मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इजरायल का ईरान पर साझा हमला अब बड़े विवादों में घिर गया है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने यह स्वीकार कर सबको चौंका दिया है कि अमेरिका इस युद्ध में इसलिए कूदा क्योंकि इजरायल ने पहले ही ईरान पर हमला करने का मन बना लिया था. व्हाइट हाउस को डर था कि अगर इजरायल अकेले वार करता है तो ईरान पलटवार में खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा. इसी मजबूरी के चलते ट्रंप प्रशासन ने इजरायल का साथ दिया और ईरान पर पहले हमला कर दिया. अब अमेरिका के भीतर ही ट्रंप की आलोचना हो रही है और सांसद मार्क वॉर्नर जैसे नेता सवाल उठा रहे हैं कि इजरायल के खतरे को अमेरिका का खतरा मान लेना बहुत बड़ी भूल है.
नेतन्याहू ने ट्रंप के दिमाग में यह बात बैठाई
विशेषज्ञों का मानना है कि बेंजामिन नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध के लिए तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई है. नेतन्याहू ने ट्रंप के दिमाग में यह बात बैठाई कि ईरान को जड़ से मिटाना दोनों देशों के अस्तित्व के लिए जरूरी है. इजरायली प्रधानमंत्री ने ट्रंप को यकीन दिलाया कि अगर वे खामेनेई के शासन को खत्म कर देते हैं, तो उनका नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा. ट्रंप को यह लालच दिया गया कि वे ईरान पर हमला करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बनकर महान बन जाएंगे. नेतन्याहू लगातार यह नैरेटिव सेट कर रहे हैं कि ईरान पिछले 47 सालों से अमेरिका की बर्बादी के सपने देख रहा है और उसने ट्रंप की हत्या की साजिश भी रची थी.
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खुफिया रिपोर्ट और ट्रंप के दावों में अंतर
राष्ट्रपति ट्रंप इस जंग को सही ठहराने के लिए जिन सबूतों का हवाला दे रहे हैं, अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियां ही उन्हें गलत बता रही हैं. ट्रंप का दावा है कि ईरान अमेरिका तक मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलें बना रहा था, लेकिन पेंटागन की डीआईए रिपोर्ट के मुताबिक ईरान 2035 से पहले ऐसी तकनीक हासिल नहीं कर सकता. इसी तरह ट्रंप ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को तत्काल खतरा बताया, जबकि आईएईए की रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने 2015 की डील के बाद से परमाणु हथियार बनाने का काम रोक दिया था. खुद पेंटागन ने संसद को बताया था कि ईरान की ओर से अमेरिका पर पहले हमले की कोई संभावना नहीं थी, जो ट्रंप के दावों पर सवालिया निशान लगाता है.
जंग की लंबी खींचती बिसात और परिणाम
इस महायुद्ध को लेकर ट्रंप ने शुरुआत में अनुमान लगाया था कि यह चार से पांच हफ्तों में खत्म हो जाएगा, लेकिन अब वे इसे लंबे समय तक खींचने की तैयारी की बात कर रहे हैं. नेतन्याहू की रणनीति ईरान में पूरी तरह ‘सत्ता परिवर्तन’ करने की है और वे अमेरिका को इसमें मोहरा बना रहे हैं. अमेरिका के भीतर विपक्ष का आरोप है कि ट्रंप केवल अपने फैसले को सही साबित करने के लिए झूठ फैला रहे हैं. सच्चाई यह है कि ईरान से अमेरिका को कोई सीधा खतरा नहीं था, बल्कि यह पूरी जंग इजरायल के हितों की रक्षा के लिए लड़ी जा रही है. अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिका इस दलदल से बाहर निकल पाएगा या फिर वह एक अंतहीन संघर्ष में फंस चुका है.
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