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आधी रात अफरा-तफरी, तख्तापलट का दावा… जानें- पोलैंड में सड़क पर क्यों उतरे लोग?

Poland Protest: पोलैंड के कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल पर पुलिस का पहरा था, जबकि प्रदर्शनकारी बोगदान श्विएचकोव्स्की को निलंबित किए जाने का विरोध कर रहे थे. इस टकराव ने न्यायिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार को लेकर चल रहे लंबे विवाद को और गहरा कर दिया है.

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पोलैंड में विरोध प्रदर्शन (Photo-X/@aleksthgrt)

Poland’s Constitutional Crisis: पोलैंड में उस समय नई राजनीतिक उथल-पुथल मच गई, जब कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल के चीफ बोगदान श्विएचकोव्स्की को सस्पेंड किए जाने के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के बीच, वहां दंगा-रोधी पुलिस तैनात कर दी गई. इस बढ़ते टकराव ने न्यायपालिका पर नियंत्रण को लेकर पीएम डोनाल्ड टस्क की सरकार और विपक्षी ‘लॉ एंड जस्टिस’ (PiS) पार्टी के बीच सत्ता संघर्ष को और तेज कर दिया है.

प्रदर्शनकारियों ने तोड़ा बैरिकेड

तनाव तब और बढ़ गया जब प्रदर्शनकारियों ने अदालत की घेराबंदी को तोड़ दिया और कथित तौर पर पुलिसकर्मियों पर कुछ चीजें फेंकीं. इस घटना के दौरान पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया. इस स्थिति को देखते हुए, PiS समर्थित नेता और राष्ट्रपति कैरोल नाव्रोकी को सेनेगल की अपनी यात्रा बीच में ही छोड़कर वारसॉ वापस लौटना पड़ा. वापस लौटने के अपने फैसले की घोषणा करते हुए, नाव्रोकी ने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘ऐसे वक्त में, राष्ट्रपति का पोलैंड में होना जरूरी है.’ बाद में उनके चीफ ऑफ स्टाफ ने कंफर्म किया कि वो ट्रिब्यूनल के कैंपस में पहुंच गए थे.

न्यायपालिका राजनीतिक लड़ाई का अखाड़ा क्यों बनी?

ये ताजा टकराव 2015 से 2023 तक पोलैंड में सत्ता में रही PiS सरकार की तरफ से लागू किए गए न्यायिक सुधारों को लेकर कई सालों से चले आ रहे मतभेदों का नतीजा है. यूरोपीय संस्थानों सहित कई आलोचकों का तर्क था कि इन बदलावों ने न्यायिक आजादी को कमजोर किया है और अदालतों पर राजनीतिक असर को बढ़ाया है.

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यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय और यूरोपीन यूनियन के कोर्ट ने भी कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल में जजों की नियुक्ति को लेकर चिंता जताई थी. 2023 में पदभार संभालने वाले पीएम टस्क ने इन विवादास्पद सुधारों को पलटने का वादा किया था. हालांकि उनके इन कोशिशों को नाव्रोकी और पूर्व राष्ट्रपति आंद्रेज डुडा, जो दोनों ही विपक्षी खेमे से जुड़े हैं, की तरफ से कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है.

ट्रिब्यूनल चीफ को सस्पेंड करने से नया विवाद

न्याय मंत्री वाल्डेमार जुरेक ने श्विएचकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्टलोमी सोचांस्की को हासिल होने वाली कानूनी छूट को हटाने की मांग की, ताकि उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की जा सके. ये आरोप इस बात से जुड़ा है कि उन्होंने 5 नवनिर्वाचित न्यायाधीशों को ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में शामिल होने से रोक दिया था. ट्रिब्यूनल ने अपनी लीडरशिप का बचाव करते हुए कहा कि दोनों अधिकारी कानूनी रूप से नियुक्त किए गए थे. उन्होंने सरकार के इस कदम को ‘तख्तापलट’ (coup d’état) करार दिया.

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टस्क और विपक्ष के बीच आरोपों का दौर

टस्क ने सरकार के रुख का बचाव करते हुए कहा कि कानून के शासन को बहाल करने के लिए कड़े कदम उठाना जरूरी था. वहीं, PiS नेताओं ने इस कदम की निंदा की और लोगों से इसका विरोध करने का ऐलान किया. अगले साल होने वाले संसदीय चुनावों के नजदीक आने के साथ, इस टकराव ने पोलैंड में संवैधानिक अधिकार, न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यकारी शक्तियों की सीमाओं को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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