Venezuela Oil Crisis: अमेरिकी सैन्य अभियान के बाद वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जा सकती है. विश्लेषकों का मानना है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला में प्रवेश कर क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे की मरम्मत और उत्पादन बहाल करेंगी. केप्लर के विश्लेषक निखिल दुबे के अनुसार, प्रतिबंधों में ढील मिलते ही व्यापार शुरू हो सकता है. भारतीय रिफाइनरियां तकनीकी रूप से वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं. अमेरिका के नेतृत्व में वेनेजुएला के तेल क्षेत्र का अधिग्रहण या पुनर्गठन भारत के लिए बड़ा वित्तीय और रणनीतिक फायदा लेकर आ सकता है.
लंबित भुगतान की वसूली का रास्ता खुलेगा
इससे भारत को करीब 1 अरब डॉलर के लंबित भुगतान की वसूली का रास्ता खुल सकता है और भारतीय कंपनियों द्वारा संचालित तेल क्षेत्रों में कच्चे तेल का उत्पादन दोबारा शुरू हो सकता है. वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में बदलाव से भारत को बड़ा रणनीतिक लाभ हो सकता है. गौरतलब है कि प्रतिबंधों से पहले वेनेजुएला के तेल का बड़ा खरीदार था. एक समय भारत वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार था. भारत रोज़ाना 4 लाख बैरल से ज्यादा तेल आयात करता था. वेनेजुएला सालाना 707 मिलियन बैरल कच्चा तेल निर्यात करता था, जिसमें भारत और चीन की हिस्सेदारी 35% थी.
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2020 में अमेरिका ने लगाए थे कड़े प्रतिबंध
2020 में अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के बाद यह आयात पूरी तरह रुक गया, जिससे भारतीय रिफाइनर कंपनियों को वेनेजुएला से बाहर निकलना पड़ा. भारत की प्रमुख विदेशी तेल कंपनी ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) पूर्वी वेनेजुएला के सैन क्रिस्टोबल तेल क्षेत्र का संयुक्त संचालन करती थी. पीटीआई के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते जरूरी उपकरण, तकनीक और ऑयल फील्ड सेवाएं नहीं मिल सकीं, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आई और बड़े भंडार होते हुए भी क्षेत्र व्यावसायिक रूप से निष्क्रिय हो गया.
वेनेजुएला पर OVL का 1 अरब डॉलर से ज्यादा बकाया
उद्योग सूत्रों के मुताबिक, वेनेजुएला ने 2014 तक OVL की 40% हिस्सेदारी के 536 मिलियन डॉलर का भुगतान नहीं किया है. इसके बाद के वर्षों का भुगतान भी अटका हुआ है क्योंकि ऑडिट की अनुमति नहीं दी गई. कुल मिलाकर OVL का बकाया करीब 1 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है. भारतीय कंपनियों की वेनेजुएला में मजबूत हिस्सेदारी है. OVL के पास काराबोबो-1 भारी तेल ब्लॉक में 11% हिस्सेदारी है, जबकि IOC और ऑयल इंडिया के पास 3.5% हिस्सेदारी है. विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी निगरानी में वेनेजुएला की सरकारी कंपनी PDVSA का पुनर्गठन हो सकता है, जिससे इन परियोजनाओं को गति मिलेगी.
एक साल के भीतर बढ़ सकता है उत्पादन
पीटीआई के मुताबिक, प्रतिबंध हटते ही OVL गुजरात में ONGC के तेल क्षेत्रों से ड्रिलिंग रिग और उपकरण तेजी से सैन क्रिस्टोबल भेज सकता है. फिलहाल वहां उत्पादन घटकर 5,000–10,000 बैरल प्रतिदिन रह गया है, लेकिन नए कुओं और आधुनिक तकनीक से यह 80,000 से 1 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है. विश्लेषकों का मानना है कि एक साल के भीतर उत्पादन बढ़ सकता है, जिससे भारत को मध्य पूर्वी तेल पर निर्भरता कम करने और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिलेगा.
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