पाकिस्तान एक बार फिर गंभीर जल संकट के मुहाने पर खड़ा है. रबी फसल के चालू सीजन में देश के प्रमुख कृषि प्रांतों पंजाब और सिंध को सिंचाई के लिए 22 प्रतिशत पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ेगा. इससे गेहूं, जौ, सरसों और चना जैसी प्रमुख शीतकालीन फसलों की बुवाई और पैदावार सीधे तौर पर प्रभावित होने की आशंका है, जिससे देश में खाद्य सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. कराची स्थित अखबार ‘डॉन’ और ‘एसोसिएटेड प्रेस ऑफ पाकिस्तान’ की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के जल नियामक ‘सिंधु नदी प्रणाली प्राधिकरण’ (IRSA) ने इस कमी का अनुमान जारी किया है. पाकिस्तान की 80% से अधिक खेती सिंधु बेसिन की सिंचाई प्रणाली पर टिकी है. ऐसे में यह कमी किसानों की कमर तोड़ सकती है.
IRSA की रिपोर्ट में खुलासा, किल्लत की असली वजह भारत नहीं
हालांकि, पाकिस्तानी नेता और हुक्मरान लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि भारत सिंधु जल समझौते के तहत उनका पानी रोक रहा है, लेकिन IRSA की रिपोर्ट ने उनकी इस दलील की पोल खोल दी है. जल नियामक के मुताबिक, इस किल्लत की असली वजह भारत नहीं, बल्कि खुद पाकिस्तान की आंतरिक विफलताएं हैं. इनमें अपर्याप्त जल भंडारण, नदियों में पानी का कम प्राकृतिक बहाव और दोनों प्रांतों में कई जलविद्युत व बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पूरा होने में हो रही भारी देरी शामिल है.
गौरतलब है कि अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था. इस कायरतापूर्ण हमले में पाकिस्तानी आतंकियों ने धर्म पूछकर 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या कर दी थी, जिसके बाद नई दिल्ली ने कड़ा रुख अपनाते हुए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया.
संधि निलंबित होने का यह अर्थ कतई नहीं है कि भारत ने पाकिस्तान जाने वाली नदियों का पानी रोक दिया है; नदियां अब भी सीमा पार स्वाभाविक रूप से बह रही हैं. भारत ने केवल संधि से जुड़े दायित्वों जैसे नियमित डेटा साझा करना और अग्रिम सूचनाएं देने को रोका है. साफ है कि अपनी कमजोर नीतियों और लटके हुए प्रोजेक्ट्स के कारण पैदा हुए इस संकट के लिए पाकिस्तान का भारत पर आरोप लगाना केवल अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश है.
पानी की 22% कमी का अनुमान क्यों?
पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ और ‘एसोसिएटेड प्रेस ऑफ पाकिस्तान’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश के जल नियामक ‘सिंधु नदी प्रणाली प्राधिकरण’ (IRSA) की सलाहकार समिति ने इस 22% की कटौती को मंजूरी दी है. इस फैसले के तहत पंजाब को 15.564 MAF और सिंध को 11.748 MAF पानी आवंटित किया गया है, जबकि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को इस कटौती से छूट दी गई है.
पाकिस्तानी नेता और हुक्मरान लगातार भारत पर सिंधु जल समझौते को लेकर पानी रोकने का आरोप लगाते रहे हैं. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से लेकर विदेश मंत्री इशाक डार तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी कर रहे हैं. हालांकि, आईआरएसए (IRSA) के आधिकारिक आकलन ने इन दावों की हवा निकाल दी है. रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट का असली कारण भारत नहीं, बल्कि पाकिस्तान का अपना लचर प्रबंधन है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि नदियों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह उम्मीद से 8% और पिछले साल से 22% कम रहा है. 30 सितंबर तक बांधों में 12.014 MAF के लक्ष्य के मुकाबले केवल 9.343 MAF पानी ही जमा हो सका. इसके अलावा, वाप्डा (WAPDA) की निर्माण संबंधी पाबंदियों के चलते तरबेला बांध में 3 MAF से ज्यादा पानी नहीं भरा जा सका. साथ ही, तरबेला की टनल 4 और टनल 5 जलविद्युत परियोजनाओं को मार्च 2025 तक पूरा होना था, लेकिन इनमें भारी देरी हुई, जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है.
यह जल संकट पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. पाकिस्तान पहले ही गेहूं की भारी कमी से जूझ रहा है और सरकार को 10 लाख टन गेहूं आयात करने का फैसला लेना पड़ा है. पिछले साल देश में 27.5 मिलियन टन गेहूं पैदा हुआ था, जबकि जरूरत 31.9 मिलियन टन की थी. इस बार पानी की कमी से उत्पादन और गिरने की आशंका है, जिससे जनता पर महंगाई का दोहरा बोझ पड़ेगा.