Euthanasia Of One-Year-Old Child: नीदरलैंड में हाल ही में एक साल के हद से ज्यादा बीमार बच्चे को यूथेनेशिया देने का मामला समाने आया है. डच कंट्री में बच्चों के लिए ‘असिस्टेड-डाइंग’ (मदद के जरिए मौत) के नियमों के विस्तार 2024 में हुआ था. इसके तहत इच्छामृत्यु का एक साल से कम उम्र के बच्चे का ये पहला मामला है.
बच्चा गंभीर रूप से बीमार था
डच अधिकारियों ने जून 2026 में कंफर्म किया था कि पिछले साल यूथेनेशिया से एक बच्चे की मौत हुई थी, लेकिन शुरू में बच्चे की उम्र और मेडिकल कंडीशन के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी. बाद में सरकारी रिपोर्ट से पता चला कि ये प्रीमैच्योर बेबी था और उसे सेप्सिसहो गया था. 4 महीने की उम्र में डॉक्टरों ने पाया कि बच्चे के दिमाग को काफी नुकसान पहुंचा था. इसके बाद बच्चे में गंभीर सेरेब्रल पाल्सी और मिर्गी की समस्या का पता चला.
रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चे को फेफड़ों और सांस की नली से बलगम निकालने में काफी दिक्कत होती थी, जिससे सांस के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता था. इसमें ये भी बताया गया कि बच्चे के छोटे से जीवनकाल में कोई खास शारीरिक विकास या सुधार नहीं हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक जब डॉक्टरों ने तय किया कि सुधार की कोई संभावना नहीं है, तो माता-पिता ने इलाज करने वाले डॉक्टर से बच्चे की जिंदगी खत्म करने के लिए कहा.
2024 में यूथेनेशिया कानून का एक्सपैंशन
नीदरलैंड ने 2024 में अपने यूथेनेशिया रूल्स को एक्सपैंड किया, ताकि सख्त सुरक्षा उपायों के साथ गंभीर और लाइलाज तकलीफों से जूझ रहे 1 से 12 साल के बच्चों को भी इसमें शामिल किया जा सके. डच मीडिया ने बताया कि प्रॉसिक्यूटर ने डॉक्टर के खिलाफ आरोप न लगाने का फैसला किया. ये फैसला एक रिव्यू कमेटी के उस कंक्लूजन के बाद लिया गया जिसमें कहा गया था कि डॉक्टर ने देखभाल के जरूरी स्टैंडर्ड को फॉलो किया था.
नीदरलैंड 2002 में सख्त शर्तों के तहत यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता देने वाला पहला देश बना था. सभी रिपोर्ट किए गए मामलों की समीक्षा क्षेत्रीय यूथेनेशिया समितियां करती हैं. ऑफिशियल रिव्यू कमेट के मुताबिक 2025 में नीदरलैंड में यूथेनेशिया या असिस्टेड सुसाइड से 10341 मौतें दर्ज की गईं, जो 2024 की तुलना में 3.8% ज्यादा है.
भारत में इच्छामृत्यु का कानून
भारत में इच्छामृत्यु पर कानूनी रोक है. ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ उसे कहते हैं जिसमें जानलेवा पदार्थ देकर जानबूझकर मौत का कारण बना जाता है, ये कानूनी रूप से मान्य नहीं है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को मान्यता दी है, जिसके तहत कुछ खास हालात में और कड़े सुरक्षा उपायों के साथ जीवन बचाने वाले मेडिकल इलाज को न देने या उसे हटाने की इजाजत है. अपने ऐतिहासिक ‘कॉमन कॉज वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया(2018)’ फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सम्मान के साथ मरने का अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही एक हिस्सा है. कोर्ट ने ‘एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स’ को भी मान्यता दी, जिन्हें आम तौर पर ‘लिविंग विल्स’ कहा जाता है.
अरुणा शानबाग और हरीश राणा का केस
‘अरुणा शानबाग केस (2011)’ भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े कानूनों के विकास में एक अहम घटना थी; ये मामला परमानेंट ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में मौजूद मरीज का लाइफ सपोर्ट हटाने से जुड़ा था. हालांकि उन्हें यूथेनेशिया नहीं दिया गया था. हाल ही में ‘हरीश राणा वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया (2026)’ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की तरफ से मरीज की कंडीषन को ‘इरिवर्सिबल’ पाए जाने के बाद, मेडिकल मदद से दिए जा रहे न्यूट्रीशन और हाइड्रेशन को हटाने की इजाजत दे दी. कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस प्रोसीजर के साथ-साथ पैलिएटिव केयर और ‘एंड-ऑफ-लाइफ केयर’भी दी जानी चाहिए.