प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज अपनी इजराइल यात्रा के दूसरे दिन यरूशलेम स्थित याद वेशम जाएंगे. याद वेशम यरूशलेम की 'माउंट ऑफ रिमेंबरेंस' पर स्थित दुनिया का सबसे बड़ा और प्रमुख होलोकॉस्ट स्मारक और संग्रहालय है. यह 45 एकड़ में फैला हुआ है. यह उन यहूदियों की स्मृति को समर्पित है जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एडोल्फ हिटलर की नाजी सेना ने 'होलोकॉस्ट' में मार दिया था. एक हिस्सा उन गैर-यहूदी नायकों को भी समर्पित है जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर यहूदियों को बचाया था. इस बगीचे में उन नायकों के सम्मान में पेड़ लगाए गए हैं और उनकी बहादुरी की कहानियां दर्ज हैं.

दुनिया का सबसे बड़ा रिसर्च सेंटर

याद वेशम दुनिया का सबसे बड़ा और प्रमुख होलोकॉस्ट रिसर्च सेंटर भी है. यहां दुनिया भर से आए शोधकर्ता उन दस्तावेजों, तस्वीरों और साक्ष्यों का अध्ययन करते हैं जो उस दौर की बर्बरता का प्रमाण हैं. जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष इजराइल जाता है तो याद वेशम जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करना उनके प्रोटोकॉल का एक अनिवार्य और सम्मानजनक हिस्सा होता है. 'याद वेशम' केवल एक संग्रहालय नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास के काले अध्यायों में से एक नरसंहार का जीवंत समारक है.

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बाइबल की पुस्तक से लिया गया नाम

'याद वेशम' का नाम बाइबल की पुस्तक यशायाह' से लिया गया है, जिसमें याद का मतलब स्मारक और वेशम का मतलब और एक नाम से है. इसका अर्थ है 'मैं उन्हें अपने घर और अपनी दीवारों के भीतर एक स्मारक और एक नाम दूंगा… जो कभी मिटाया नहीं जाएगा.' यह उन लाखों लोगों को पहचान देने का संकल्प है जिन्हें नाजियों ने केवल एक 'नंबर' में बदल दिया था.

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क्यों खास है यह स्मारक?

  • होलोकॉस्ट हिस्ट्री म्यूजियम: याद वेशम में दुनिया का सबसे बड़ा होलोकॉस्ट आर्काइव है, जिसमें 20 करोड़ से अधिक दस्तावेज, 5 लाख तस्वीरें और हज़ारों चश्मदीदों के बयान दर्ज हैं.
  • हॉल ऑफ नेम्स: यहां एक विशाल गुंबद के नीचे उन 48 लाख से अधिक पीड़ितों की पहचान और विवरण सुरक्षित रखे गए हैं जिनका पता लगाया जा सका है.
  • चिल्ड्रन्स मेमोरियल: यहां एक अंधेरे कमरे में जलती मोमबत्तियों और कांच के प्रतिबिंबों के बीच उन 15 लाख बच्चों के नाम बोले जाते हैं जो इस प्रलय में मारे गए थे.
  • गार्डन ऑफ द राइटियस: एक हिस्सा उन गैर-यहूदी लोगों को समर्पित है जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर यहूदियों को बचाया था. यहां उनके नाम की पट्टिकाएं और पेड़ लगाए गए हैं.

भारत से भी जुड़ा है कनेक्शन

कम लोग जानते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब दुनिया यहूदियों के लिए दरवाजे बंद कर रही थी, तब भारत के जामनगर के महाराजा (जाम साहेब दिग्विजय सिंहजी) ने सैकड़ों पोलिश बच्चों को शरण दी थी. इसके अलावा, भारतीय सैनिकों ने भी यूरोप में कई यातना शिविरों को मुक्त कराने में भूमिका निभाई थी.