पश्चिम एशिया में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव के बीच करीब 80 साल पुराना क्विंसी समझौता एक बार फिर चर्चा में है. अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों की बुनियाद से जुड़े इस ऐतिहासिक संदर्भ को मौजूदा समय में इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि हूती हमलों के बीच रियाद ने वाशिंगटन से सैन्य मदद मांगी है. हालांकि, अमेरिका ने सीधे सैन्य हमले की मंजूरी देने के बजाय खुफिया जानकारी और टारगेटिंग में सहायता देने की बात कही है. तो चलिए जानते हैं कि आखिर क्या है दोनों देशों के बीच हुआ क्विंसी समझौता?
क्या है क्विंसी समझौता?
क्विंसी नाम अमेरिकी युद्धपोत USS Quincy से जुड़ा है. 14 फरवरी 1945 को अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और सऊदी अरब के संस्थापक किंग अब्दुल अजीज इब्न सऊद की मिस्र की ग्रेट बिटर लेक में इसी जहाज पर मुलाकात हुई थी. बातचीत में तेल, अरब हितों, फिलिस्तीन और युद्ध के बाद की स्थिति समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई. अमेरिकी विदेश विभाग के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में इस मुलाकात का जिक्र किया गया है.
आम तौर पर इस रिश्ते को ‘तेल के बदले सुरक्षा’ के फार्मूले के तहत समझा जाता है. हालांकि, मौजूदा आधिकारिक दस्तावेज यह नहीं दिखाते कि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच ऐसी कोई औपचारिक संधि हुई थी, जिसमें तेल की आपूर्ति के बदले अमेरिका ने सऊदी अरब की सुरक्षा की गारंटी दी हो. लेकिन दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी कई सालों में अलग-अलग आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक समझौतों के जरिए विकसित हुई है. वहीं, शुरूआत में यह समझौता 60 साल के लिए था, लेकिन 2005 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इसे अगले 60 साल के लिए और बढ़ा दिया था.
अब हूती संकट में क्यों हो रही चर्चा?
मौजूदा विवाद का केंद्र यमन और लाल सागर क्षेत्र है. हूती समूह के हमलों से सऊदी अरब की सुरक्षा और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को लेकर चिंता बढ़ गई है. सितंबर 2026 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूतियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य मदद की मांग की थी. रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन ने सीधे अमेरिकी हमले के बजाय खुफिया जानकारी साझा करने और टारगेट की पहचान में मदद करने की पहल की.
इसके बाद से ही अमेरिका-सऊदी सुरक्षा संबंधों को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्षेत्रीय संकट की स्थिति में अमेरिका अपने पुराने सहयोगी सऊदी अरब को किस स्तर तक सैन्य समर्थन देगा. हालिया रुख से संकेत मिलता है कि वाशिंगटन फिलहाल सीधी सैन्य कार्रवाई से दूरी रखते हुए सऊदी अरब को सूचना और रणनीतिक सहयोग देने पर जोर दे रहा है.
क्या अमेरिका ने सऊदी को सुरक्षा देने से किया इनकार?
सऊदी अरब के लिए अमेरिका का ताजा रुख चिंता बढ़ाने वाला माना जा सकता है. रियाद को उम्मीद थी कि हूती संगठन की ओर से गंभीर सैन्य खतरा होने पर वॉशिंगटन उसके बचाव में सीधे सैन्य कार्रवाई करेगा. हालांकि, इस बार अमेरिका ने खुद युद्ध में उतरने की जगह सीमित स्तर पर मदद करने का रास्ता चुना. इसका यह मतलब नहीं है कि दोनों देशों के सुरक्षा संबंध खत्म हो गए हैं. अमेरिका अभी भी सऊदी अरब को सैन्य हथियार उपलब्ध करा रहा है और दोनों देशों की एजेंसियों के बीच खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान जारी है. सऊदी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी बनी हुई है. इसके अलावा सैन्य रणनीति, संभावित टारगेट और ऑपरेशन से जुड़ी जानकारी शेयर करने में भी सहयोग कर रहा है.
लेकिन अभी अमेरिकी रणनीति में थोड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है. वॉशिंगटन अब मध्य-पूर्व में सामने आने वाले हर खतरे का जवाब सीधे अपने सैनिकों या हवाई हमलों के जरिए देने से बच रहा है. यही स्थिति सऊदी नेतृत्व के लिए अहम चिंता बनी हुई है.
क्या क्विंसी पैक्ट का पुराना मॉडल बदल रहा है?
क्विंसी पैक्ट को पूरी तरह खत्म मानना सही नहीं होगा. अमेरिका और सऊदी अरब के बीच रक्षा, हथियार, ऊर्जा और आर्थिक क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे रिश्ते अब भी कायम हैं. पहले सऊदी अरब यह सोच रहा था कि किसी भी तरह के बड़े बाहरी हमले की स्थिति में अमेरिका उसकी मदद करेगा और सीधे सैन्य कार्रवाई कर हस्तक्षेप करेगा. लेकिन अब तस्वीर कुछ अलग है. अमेरिका हथियारों की आपूर्ति, खुफिया सहयोग, प्रशिक्षण और सैन्य सहायता जारी रख सकता है, लेकिन हर क्षेत्रीय संघर्ष में अपने सैनिक उतारने या हवाई अभियान चलाने में ज्यादा रूचि नहीं दिखा रहा है.