Who is Abdul El-Sayed: अमेरिका में 3 नवंबर को हो रहे मिड-टर्म चुनावों के बीच पूरी दुनिया की नजरें एक खास सीट पर टिक गई हैं. यह सीट है मिशिगन राज्य की, जहां अमेरिकी सीनेट का बेहद दिलचस्प मुकाबला चल रहा है. यहां से डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल एल-सय्यद मैदान में हैं. अगर अब्दुल यह चुनाव जीत जाते हैं, तो वह अमेरिकी इतिहास में पहले मुस्लिम सीनेटर बनकर नया रिकॉर्ड बनाएंगे. मिशिगन में मौजूदा सीनेटर गैरी पीटर्स के रिटायर होने के बाद यह सीट खाली हुई है. डेमोक्रेटिक पार्टी ने यहां से युवा और प्रगतिशील चेहरे अब्दुल एल-सय्यद पर दांव लगाया है. वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से माइक रॉजर्स चुनावी मैदान में हैं.
कौन हैं अब्दुल एल-सय्यद?
अब्दुल बाहर से आकर अमेरिका में नहीं बसे हैं, बल्कि उनका जन्म मिशिगन के रोचेस्टर हिल्स में ही हुआ था. उनके माता-पिता जरूर मिस्र से अमेरिका आए थे. अब्दुल पेशे से डॉक्टर हैं और स्वास्थ्य विभाग में उच्च पद पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. चुनावी मैदान में उनके तीन बड़े मुद्दे हैं:
- हर नागरिक के लिए सरकारी स्वास्थ्य बीमा.
- राजनीति और चुनावों से बड़े उद्योगपतियों के पैसे का दखल खत्म करना.
- इजराइल को अमेरिका की तरफ से बिना शर्त सैन्य मदद देने पर रोक लगाना.
ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए क्यों बढ़ गई है टेंशन?
मिड-टर्म चुनावों के नतीजे सीधे तौर पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आगे की नीतियों और सरकार के कामकाज पर असर डालेंगे. अगर संसद के दोनों सदनों में ट्रंप की पार्टी का बहुमत नहीं रहा तो ईरान युद्ध समेत कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मसलों पर बड़े फैसले लेना उनके लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा. दूसरी तरफ, अब्दुल एल-सय्यद की उम्मीदवारी ने अमेरिकी सियासत में नई बहस छेड़ दी है. यूरोप में शरणार्थियों को लेकर ट्रंप पहले ही कड़ा रुख अपनाते रहे हैं और उनके समर्थक भी इस मुद्दे पर काफी मुखर रहे हैं. ऐसे माहौल में सीनेट की दहलीज तक एक मुस्लिम चेहरे का पहुंचना ट्रंप के पारंपरिक कोर वोट बैंक के लिए बड़ा सियासी झटका माना जा रहा है.
डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर की बगावत ने फंसाया पेंच
इस मुकाबले में रोमांच तब और बढ़ गया जब डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर ही फूट देखने को मिली. पार्टी की प्राइमरी में अब्दुल ने जब उम्मीदवारी की दौड़ जीती, तो टिकट की रेस में पिछड़ी नेता नाराज हो गईं. उन्होंने अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत करते हुए ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार माइक रॉजर्स का समर्थन कर दिया है. अंदरूनी कलह और विरोधी दलों के तीखे हमलों के बावजूद अब्दुल एल-सय्यद मजबूती से टिके हुए हैं. अब 3 नवंबर के नतीजों से तय होगा कि क्या अमेरिकी संसद के उच्च सदन में पहली बार कोई मुस्लिम नेता पहुंचेगा या रिपब्लिकन पार्टी इस सीट पर कब्जा जमाएगी.
अब्दुल अगर जीते तो डोनाल्ड ट्रंप के लिए झटका क्यों?
मिशिगन को अमेरिकी सियासत में ‘स्विंग स्टेट’ माना जाता है, यानी यहां की जनता कभी रिपब्लिकन तो कभी डेमोक्रेटिक पार्टी को चुनती है. हाल के सालों में इस राज्य में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है. मिशिगन का डियरबोर्न इलाका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां अब अरब मूल के लोगों की बहुसंख्या है. यहां की सड़कों पर अरबी साइनबोर्ड दिखते हैं, मस्जिदें हैं और ईद पर आधिकारिक छुट्टी तक होती है. हाउस में तो इस इलाके से पहले भी मुस्लिम सांसद चुने जा चुके हैं, लेकिन सीनेट की दहलीज पर पहली बार कोई मुस्लिम उम्मीदवार मजबूती से खड़ा है.
राष्ट्रपति ट्रंप अक्सर अपने भाषणों में यह कहते रहे हैं कि अमेरिका का स्वरूप बदल रहा है और वे ऐसा नहीं होने देंगे. ट्रंप जिस तरह यूरोप में शरणार्थियों और मुस्लिम आबादी के बढ़ने पर सवाल उठाते रहे हैं, उसी तरह अगर अब्दुल उनके ही देश की सीनेट में पहुंच जाते हैं, तो यह ट्रंप की राजनीति के लिए बहुत बड़ा सियासी झटका साबित होगा.