवीकरण के लिए जमीन अक्सर तैयार हो जाती है . इसी तरह बोडोलैंड में सिर्फ 12 विधानसभा सीटें है . बीजेपी ने इस क्षेत्र में पकड़ रखने वाली बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन किया है . इस क्षेत्र में कांग्रेस का प्रभाव सीमित माना जाता है . ऐसे में BPF को NDA की छतरी तले लाकर BJP ने बोडोलैंड में अपनी पकड़ बरकरार रखने का दांव चला है . असम की चुनावी राजनीति के लिहाज से ब्रह्मपुत्र घाटी दिल है तो बराक घाटी बीजेपी का गढ़..वहीं, सीटों के कम-ज्यादा होने की स्थिति में बोडोलैंड किंगमेकर की भूमिका में आ जाता है … असम के सियासी अखाड़े में दोनों बड़े गठबंधन कहीं ध्रुवीकरण तो कहीं युवा…तो कहीं महिला वोटरों को साधते हुए 2026 में सत्ता हासिल करने की जुगत में दिख रहे हैं .

असम के चुनावी नतीजों को परिसीमन फैक्टर बहुत हद तक प्रभावित करता दिख रहा है. सूबे के 126 सीटों का गणित नए सिरे से लिखा गया है. हर सीट पर पुराना समीकरण बहुत हद तक बदल और बिखर गया है. परिसीमन से पहले SC के लिए 8 सीटें रिजर्व थीं - जो बढ़कर 9 हो गई . इसी तरह से ST के लिए सीटें 16 से बढ़कर 19 हो गईं हैं . वहीं, सामान्य सीटें 102 से घटकर 98 पर आ गयी हैं. परिसीमन की वजह से जनजातीय और रिजर्व सीटों वाले क्षेत्रों में बदलाव की वजह से मुकाबला पूरी तरह नया हो गया है..दूर से भले ही असम की लड़ाई सीधी-सपाट दिख रही हो…लेकिन, जमीन पर वैसी स्थिति है नहीं .

असम में पिछले 10 साल से बीजेपी सत्ता में है . बीजेपी के फायरब्रांड नेता हिमंत बिस्वा सरमा सूबे की कमान संभाल रहे हैं . उन्हें जलुकबाड़ी सीट से नामांकन भी दाखिल कर दिया है . उनकी राजनीति का स्टाइल अलहदा है . बिना लाग-लपेट अपनी बात खुलकर कह देते हैं . हाल में एक इंटरव्यू के दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने यहां तक कह दिया कि वो कांग्रेस के 30 लोगों को टिकट देंगे. यानी उनके लोग कांग्रेस के टिकट से उम्मीदवार होंगे. इसे हिमंता की रणनीति भी कह सकते हैं . वो कांग्रेस से बीजेपी में आए और मुख्यमंत्री बने . ये समझना भी दिलचस्प है कि असम में बीजेपी आखिर सत्ता में आई कैसे ? इसके लिए कैलेंडर को पीछे पलटते हुए साल 1991 में ले जाना होगा . तब असम की राजनीतिक कांग्रेस और असम गण परिषद के बीच परिक्रमा कर रही थी. साल 1991 का असम चुनाव बीजेपी के लिए भी अहम था. राम लहर के बीच बीजेपी ने पहली बार सूबे में जीत का स्वाद चखा . असम विधानसभा की 126 सीटों में से 10 पर कमल खिला, BJP को असम में कामयाबी रातों-रात नहीं मिली थी. ये दशकों से आरएसएस और बीजेपी कार्यकर्ताओं की मेहनत का नतीजा थी…साल 1996 में जब विधानसभा चुनाव की घंटी बजी तो असम गण परिषद ने मैदान मार लिया…उसके बाद फिर सत्ता कांग्रेस के हाथों में चली गयी . असम में कांग्रेस सरकार के कैप्टन बने – तरुण गोगोई . सूबे की समस्याओं और आक्रोश की आग शांत करने के लिए मुख्यमंत्री गोगोई बातचीत के रास्ते आगे बढ़े और तीन बार कांग्रेस को सत्ता में लाने में कामयाब रहे..AGP की हालत देखते हुए BJP की समझ में एक बात अच्छी तरह आ गई कि वो सूबे में कांग्रेस का विकल्प बन सकती है. बीजेपी लगातार असम की जमीन पर नए समीकरण बैठाने और पाला मजबूत करने के मिशन में जुटी रही .

उत्तर-पूर्व का प्रवेश द्वार माने जाने वाले असम की सियासी जमीन पर बीजेपी को बड़ी कामयाबी हाथ नहीं लग पा रही थी. उस दौर में भी आरएसएस सूबे में मजबूती से काम कर रहा था, जब मिलिटेंट सोच वाले उल्फा का उदय हो रहा था. संघ स्वयंसेवक भारत माता और प्रखर राष्ट्रवाद की सोच के साथ लोगों को जोड़ने में लगे थे. 126 सदस्यों वाली असम विधानसभा में बीजेपी को 2001 में आठ, 2006 में दस और 2011 में पांच सीटों पर कामयाबी मिली. लेकिन, बीजेपी कार्यकर्ता पूरी शिद्दत के साथ असम की जमीन को कमल खिलने लायक बनाने में जुटे रहे..2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने नारा दिया - अच्छे दिन आएंगे . असम के समाजिक ताने-बाने में चल रहे संघर्ष को नरेंद्र मोदी अच्छी तरह समझ रहे थे- ऐसे उन्होंने असमिया बनाम बाहरी मुद्दें को गर्म करना शुरू किया. 2011 में असम गण परिषद से नाता तोड़कर बीजेपी में शामिल हुए सर्बानंद सोनोवाल सूबे में पार्टी का एक जाना-माना चेहरा बन चुके थे . सोनोवाल असम आंदोलन का भी हिस्सा रह चुके थे.

असम कांग्रेस में चल रही गुटबाजी और वर्चस्व की लड़ाई पर बीजेपी की पैनी नज़र थी . तब असम आंदोलन से निकले हेमंत बिश्व सरमा कांग्रेस में थे. सूबे में तरुण गोगोई के बाद उनकी हैसियत नंबर दो की थी. लेकिन, सरमा के नंबर 2 से नंबर वन बनने की राह में खड़े थे – गौरव गोगोई. तरुण गोगोई के पुत्र . पार्टी में अनदेखी की शिकायत करते हुए हेमंत बिश्व सरमा ने बीजेपी के रथ पर सवार होने का फैसला किया..इससे असम में कांग्रेस की ताकत कम हुईं तो बीजेपी की ताकत में इजाफा . बीजेपी ने सोनोवाल को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया…‘मिशन 84’ यानी दो-तिहाई सीटें जीतने का टारगेट सेट कर दिया . ‘मिशन 84’ हासिल करने के लिए बीजेपी ने असमगण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन किया . बीजेपी ने हर क्षेत्र के हिसाब से अलग रणनीति बनाई .

साल 2016 में असम में विधानसभा चुनाव की घंटी बजी . तब बीजेपी नेताओं ने जय श्रीराम की जगह भारत माता की जय के नारे ज्यादा लगाए..घुसपैठियों को बाहर निकालने का वादाकर असमिया समाज का भरोसा जीतने की कोशिश की…तो सूबे के बेरोजगार युवाओं को नौकरी और तरक्की का सपना दिखाया . असम में NDA को 86 सीटों पर कामयाबी मिली…टारगेट से ज्यादा सीटें . सर्बानंद सोनोवाल ने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. उनके सामने दो बड़ी चुनौतियां थी- पहली, सूबे को तरक्की के एक्सप्रेवे पर ले जाने की..दूसरी, घुसपैठियों को बाहर करने की . सूबे में असमिया बनाम बाहरी संघर्ष लगातार जारी रहा..असम का मिजाज बदल रहा था . कभी असम के लोग NRC में नाम खोजते दिखे..तो कभी CAA के विरोध में यूर्निवसिटी छात्र क्लासरूम छोड़कर हाथों में तख्तियां लिए सड़कों पर उतर गए .

मोदी सरकार बोडोलैंड समस्या का भी स्थाई उपाय खोजने में लगी हुई थी. केंद्र, असम सरकार और बोडो उग्रवादी संगठनों के बीच 27 जनवरी, 2020 को बड़ा समझौता हुआ..BJP की अगुवाई में असम अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था..साल 2021 में चुनाव की घंटी बजी तो फिर बीजेपी गठबंधन साझीदारों के साथ प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई…इस बार बीजेपी ने असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हिमंता बिस्वा सरमा को बैठाया . आज असम बीजेपी में दिखने वाले ज्यादातर चेहरे कभी कांग्रेस या असम गण परिषद का झंडा लिए घूमते थे. खुद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस से बीजेपी में आए और मुख्यमंत्री बने. सर्बानंद सोनोवाल भी AGP से बीजेपी में आए और सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे. 2011 में असम विधानसभा की सिर्फ 5 सीटों पर सिमटी बीजेपी ने 2016 में सरकार बना ली . ये असम में बीजेपी की राजनीति का स्टाइल था . वहां की सियासी जमीन ने अपना कैमिकल मिलाने का स्टाइल था. NRC और CAA की गूंज भी असम में जमकर सुनाई दी. असम जब एक बार फिर चुनाव की दहलीज पर खड़ा है…तो समझना भी जरूरी है कि असम में स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा कैसे बड़ा बना? All Assam Student Union यानी आसू और असम गण संग्राम परिषद ने इस मुद्दे को आगे रखते हुए कितना प्रचंड आंदोलन खड़ा किया..भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर हरे-भरे चाय बगानों वाले असम की धरती किस तरह खून से लाल हो रही थी . साल 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में जुल्मो-सितम से बचने के लिए भारी तादाद में शरणार्थी भारत के सरहदी इलाकों में आए,जिसमें से एक असम भी था . लेकिन, बांग्लादेश बनने के बाद भी ज्यादातर शरणार्थी वापस नहीं लौटे .

बाहरियों की भीड़ ने असम के सामाजिक ताने-बाने में पैदा हलचल के बीच भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा के लिए जमीन तैयार कर दी . सरकार की ओर से विदेशियों को वापस भेजने का सिलसिला जारी रहा … एक आंकडे के मुताबिक …1972 से 78 के बीच यानी 6 वषों में 99 हज़ार 580 बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजा गया…जिसमें 60% से ज्यादा हिंदू थे . लोकतंत्र की नई आबोहवा में All Assam Student Union यानी आसू और असम गण संग्राम परिषद ने विदेशियों के मुद्दे को जोर-शोर से उठाना शुरू किया..छात्र नेताओं की मुख्य मांग थी- नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए 80 फीसदी आरक्षण . आंदोलनकारियों के निशाने पर थे - खासतौर से बांग्लादेशी मुसलमान . आंदोलन में शामिल नेताओं ने दावा किया कि सूबे की आबादी में 30% से ज्यादा बाहरी घुस आए हैं. ऐसे में आंदोलनकारियों ने केंद्र सरकार से असम की सीमाओं को सील करने, बाहरी लोगों की पहचान करने और घुसपैठियों का वोट लिस्ट से नाम कटवाने की मांग की. इनके पूरा होने तक असम में चुनाव टालने की बात जोर-शोर से उठी. साल 1983 में चुनाव हुए तो कई सीटों पर जीत-हार का अंतर हजार वोट से भी कम का था.

गुवहाटी से करीब 70 किलोमीटर दूर एक गांव है नेल्ली. इस इलाके में असमिया हिंदुओं के साथ-साथ बांग्लादेश से आए मुसलमान भी रह रहे थे. इस क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था. 18 फरवरी, 1983 की सुबह-सुबह धारदार हथियारों से लैस दंगाईयों ने नेल्ली गांव को घेर लिया..पहले मुस्लिमों के घरों को आग के हवाले किया गया..फिर खोज-खोजकर जवान, बुजुर्ग, बच्चों और औरतों का बड़ी बेहरमी से कत्ल किया गया. इस नरसंहार ने पूरे हिंदुस्तान के हिला कर रख दिया . इसके लिए सीधे छात्र संगठन और आंदोलनकारियों को जिम्मेदार ठहराया . वक्त का पहिया आगे बढ़ा . दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की कमान राजीव गांधी के हाथों में आ गयी . उन्होंने असम समस्या सुलझाने के लिए गंभीरता से मंथन शुरू किया. असम समस्या के स्थाई समाधान के लिए आंदोलनकारी छात्र नेताओं और संगठनों को बातचीत की टेबल पर लाने की प्रक्रिया शुरू की . नतीजा ये निकला कि असम समझौते के लिए जमीन तैयार हुई.केंद्र सरकार और असम के प्रतिनिधियों के साथ खुद प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी समझौते पर दस्तखत के दौरान मौजूद रहे .

असम समझौते के तहत हुए फैसला

  1. 1951 से 1961 के बीच असम आए लोगों को नागरिकता और मतदान का अधिकार मिला.
  2. 1961 से 1971 के बीच असम आए लोगों को नागरिकता मिली, मतदान का अधिकार नहीं.
  3. 25 मार्च, 1971 के बाद आए विदेशियों को वापस भेजने का फैसला हुआ.
  4. असम के आर्थिक विकास के लिए पैकज का ऐलान हुआ.
  5. असमिया संस्कृति, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत को आगे बढ़ाने की बात हुई.

असम समझौते में आंदोलनकारियों की एक और बड़ी मांग मान ली गई, वो थी असम के मुख्यमंत्री का इस्तीफा और सूबे में नए सिरे से चुनाव. इसके पीछे आंदोलनकारियों की दलील थी कि 1983 में हुए विधानसभा चुनाव में असम के लोगों ने हिस्सा नहीं लिया था . 15 अगस्त, 1985 को केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच एक समझौते पर दस्तखत हुआ … जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है . वहां से असम में एक नए तरह की राजनीति ने आकार लिया . दो साल बाद विधानसभा चुनाव हुए तो आंदोलनकारी युवाओं ने असम गण परिषद नाम से नई पार्टी बनाई. असम के सियासी अखाड़े में कांग्रेस में मंझे खिलाड़ियों का मुकाबला नई नवेली पार्टी के नौजवान नेताओं से हुआ…जो आंदोलन की गर्भ से निकले थे. विधानसभा की 126 सीटों में से 92 पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने मैदान मार लिया. जिन्हें असम गण परिषद ने समर्थन दिया था. कांग्रेस 25 सीटों पर सिमट कर रह गयी . असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे प्रफुल्ल कुमार महंत … उम्र थी सिर्फ 32 साल . ये भी असम की राजनीति का एक मिजाज था . उसके बाद लंबे समय तक असम पॉलिटिक्स कांग्रेस और असम गण परिषद की परिक्रमा करती रही. साल 2001 में कांग्रेस के तरुण गोगोई सूबे के मुख्यमंत्री बने और लगातार 15 वर्षों तक सूबे की कमान संभाली.

उसी तरुण गोगोई के बेटे हैं- गौरव गोगोई, जो कांग्रेस की असम में सत्ता में वापसी के लिए नए-नए समीकरणों पर काम कर रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस के सामने दो तरह की चुनौतियां हैं . पहली, बीजेपी विरोधी वोट को अपने पाले में खींचना और दूसरा लोअर असम में पकड़ मजबूत बनाए रखना. अगर वोटों का बंटवारा हुआ तो नुकसान तय माना जा रहा है. इसी तरह हिमंता बिस्वा शर्मा के सामने चुनौती– असम में अपने किले को बचाए रखने की है . लोकतंत्रीय राजनीति में चुनाव हर सियासी दल के लिए सबसे बड़ी परीक्षा की तरह होता है. जिसमें परीक्षार्थी राजनीतिक दलों के उम्मीदवार होते हैं और नंबर देने का काम मतदाता करते हैं. असम की राजनीति का एक मिजाज ये भी है कि ज्यादातर सीटों पर फैसला बहुत कम वोटों के अंतर से होता है. असम में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच सभी अपने-अपने तरीके से लोगों के मन को पढने की कोशिश कर रहे हैं . आखिरी फैसला तो असम के वोटरों को 9 अप्रैल को EVM का बटन दबाकर सुनाना है.