दुनिया की राजनीति में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या शांति से जीने की चाहत ही ताकतवर देशों को हमले का न्योता देती है. तिब्बत इसका सबसे बड़ा और दर्दनाक उदाहरण है जिसने सदियों तक करुणा, आत्म-संयम और आध्यात्मिक अनुशासन को ही अपना सबसे बड़ा हथियार माना. तिब्बत ने सैन्य विस्तार को हीन समझा और यह मान लिया कि उसकी शांति उसे बाहरी खतरों से सुरक्षित रखेगी लेकिन इतिहास ने इसे एक रणनीतिक भूल साबित कर दिया. साल 1950 में जब चीन की सेना ने तिब्बत में प्रवेश किया तो वहां की आध्यात्मिक शक्ति आधुनिक युद्ध मशीनों के सामने टिक नहीं सकी. 1951 का विवादित समझौता और 1959 का विद्रोह इस बात का गवाह है कि जब कोई राष्ट्र अपनी सुरक्षा और सैन्य तैयारी को नैतिकता के भरोसे छोड़ देता है तो उसकी संप्रभुता छीन ली जाती है.
ग्रीनलैंड का डर क्या है?
आज यही डर ग्रीनलैंड को लेकर दुनिया के सामने खड़ा है जो महाशक्तियों के लिए एक ‘रणनीतिक ट्रॉफी’ बनता जा रहा है. ग्रीनलैंड की मंत्री नाजा नाथानिएलसेन ने बेहद मार्मिक बात कही है कि उनके पास रहने के लिए विशाल जमीन तो है लेकिन तादाद की ताकत नहीं है. महज 57 हजार की आबादी वाले इस द्वीप पर अमेरिका जैसे देशों की नजरें इसलिए टिकी हैं क्योंकि वे इसे एक खाली पड़े मैदान की तरह देखते हैं जिस पर अधिकार किया जा सकता है. जब बड़े देश छोटे राष्ट्रों की संप्रभुता को तर्क और जरूरत के आधार पर चुनौती देने लगें तो वह सबसे खतरनाक मोड़ होता है. डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि अमेरिका अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटेगा और जरूरत पड़ने पर ताकत का इस्तेमाल कर सकता है ग्रीनलैंड की शांति के लिए एक बड़ा अलार्म है.
संसाधनों का लालच और आर्कटिक की नई जंग
ग्रीनलैंड की शांति पर मंडराता संकट सिर्फ जमीन का टुकड़ा हासिल करने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे संसाधनों का बड़ा खेल है. यह द्वीप आज आर्कटिक कंट्रोल, दुर्लभ खनिजों और भू-रणनीतिक लोकेशन के कारण तीन बड़ी लड़ाइयों का केंद्र बन चुका है. रूस, यूरोप और अमेरिका के बीच स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड एक बेहतरीन मिलिट्री बेस बन सकता है जो भविष्य की तकनीक और ऊर्जा के लिए भी बहुत जरूरी है. न्यूयॉर्क टाइम्स और रॉयटर्स की रिपोर्टों के अनुसार ग्रीनलैंड अब उस दोराहे पर खड़ा है जहां या तो उसे ‘बेचा’ जाएगा या फिर उसे ‘हासिल’ किया जाएगा. उसकी शांति ने ही उसे आज चर्चा का सबसे बड़ा और विवादित विषय बना दिया है क्योंकि शक्तिशाली देश उसे अपनी रणनीतिक बिसात का एक मोहरा मान रहे हैं.
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
तिब्बत की कहानी हमें सिखाती है कि शांति तभी सुरक्षित रहती है जब उसके पीछे ताकत का पहरा हो. ग्रीनलैंड के पास फिलहाल डेनमार्क और यूरोप का समर्थन है लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में दरार आती है तो वह भी तिब्बत की तरह अकेला पड़ सकता है. तिब्बत ने केवल अपनी सीमाएं नहीं खोईं बल्कि अपना आत्मविश्वास और अपनी संस्कृति का सहज प्रवाह भी खो दिया जो किसी भी समाज के लिए मौत जैसा होता है. दुनिया का कठोर नियम यही है कि शांति का सम्मान वही करता है जो ताकत की भाषा समझता हो. अगर ग्रीनलैंड ने अपनी स्थिति को केवल ‘नैतिक अपील’ पर छोड़ दिया तो वह भी उसी असहाय स्थिति में पहुंच सकता है जहां कभी तिब्बत था. अंततः शांति कोई सिद्धांत नहीं बल्कि एक ऐसी रणनीति होनी चाहिए जिसे सुरक्षित रखने का साहस और साधन दोनों मौजूद हों.
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