मिडिल ईस्ट में जारी महाजंग के बीच ईरान ने दुनिया के सामने अपनी सख्त शर्तें रख दी हैं. ईरान की सुरक्षा परिषद ने साफ कर दिया है कि अगर किसी भी देश को होर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) से अपने जहाज सुरक्षित निकालने हैं, तो उसे ईरानी अधिकारियों के साथ पहले तालमेल और बातचीत करनी होगी. ईरान ने चेतावनी दी है कि अब इस समुद्री रास्ते से गुजरना पूरी तरह से उनके साथ समन्वय पर निर्भर करेगा. युद्ध के कारण इस वक्त होर्मुज के दोनों ओर बड़ी संख्या में तेल के टैंकर और व्यापारिक जहाज फंसे हुए हैं. ईरान के इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है. क्योंकि दुनिया का 20 फीसदी तेल इसी पतले रास्ते से होकर गुजरता है.
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नेवल माइन्स का खौफ
ईरानी सुरक्षा परिषद ने केवल बातचीत की शर्त ही नहीं रखी, बल्कि एक खौफनाक चेतावनी भी जारी की है. परिषद का कहना है कि अगर ईरान के तटों या द्वीपों को निशाना बनाने की कोशिश की गई, तो वे प्रमुख समुद्री रास्तों पर ‘नौसैनिक बारूदी सुरंगें’ (Naval Mines) बिछा देंगे. अधिकारियों का दावा है कि अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे कदम उठाना उनका कानूनी और सैन्य अधिकार है. ईरान ने दोटूक लहजे में कहा है कि अगर उसके पावर प्लांट्स पर कोई हमला होता है, तो उसका जवाब तत्काल और निर्णायक होगा. इस चेतावनी का सीधा मतलब यह है कि अगर तनाव बढ़ा, तो फारस की खाड़ी में समुद्री गतिविधियां पूरी तरह ठप हो सकती हैं. जिसकी जिम्मेदारी ईरान ने सीधे तौर पर अमेरिका और इजराइल पर डाली है.
मित्र देशों के जरिए पहुंचा संदेश
जंग के 24वें दिन एक नई कूटनीतिक हलचल भी देखने को मिली है. ईरान के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को खुलासा किया कि उन्हें कुछ मित्र देशों के जरिए अमेरिका की ओर से बातचीत का प्रस्ताव मिला है. सरकारी न्यूज एजेंसी ‘आईआरएनए’ के मुताबिक, प्रवक्ता इस्माइल बाकाई ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में आए संदेशों से संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन अब इस युद्ध को खत्म करने के लिए चर्चा करना चाहता है. हालांकि, ईरान ने फिलहाल किसी भी तरह की सीधी बातचीत या चर्चा से इनकार किया है. तेहरान का मानना है कि यह युद्ध उन पर थोपा गया है और जब तक उनकी शर्तें नहीं मानी जातीं. तब तक कूटनीतिक बातचीत की मेज पर बैठना जल्दबाजी होगी.
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा
ईरान के इस ऐलान ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. अगर होर्मुज की खाड़ी में जहाजों का आवागमन बाधित होता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लग सकती है. पहले ही कई जहाज वहां लंगर डाले खड़े हैं और ईरान की नई शर्तों ने अनिश्चितता और बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ‘पानी के रास्ते’ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है ताकि अमेरिका और इजराइल पर दबाव बनाया जा सके. यदि समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाई जाती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय नौसेनाओं के लिए भी वहां ऑपरेशन चलाना बेहद खतरनाक हो जाएगा. फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या बातचीत का कोई रास्ता निकलता है या मिडिल ईस्ट का यह समंदर तबाही का गवाह बनेगा.
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